फ्रांस में सड़कों पर उतरे Gen- Z, स्कूलों से शुरू हुआ आंदोलन बना सरकार के लिए बड़ी चुनौती

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फ्रांस में सड़कों पर उतरी Gen- Z, मैक्रों सरकार के खिलाफ बढ़ा छात्रों का विरोध, पेरिस से पूरे फ्रांस तक फैला छात्र आंदोलन

फ्रांस में बीते करीब दो सप्ताह से जारी छात्र आंदोलन अब केवल स्कूलों की समस्याओं तक सीमित नहीं रह गया है। पेरिस क्षेत्र से शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन देश के कई शहरों तक फैल चुका है। स्कूलों के बाहर प्रदर्शन, प्रवेश द्वारों की नाकेबंदी और पुलिस से झड़पों के बीच हजारों छात्र सड़कों पर हैं। आंदोलन में शिक्षा व्यवस्था में संसाधनों की कमी, शिक्षकों के खाली पद, भीड़भाड़ वाली कक्षाओं, लंबे स्कूल समय, जर्जर इमारतों और विश्वविद्यालय प्रवेश प्रक्रिया को लेकर नाराजगी सामने आ रही है। साथ ही, सरकार के प्रस्तावित 2027 के बजट में खर्च में कटौती को लेकर कर्मचारियों और ट्रेड यूनियनों का विरोध भी इसी समय तेज हुआ है।

पेरिस समेत कई शहरों में हाईस्कूल छात्रों का प्रदर्शन, सैकड़ों स्कूल प्रभावित

फ्रांस में नई पीढ़ी के छात्रों का आंदोलन लगातार व्यापक होता जा रहा है। राजधानी पेरिस और उसके आसपास के इलाकों से शुरू हुआ हाईस्कूल छात्रों का विरोध अब देश के कई हिस्सों में फैल चुका है। सितंबर के अंतिम सप्ताह में शुरू हुए इस आंदोलन में बड़ी संख्या में छात्र स्कूलों के प्रवेश द्वार रोककर प्रदर्शन कर रहे हैं। कई जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुई हैं, जबकि कुछ स्थानों पर कूड़ेदानों में आग लगाने, आतिशबाजी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं। सरकार ने हिंसा और तोड़फोड़ की निंदा करते हुए पुलिस की तैनाती बढ़ाई है। हालांकि इस आंदोलन को केवल राजनीतिक विरोध के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। छात्रों की शुरुआती और प्रमुख शिकायतें सीधे शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी हैं। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि कई स्कूलों में शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के पद खाली हैं, कक्षाओं में जरूरत से ज्यादा विद्यार्थी हैं, स्कूल भवनों की हालत खराब है और पढ़ाई का समय बहुत लंबा है। गर्मी के दौरान कई कक्षाओं में अत्यधिक तापमान ने भी छात्रों की परेशानी बढ़ाई। इसके अलावा विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए इस्तेमाल होने वाली ‘पारकूरसुप’ प्रक्रिया को लेकर तनाव और अनिश्चितता भी छात्रों के बीच नाराजगी का कारण बनी हुई है।

पेरिस के बाहरी इलाकों से शुरू हुआ आंदोलन

मौजूदा आंदोलन की शुरुआत 21 सितंबर को पेरिस के दक्षिण-पूर्वी उपनगर क्रेतै (Créteil) के एक हाईस्कूल से बताई जाती है। वहां कई शिक्षकों के पद खाली होने को लेकर छात्रों ने विरोध शुरू किया। इसके बाद पेरिस क्षेत्र के दूसरे स्कूलों में भी छात्र प्रवेश द्वारों पर जमा होने लगे। कुछ ही दिनों में यह आंदोलन राजधानी क्षेत्र से बाहर निकलकर देश के दूसरे शहरों तक पहुंच गया। फ्रांस की छात्र यूनियन यूनियन सिंडिकाल लिसेएन ने देशभर के हाईस्कूलों में नाकेबंदी और विरोध का आह्वान किया। छात्र संगठनों ने शिक्षकों और कर्मचारियों की कमी, जर्जर स्कूल भवनों, भीड़भाड़ वाली कक्षाओं, लंबे समय की पढ़ाई और विश्वविद्यालय प्रवेश प्रणाली से पैदा होने वाले तनाव को प्रमुख मुद्दों में शामिल किया। सोशल मीडिया ने भी आंदोलन के तेजी से फैलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इंस्टाग्राम, टिकटॉक और स्नैपचैट जैसे मंचों पर अलग-अलग स्कूलों की समस्याओं से जुड़े पोस्ट और प्रदर्शन के आह्वान तेजी से प्रसारित हुए।

कुछ ही दिनों में सैकड़ों स्कूल प्रभावित

29 सितंबर तक फ्रांस के शिक्षा मंत्रालय के अनुसार 330 से अधिक हाईस्कूल किसी न किसी रूप में प्रदर्शन से प्रभावित हुए थे। इसके अगले कुछ दिनों में आंदोलन का दायरा और बढ़ गया। 2 अक्टूबर तक शिक्षा मंत्रालय के अनुसार करीब 560 स्कूलों में विरोध का असर दर्ज किया गया था, जबकि कुछ अन्य रिपोर्टों में प्रभावित स्कूलों की संख्या 1,000 से अधिक बताई गई। आंकड़ों में अंतर इस वजह से भी है कि कुछ संस्थानों में केवल प्रदर्शन हुआ, कुछ में प्रवेश द्वार बाधित किए गए और कुछ जगहों पर पढ़ाई या कक्षाएं पूरी तरह प्रभावित हुईं। पेरिस के अलावा लील, मार्सेय, लियोन, बोर्डो, नांत और रेनेस जैसे शहरों में भी छात्रों के प्रदर्शन की खबरें सामने आई हैं। कई स्थानों पर छात्रों ने स्कूल के बाहर बैनर लगाए और प्रवेश द्वारों को कूड़ेदानों या दूसरी वस्तुओं से रोकने की कोशिश की। कुछ जगहों पर पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया। हालात बिगड़ने पर कई स्कूलों को बंद करना पड़ा और कुछ स्थानों पर कक्षाओं को ऑनलाइन करने की व्यवस्था भी की गई।

पुलिस और छात्रों के बीच टकराव से बढ़ा तनाव

शुरुआत में छात्रों की मांगों को मुख्य रूप से शिक्षा व्यवस्था से संबंधित माना जा रहा था, लेकिन प्रदर्शन के दौरान हिंसा की घटनाओं ने स्थिति को जटिल बना दिया। पुलिस के अनुसार कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों की ओर से पत्थर, बोतल और आतिशबाजी फेंकी गई। कुछ जगहों पर कूड़ेदानों और दूसरी वस्तुओं में आग लगाई गई। फ्रांस के गृह मंत्रालय ने आंदोलन के हिंसक हिस्से को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। सरकार का कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार बरकरार है, लेकिन हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। दूसरी ओर, कुछ छात्र, शिक्षक और समर्थक पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठा रहे हैं। पुलिस कार्रवाई के दौरान छात्रों के घायल होने की घटनाओं ने भी विवाद को बढ़ाया है। 1 अक्टूबर तक अधिकारियों ने सैकड़ों पुलिसकर्मियों, छात्रों और शिक्षा कर्मचारियों के घायल होने की जानकारी दी थी।
2 अक्टूबर तक गिरफ्तारियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी। फ्रांस के अधिकारियों के अनुसार आंदोलन शुरू होने के बाद करीब 2,000 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका था और केवल गुरुवार को ही बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया। हालांकि गिरफ्तार किए गए सभी लोगों के बारे में यह मानना उचित नहीं है कि वे छात्र आंदोलन के मूल मुद्दों का प्रतिनिधित्व करते हैं, क्योंकि अधिकारियों के अनुसार प्रदर्शन में हिंसा और तोड़फोड़ करने वाले अलग-अलग समूह भी शामिल हुए हैं। (TIME⁠)

छात्रों की असली शिकायत क्या है?

प्रदर्शनकारी छात्रों की शिकायतों का एक बड़ा हिस्सा स्कूलों की रोजमर्रा की परिस्थितियों से जुड़ा है। उनका कहना है कि कई कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या बहुत ज्यादा है और शिक्षकों की कमी के कारण पढ़ाई प्रभावित होती है। कुछ स्कूलों की इमारतों की हालत खराब है, जबकि गर्मियों के दौरान अत्यधिक गर्मी में कक्षाओं में पर्याप्त सुविधाओं का अभाव भी सामने आया। कुछ छात्रों ने लंबे स्कूल समय और मानसिक दबाव को भी मुद्दा बनाया है। फ्रांस के कई हाईस्कूलों में विद्यार्थी सुबह करीब 8 बजे से देर दोपहर तक कक्षाओं में रहते हैं। छात्रों का कहना है कि पढ़ाई, परीक्षा और विश्वविद्यालय में दाखिले की प्रक्रिया से जुड़ा दबाव उनकी मानसिक और शारीरिक थकान बढ़ाता है। इसके साथ ही कुछ स्कूलों में भोजन, शौचालय, पानी और भवन की मरम्मत जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी शिकायतें सामने आई हैं। यही वजह है कि आंदोलन को केवल ‘सरकार विरोधी’ प्रदर्शन के रूप में देखना छात्रों की सभी मांगों को समेट नहीं पाता। हालांकि अब शिक्षा से जुड़े मुद्दों के साथ सरकार की आर्थिक नीतियों और प्रस्तावित बजट के खिलाफ व्यापक असंतोष भी आंदोलन के वातावरण का हिस्सा बन गया है।

2027 के बजट ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी

फ्रांस में यह आंदोलन ऐसे समय में तेज हुआ है जब सरकार 2027 के बजट में खर्च कम करने की योजना पर काम कर रही है। सरकार ने लगभग 54 अरब यूरो की बचत का लक्ष्य रखा है। प्रस्तावित बजट में सरकारी कर्मचारियों के वेतन को 2027 में स्थिर रखने की योजना भी शामिल है। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि लंबे समय से वेतन वृद्धि सीमित रहने के कारण कर्मचारियों की वास्तविक क्रय शक्ति पर दबाव पड़ा है। 29 सितंबर को छात्रों के विरोध के साथ-साथ सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों, दमकलकर्मियों और अन्य क्षेत्रों के कर्मचारियों ने भी देशभर में प्रदर्शन और हड़ताल की। यूनियनों ने बजट में कटौती का विरोध किया और सरकार से प्रस्तावित खर्च कटौती पर पुनर्विचार करने की मांग की। इस तरह छात्रों की शिक्षा संबंधी शिकायतें और कर्मचारियों का आर्थिक विरोध एक ही समय में सड़कों पर दिखाई देने लगा।

प्रधानमंत्री को बुलानी पड़ी संकट बैठक

स्थिति बिगड़ने के बाद प्रधानमंत्री सेबास्तियन लेकोर्नू ने मंत्रियों के साथ संकट बैठक बुलाई। सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था पर चर्चा के साथ स्कूलों में हिंसा और नाकेबंदी रोकने पर जोर दिया। शिक्षा मंत्री एडुआर जफ्रे ने भी माना कि छात्रों की कई शिकायतों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है, लेकिन उनका कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसक गतिविधियों के बीच अंतर किया जाना चाहिए। गृह मंत्रालय ने उन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई का संकेत दिया है जो स्कूलों में आगजनी, तोड़फोड़ या पुलिस पर हमले जैसी गतिविधियों में शामिल हैं। सरकार की चुनौती यह है कि वह छात्रों की शिक्षा संबंधी शिकायतों पर प्रतिक्रिया भी दे और हिंसा को रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था भी बनाए रखे।

आंदोलन में राजनीति की एंट्री

फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का कार्यकाल अगले राष्ट्रपति चुनाव के कारण अपने अंतिम चरण में है और संविधान के अनुसार वह लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नहीं लड़ सकते। ऐसे में मौजूदा छात्र आंदोलन का समय राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। हालांकि आंदोलन की शुरुआती मांगें शिक्षा व्यवस्था पर केंद्रित थीं, लेकिन अब अलग-अलग राजनीतिक दल और नेता इसे अपने-अपने नजरिये से देख रहे हैं। सरकार ने वामपंथी दल ‘ला फ्रांस इंस्यूमीज’ पर आंदोलन को राजनीतिक रूप से भड़काने या उसका फायदा उठाने का आरोप लगाया है। पार्टी के नेता जां-ल्यूक मेलांशों ने इसके विपरीत सरकार की प्रतिक्रिया और पुलिस कार्रवाई की आलोचना की है। दक्षिणपंथी नेताओं ने कानून-व्यवस्था पर ज्यादा सख्त कार्रवाई की मांग की है। इस तरह छात्र आंदोलन धीरे-धीरे फ्रांस की आगामी चुनावी राजनीति के बीच भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा है।

क्या यह केवल Gen-Z आंदोलन’ है?

फ्रांस के मौजूदा आंदोलन को सोशल मीडिया के दौर की युवा पीढ़ी के विरोध के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसके प्रतिभागियों को एक ही राजनीतिक या वैचारिक समूह के रूप में देखना सही नहीं होगा। अलग-अलग स्कूलों में छात्रों की मांगें अलग हैं। कहीं शिक्षकों की कमी मुख्य मुद्दा है, तो कहीं भवनों की खराब हालत, लंबे स्कूल घंटे या विश्वविद्यालय प्रवेश व्यवस्था को लेकर नाराजगी है। इसके अलावा कुछ शिक्षक और अन्य कर्मचारी भी छात्रों के साथ खड़े दिखाई दिए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के अलग-अलग प्रदर्शन ने आंदोलन के सामाजिक दायरे को और व्यापक बनाया है। इसलिए फिलहाल यह कहना अधिक उचित होगा कि फ्रांस में छात्रों का आंदोलन शिक्षा व्यवस्था से शुरू होकर व्यापक सामाजिक और आर्थिक असंतोष से जुड़ गया है।

सोशल मीडिया ने आंदोलन को दी रफ्तार

इस आंदोलन की एक खास बात इसकी तेजी है। पेरिस क्षेत्र के कुछ स्कूलों से शुरू हुई नाकेबंदी कुछ ही दिनों में देश के कई हिस्सों में पहुंच गई। सोशल मीडिया पर स्कूलों की तस्वीरें, वीडियो, प्रदर्शन के दृश्य और स्थानीय मांगें तेजी से प्रसारित हुईं। शिक्षा अधिकारियों ने भी आंदोलन के फैलाव में सोशल मीडिया के प्रभाव का उल्लेख किया है। कई स्कूलों के लिए अलग-अलग पोस्टर और नारे सोशल मीडिया पर साझा किए गए। इससे स्थानीय समस्याएं राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बनने लगीं। हालांकि अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि सोशल मीडिया के माध्यम से वास्तविक छात्रों के साथ ऐसे तत्व भी आंदोलन में शामिल हो सकते हैं जिनका उद्देश्य हिंसा या तोड़फोड़ करना हो। यही वजह है कि सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच भरोसे का संकट बढ़ता दिखाई दे रहा है।

सरकार के सामने दोहरी चुनौती

फ्रांस की सरकार के सामने फिलहाल दो स्तरों पर चुनौती है। पहला, स्कूलों में शिक्षकों और संसाधनों की कमी जैसी वास्तविक समस्याओं का समाधान करना और छात्रों का भरोसा वापस हासिल करना। दूसरा, हिंसक घटनाओं को रोकना और यह सुनिश्चित करना कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर स्कूलों, सार्वजनिक परिवहन और सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान न पहुंचे। सरकार के लिए यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा से जुड़े मुद्दे सीधे देश के युवा वर्ग के भविष्य से जुड़े हैं। वहीं दूसरी ओर बजट में कटौती की योजना ऐसे समय सामने आई है जब सरकारी कर्मचारियों और यूनियनों में पहले से आर्थिक दबाव को लेकर नाराजगी है। इसलिए छात्रों का विरोध और कर्मचारियों की हड़ताल एक-दूसरे से पूरी तरह अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि दोनों में सार्वजनिक सेवाओं और सरकारी खर्च को लेकर असंतोष दिखाई दे रहा है।

आगे क्या हो सकता है?

फ्रांस में आने वाले दिनों में आंदोलन की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार छात्रों की शिक्षा संबंधी मांगों पर किस तरह प्रतिक्रिया देती है और पुलिस-प्रशासन हिंसा तथा नाकेबंदी को किस तरह नियंत्रित करता है। फिलहाल प्रदर्शन कई शहरों में जारी हैं और आंदोलन का दायरा तेजी से बदल रहा है। एक तरफ छात्र बेहतर स्कूल, पर्याप्त शिक्षक, कम भीड़ वाली कक्षाएं और पढ़ाई का बेहतर माहौल चाहते हैं। दूसरी तरफ सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सार्वजनिक संस्थानों को सामान्य रूप से चलाने पर जोर दे रही है। यदि बातचीत और ठोस शिक्षा सुधारों के जरिए छात्रों की शिकायतों का समाधान होता है तो आंदोलन का रुख बदल सकता है, लेकिन हिंसक घटनाएं जारी रहने पर सरकार की ओर से सुरक्षा कार्रवाई और कड़ी होने की संभावना बनी रहेगी।
इस पूरे घटनाक्रम ने फ्रांस में शिक्षा, सरकारी खर्च, युवाओं के भविष्य और राजनीतिक जवाबदेही को एक साथ राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। फिलहाल इसे केवल स्कूलों के बाहर छात्रों का विरोध कहना मुश्किल है। यह आंदोलन फ्रांस की युवा पीढ़ी की शिक्षा व्यवस्था को लेकर बेचैनी, सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च को लेकर बहस और आगामी राजनीतिक माहौल—तीनों को एक ही समय में सामने ला रहा है।

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