G-3 की नई बिसात, ट्रंप और जिनपिंग के गठजोड़ से बदलेगा पावर गेम, ब्रिक्स सम‍िट में भारत की अग्निपरीक्षा!

The CSR Journal Magazine
जब दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था और ‘ग्लोबल साउथ’ के उभार के नारे लगा रही है, ठीक उसी वक्त पर एक नया वैश्विक समीकरण आकार ले रहा है, जिसे G-3 कहा जा रहा है। यह समीकरण अमेरिका, चीन और रूस की भागीदारी को दर्शाता है। हालांकि ब्रिक्स (BRICS) का मंच पश्चिम के दबदबे को चुनौती देने का दावा करता है, लेकिन इसके दो प्रमुख स्तंभ, रूस और चीन, ट्रंप प्रशासन के साथ नए सिरे से गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

गठजोड़ की संभावनाएं और भारत की स्थिति

अगर दुनिया के तीन बड़े खिलाड़ी आपस में एक नया गठजोड़ बनाने की सोचते हैं, तो यह ब्रिक्स के भविष्य को कैसे प्रभावित करेगा? नई दिल्ली में यह सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। ब्रिक्स की सदस्यता में करीब 45% वैश्विक आबादी और 28% वैश्विक जीडीपी का प्रतिनिधित्व शामिल है, और इसका न्यू डेवलपमेंट बैंक विकासशील देशों के लिए महत्वपूर्ण निवेश स्रोत है। भारत इसे बहुध्रुवीय मंच के रूप में देखता है, जिसमें किसी विशेष देश या गुट के खिलाफ नहीं बल्कि ग्लोबल साउथ की आवाज बुलंद करना शामिल है।

ब्रिक्स और अमेरिका का संतुलन

भारत की यह कोशिश है कि ब्रिक्स को अमेरिका की चिंता से संयुक्त न किया जाए। जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट अयांग्सा मैत्रा के अनुसार, भारत का विदेश मंत्रालय लगातार यह स्पष्ट कर रहा है कि उसे ब्रिक्स को किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार के मंच के रूप में देखता है। भारत अपने क्वाड संबंधों के चलते अमेरिका के साथ मजबूत स्थिति बनाए रखना चाहता है।

मध्य पूर्व में चुनौतियाँ

ईरान और यूएई की मौजूदगी के बाद मध्य पूर्व की जटिलताएँ बढ़ गई हैं। भारत के लिए यह चुनौती है कि वह दोनों देशों के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखे। UAE एक प्रमुख व्यावसायिक साझेदार है, जबकि ईरान चाबहार पोर्ट के माध्यम से रणनीतिक मूल्य रखता है।

संयुक्त घोषणापत्र की राह में रुकावटें

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सभी देशों की सहमति से ‘संयुक्त घोषणापत्र’ जारी करना है। ईरान और यूएई के बीच के तनाव और रूस-यूक्रेन संघर्ष के चलते इस घोषणापत्र पर सहमति बनाना कठिन हो सकता है। भारत का प्रयास रहेगा कि घोषणापत्र में राजनीतिक बयानबाजी की बजाय समावेशी विकास और आतंकवाद के खिलाफ ठोस विचार शामिल हों।

शेयर की जानी वाली मुद्रा का सवाल

कुछ देश जैसे ईरान और रूस साझा मुद्रा बनाने की दिशा में जा रहे हैं, लेकिन भारत इस विचार के खिलाफ है। स्थिति यह है कि सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं में भिन्नता के कारण ऐसी किसी साझा मुद्रा का निर्माण संभव नहीं है। भारत अपनी राष्ट्रीय मुद्रा में द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

भारत की कूटनीति का परीक्षण

भारतीय सरकार का मानना है कि डॉलर को पूरी तरह से हटाना व्यवहारिक नहीं है। भारत अपनी ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति के तहत ब्रिक्स को आगे बढ़ाते हुए अमेरिका के साथ भी रिश्ते मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

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