भारत में हनी-ट्रैप बढ़ रहा है, ISI मनोवैज्ञानिकों के जरिए अधिकारियों की कमजोरियों का फायदा उठा रही है।

The CSR Journal Magazine

पाकिस्तान की साजिश का पर्दाफाश

नई दिल्ली: भारत में हनी-ट्रैप के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इन घटनाओं के बावजूद, कई अधिकारी इन जालसाजों का शिकार बन रहे हैं। हाल ही में, एक अधिकारी ने बताया कि पाकिस्तान की आईएसआई ने उन अधिकारियों की पहचान के लिए मनोवैज्ञानिकों को काम पर रखा है, जिनके पास संवेदनशील जानकारी होती है। इनका मकसद अधिकारियों की मानसिक समस्याओं का अध्ययन करना और फिर उनसे जानकारी निकलवाना है।

कैसे किया जाता है मनोवैज्ञानिकों का इस्तेमाल?

इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि आईएसआई इस काम के लिए प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों को नियुक्त करती है। ये लोग पहले से सोशल मीडिया पर अधिकारियों के नाम से फर्जी अकाउंट बनाते हैं। इनकी पहचान के बाद, ये मनोवैज्ञानिक अधिकारियों के पोस्ट और मैसेज को बारीकी से जांचते हैं, ताकि उनकी कमजोरियों को समझा जा सके।

भरोसे का जाल

एक बार जब वे अधिकारियों की मानसिकता समझ लेते हैं, तो बातचीत शुरू करते हैं और सहानुभूति दिखाते हैं। इन मनोवैज्ञानिकों को अधिकारियों का विश्वास जीतने में दो से तीन महीने लगते हैं। जब भरोसा बन जाता है, तो इन्हें ऐप्स इंस्टॉल करने के लिए कहा जाता है, जिनमें अक्सर स्पाइवेयर और मैलवेयर होते हैं।

हनी-ट्रैप का नया तरीका

अधिकारियों का कहना है कि अब हनी-ट्रैप नेटवर्क में पैसे और डर दिखाने के बजाय, व्यक्तिगत कमजोरियों का फायदा उठाया जा रहा है। मनोवैज्ञानिक करीबीपन और आकर्षण का उपयोग करके अधिकारियों को फंसाते हैं। इस प्रक्रिया में उन्हें पता भी नहीं चलता कि वे संवेदनशील जानकारी साझा कर रहे हैं।

ISI की नई रणनीति

हाल के मामलों में स्पष्ट हुआ है कि अधिकारियों की व्यक्तिगत समस्याओं का फायदा उठाना आईएसआई के लिए कारगर हो रहा है। जब अधिकारी मानसिक तनाव का सामना कर रहे होते हैं, तो वे अपनी निराशा को सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। यह तरीका पाकिस्तान के लिए सफल साबित हो रहा है, जिससे मनोवैज्ञानिकों की मांग बढ़ रही है।

भारतीय एजेंसियों की बढ़ती चिंता

हनी-ट्रैप में मनोवैज्ञानिकों की भूमिका बढ़ने से भारतीय एजेंसियों की चिंता भी बढ़ गई है। एक अधिकारी के अनुसार, यह स्थिति चिंताजनक है। नियमित रूप से एडवाइजरी जारी की जा रही है, फिर भी कई अधिकारी इस जाल में फंसते जा रहे हैं और अपने सिस्टम में डेटा लीक करने वाला सॉफ़्टवेयर इंस्टॉल कर लेते हैं।

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