चीन में खुला दुनिया का पहला रोबोट स्कूल, अब मशीनें पढ़ रहीं फिजिकल इंटेलिजेंस AI की पढ़ाई

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चीन ने रचा इतिहास: शंघाई और हांग्झोउ में खुले दुनिया के पहले ‘रोबोट स्कूल’, जहां मशीनें बन रही हैं कुशल वर्कफोर्स

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक तकनीक की वैश्विक रेस में चीन ने एक ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाया है, जिसने पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया है। चीन के पूर्वी शहर हांग्झोउ और शंघाई में दुनिया के पहले ‘रोबोट स्कूल’ (Humanoid Robot Training Schools) खोले गए हैं, जहां छात्र कोई इंसान नहीं, बल्कि दो पैरों पर चलने वाले इंसानों जैसे दिखने वाले ह्यूमनॉइड रोबोट्स (Humanoid Robots) हैं। यह कदम केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित रहने वाली तकनीक को सीधे कारखानों, अस्पतालों, और रोजमर्रा के काम के बाजार (वर्कफोर्स) में उतारने की दिशा में ‘AI के बाद का अगला बड़ा कदम’ (Embodied AI) माना जा रहा है।

टेक दिग्गजों के रोबॉट्स का स्कूल

इन खास प्रशिक्षण अकादमियों में शुरुआती बैच के तौर पर कई टेक कंपनियों के रोबोट्स का ‘दाखिला’ कराया गया है। यहाँ मानव प्रशिक्षक (Human Instructors) इन रोबोट्स को ठीक उसी तरह हुनर सिखा रहे हैं, जैसे किसी वोकेशनल या तकनीकी संस्थान में इंसानी छात्रों को करियर के लिए तैयार किया जाता है। कोर्सवर्क पूरा होने और कड़े इम्तिहान पास करने के बाद, इन रोबोट्स को बाकायदा ‘ग्रेजुएशन सर्टिफिकेट’ या ‘स्किल सर्टिफिकेट’ दिया जाएगा, जिसके बाद वे सीधे नौकरी करने के योग्य माने जाएंगे।

लैब से वर्कफोर्स तक: क्या है रोबोट स्कूल का पूरा कॉन्सेप्ट?

अब तक रोबोट्स को किसी खास प्रोग्रामिंग या चैटबॉट आधारित AI (जैसे चैटजीपीटी) के जरिए सिर्फ वर्चुअल दुनिया या तयशुदा इंडस्ट्रियल बेल्ट में कमांड्स फॉलो करना सिखाया जाता था। लेकिन चीन के इस नए प्रयोग का मकसद रोबोट्स के ‘फिजिकल इंटेलिजेंस’ या ‘एम्बॉइडेड एआई’ (Embodied AI) को निखारना है। हांग्झोउ रोबोट स्कूल और शंघाई स्थित ‘नेशनल एंड लोकल को-बिल्ट ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स इनोवेशन सेंटर’ जैसी संस्थाएं विभिन्न रोबोटिक स्टार्टअप और टेक दिग्गजों के लिए एक साझा मंच की तरह काम कर रही हैं। यहाँ अलग-अलग आकार, क्षमता और मॉडल के रोबोट एक ही ‘क्लासरूम’ में बैठकर ट्रेनिंग लेते हैं।

स्कूल की कार्यप्रणाली- हार्डवेयर चेकअप और एडमिशन

स्कूल में दाखिले से पहले रोबोट्स का कड़ा हार्डवेयर टेस्ट होता है, जिससे उनकी शारीरिक क्षमता और सेंसर की स्थिति जांची जाती है। रोबोट्स को उनकी बनावट के आधार पर चार मुख्य संकायों (Specialties) में बांटा जाता है- औद्योगिक कौशल (Technical/Industrial Skills), हेल्थकेयर व नर्सिंग (Healthcare & Nursing), परफॉर्मिंग आर्ट्स (Arts) और स्पोर्ट्स (Sports)।

गहन व्यावहारिक प्रशिक्षण

रोबोट्स को तीन से छह महीने के बेहद कड़े ट्रेनिंग प्रोग्राम से गुजरना पड़ता है, जहां वे इंसानी हरकतों को दोहराते हैं। कोर्स खत्म होने पर रोबोट्स का अंतिम मूल्यांकन (Final Assessment) होता है। परीक्षा पास करने वाले रोबोट्स को आधिकारिक योग्यता प्रमाण पत्र मिलता है।

सिलेबस में शामिल खेतों से लेकर नर्सिंग तक की पढ़ाई

इन स्कूलों में पढ़ रहे रोबोट्स का टाइमटेबल और सिलेबस काफी दिलचस्प है। विज्ञान गल्प (Science Fiction) फिल्मों की तरह दिखने वाली इन कक्षाओं में रोबोट्स को वे तमाम काम सिखाए जा रहे हैं जो अब तक केवल इंसानों के बस की बात माने जाते थे।
इंडस्ट्रियल और लॉजिस्टिक्स स्किल्स: कारखानों में सामान को सही ढंग से पकड़ना (Grasping), पार्ट्स को असेंबल करना, गोदामों में लॉजिस्टिक्स संभालना, ट्रे उठाना और भारी उपकरणों को सुरक्षित ढंग से एक जगह से दूसरी जगह ले जाना।
घरेलू और सर्विस सेक्टर के काम: कपड़े मोड़ना, उन पर प्रेस (Ironing) करना, डाइनिंग टेबल साफ करना, कप और प्लेट्स को सही जगह पर सजाना, और झाड़ू-पोछा करना।
हेल्थकेयर और नर्सिंग केयर: बुजुर्गों और मरीजों की देखभाल करना, दवाओं का समय याद रखना, मरीजों को सहारा देकर उठाना, और मुश्किल समय में इंसानों से बातचीत कर उनका हौसला बढ़ाना।
कला और खेल (Arts & Sports): कुछ रोबोट्स को उनके लचीलेपन को बढ़ाने के लिए डांस करना, म्यूजिक की धुन पर थिरकना, पेंटिंग की बारीकियां समझना और बुनियादी खेलों में हिस्सा लेना भी सिखाया जा रहा है।

AI के बाद का कदम’: रोबोट्स को कैसे दी जा रही है शिक्षा?

विशेषज्ञों का कहना है कि चैटबॉट या सॉफ्टवेयर आधारित एआई तैयार करना आसान है, क्योंकि उसके लिए डिजिटल डेटा इंटरनेट पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। लेकिन एक रोबोट को इंसानों की तरह हाथ हिलाना या कपड़े मोड़ना सिखाना सबसे कठिन काम है, क्योंकि इसके लिए ‘फिजिकल डेटा’ (Physical Data) की जरूरत होती है। इंसानों के लिए जो काम बेहद सामान्य हैं (जैसे जूते के फीते बांधना या कांच का ग्लास उठाना), वे मशीनों के लिए सबसे जटिल सबक हैं। इस ‘लास्ट माइल चैलेंज’ (Last Mile Challenge) को हल करने के लिए चीन के रोबोट स्कूलों में एडवांस तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
मोशन कैप्चर और वीआर (VR Headsets): मानव प्रशिक्षक अपने हाथों और शरीर पर मोशन कैप्चर सेंसर और वीआर गॉगल्स पहनते हैं। वे जो भी हरकत करते हैं (जैसे कपड़े मोड़ना), रोबोट का सिस्टम उस डेटा को हूबहू कैप्चर कर खुद को उसी ढर्रे पर ढालता है।
हजारों बार दोहराव (Repetition): रोबोटिक्स में सीख सहज ज्ञान (Instinct) से नहीं, बल्कि डेटा से आती है। इसलिए ट्रेनर एक ही काम को हजारों या दसियों हजार बार दोहराते हैं, ताकि रोबोट का ‘सुपर ब्रेन’ (Foundational AI Model) उस डेटा को पूरी तरह पचा सके।
विशालकाय डेटा सेंटर्स और नकली वातावरण: रोबोट्स को वास्तविक जीवन का अनुभव देने के लिए स्कूलों के भीतर ही नकली घर, स्मार्ट किचन, फैक्ट्रियां, अस्पताल के वार्ड और यहां तक कि अंधेरी खदानों जैसे ‘वन-टू-वन’ वास्तविक माहौल तैयार किए गए हैं।
चीन ने इस ट्रेनिंग से निकलने वाले डेटा को स्टोर करने के लिए देश भर में 40 से अधिक बड़े डेटा सेंटर स्थापित किए हैं।

ग्लोबल मार्केट पर राज करने की चीन की बड़ी रणनीतिक चाल

चीन का यह कदम सिर्फ तकनीकी दिखावा नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी वैश्विक औद्योगिक रणनीति (Industrial Strategy) छिपी हुई है। वर्तमान में चीन अपनी बूढ़ी होती आबादी और श्रम बल (Workforce) की कमी की समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में चीनी सरकार का लक्ष्य है कि वह जल्द से जल्द ह्यूमनॉइड रोबोट्स का बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) शुरू करे, ताकि श्रम की कमी को पूरा किया जा सके। शंघाई के इस ट्रेनिंग हब के साथ एक पायलट-प्रोडक्शन फैसिलिटी भी जोड़ी गई है, जिसमें हर साल 2,000 से अधिक पूरी तरह तैयार रोबोट्स का परीक्षण और निर्माण करने की क्षमता है। चीन का इरादा वैश्विक रोबोटिक्स और एआई सप्लाई चेन पर पूरी तरह से अपना दबदबा बनाना है।

पूरी दुनिया के लिए चेतावनी या रोजगार का नया जरिया?

चीन के इस प्रयोग ने दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों और टेक विशेषज्ञों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। कुछ आलोचक इसे वैश्विक रोजगार बाजार के लिए एक ‘चेतावनी’ के रूप में देख रहे हैं। अगर रोबोट्स को इस तरह ट्रेनिंग देकर फैक्ट्रियों और अस्पतालों में तैनात किया जाने लगा, तो ब्लू-कॉलर जॉब्स (जैसे डिलीवरी, मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग, और नर्सिंग) पर सीधा संकट आ सकता है।हालांकि, इसका दूसरा पहलू यह भी है कि इस इंडस्ट्री के आने से नए तरह के रोजगार पैदा हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, चीन के इन रोबोटिक स्कूलों में बड़ी संख्या में युवा ‘रोबोट ट्रेनर’ (Robot Trainers) और डेटा विश्लेषकों की नौकरियां पा रहे हैं, जिन्हें ‘जनरेशन-जेड’ (Gen-Z) के युवाओं का नया हॉटस्पॉट करियर माना जा रहा है।

भविष्य की ओर बढ़ता कदम

हांग्झोउ और शंघाई के ये रोबोट स्कूल इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि भविष्य अब दूर नहीं है। आने वाले कुछ ही सालों में, यह मुमकिन है कि जब आप किसी अस्पताल, होटल, या बड़ी ऑटोमोबाइल फैक्ट्री में जाएं, तो वहां काम कर रहा रोबोट किसी लैब से सीधा आया हुआ नौसिखिया न हो, बल्कि किसी प्रतिष्ठित ‘रोबोट स्कूल’ से बकायदा डिग्री और मेडल प्राप्त ‘ग्रेजुएट’ कर्मचारी हो। चीन का यह प्रयोग AI की दुनिया में एक नए युग का सूत्रपात कर चुका है, जिसकी लहरें जल्द ही पूरी दुनिया में महसूस की जाएंगी।

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