तेल का खेल और हूती विद्रोह: यमन के रण में मारिब बना नया रणनीतिक केंद्र

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तेल भंडार और हूती विद्रोह: कैसे बदल रहा है यमन का राजनीतिक परिदृश्य? मारिब: एक रणनीतिक केंद्र

पश्चिम एशिया में चल रहा भू-राजनीतिक संघर्ष अब एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है, जिसने न केवल यमन के आंतरिक राजनीतिक ढांचे को हिलाकर रख दिया है, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को संकट में डाल दिया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा हाल ही में लाल सागर के बेहद महत्वपूर्ण मोखा बंदरगाह और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में स्थित पेरिम (मय्यून) द्वीप पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने के बाद यमन का युद्ध एक नए और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश कर गया है। इस पूरे परिदृश्य में ‘मारिब’ प्रांत एक बार फिर गृहयुद्ध का सबसे बड़ा और केंद्रीय मोर्चा बनकर उभरा है। तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडारों से समृद्ध मारिब आज यह तय करने की स्थिति में है कि यमन पर किसका शासन होगा और वैश्विक तेल बाजारों में स्थिरता बनी रहेगी या नहीं।

लाल सागर से मारिब तक: हूतियों की रणनीतिक बढ़त

यमन में साल 2014 से जारी गृहयुद्ध ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमन सरकार, जिसे सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन का समर्थन प्राप्त है, लंबे समय से सना सहित उत्तरी यमन के बड़े हिस्सों को हूतियों के नियंत्रण से मुक्त कराने की कोशिश कर रही थी। हालांकि, हालिया हफ्तों में सैन्य संतुलन पूरी तरह हूतियों के पक्ष में झुकता दिखाई दे रहा है। हूती विद्रोहियों ने यमन के पूरे लाल सागर तट को अपने नियंत्रण में लेने का दावा किया है। बाब अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक व्यापारिक मार्ग के दक्षिणी प्रवेश द्वार पर कब्जा करके उन्होंने सऊदी अरब के तेल निर्यात के लिए एक अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है।सऊदी अरब होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव के कारण अपने कुल कच्चे तेल के निर्यात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए लाल सागर के यानबू बंदरगाह भेज रहा था, ताकि वहां से तेल सुरक्षित रूप से एशिया और यूरोप जा सके। लेकिन अब बाब अल-मंदेब पर हूतियों के बढ़ते प्रभाव ने इस वैकल्पिक मार्ग को भी बेहद संवेदनशील बना दिया है। इस तटीय बढ़त के बाद अब हूतियों का पूरा ध्यान यमन के भीतर मौजूद सबसे बड़े आर्थिक केंद्र ‘मारिब’ पर केंद्रित हो गया है।

मारिब: यमन का रणनीतिक और आर्थिक दिल

मारिब को समझने के लिए यमन के आर्थिक भूगोल को समझना जरूरी है। यह प्रांत सदियों से ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन आधुनिक यमन में इसकी अहमियत पूरी तरह से इसके प्राकृतिक संसाधनों पर टिकी है। मारिब को यमन का ‘आर्थिक दिल’ कहा जाता है, और इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं।
तेल और गैस के विशाल भंडार: मारिब यमन के उन चुनिंदा क्षेत्रों में से एक है जहां देश के सबसे बड़े हाइड्रोकार्बन भंडार मौजूद हैं। यहां से निकलने वाला कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस यमन की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे हैं। मारिब में स्थित ‘सफिर’ रिफाइनरी और तेल क्षेत्र पूरे देश की घरेलू ईंधन और गैस आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। यदि हूती इस पर कब्जा कर लेते हैं, तो वे आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएंगे, जिससे उन्हें अपनी युद्ध मशीनरी को अनिश्चित काल तक चलाने का फंड मिल जाएगा।
केंद्रीय बिजली ग्रिड (पावर स्टेशन): मारिब में यमन का मुख्य गैस आधारित बिजली संयंत्र स्थित है, जो राजधानी सना सहित देश के एक बड़े हिस्से को बिजली की आपूर्ति करता है। इस पावर ग्रिड पर नियंत्रण का मतलब है कि यमन के नागरिक बुनियादी ढांचे की चाबी पूरी तरह उस शक्ति के हाथ में आ जाएगी जो मारिब पर राज करेगी।
भूगोलीय अवस्थिति: मारिब की सीमाएं सऊदी अरब के दक्षिणी छोर से लगती हैं और यह सना तथा पूर्वी तेल-समृद्ध प्रांतों (जैसे शबवा और हदरामौत) के बीच एक पुल का काम करता है। मारिब पर नियंत्रण स्थापित करके हूती विद्रोही न केवल उत्तरी यमन में अपना एकछत्र राज स्थापित कर लेंगे, बल्कि वे सऊदी अरब की सीमाओं के और करीब पहुंच जाएंगे।

वैश्विक तेल बाजार पर सीधा असर और बढ़ती महंगाई

यमन का संकट अब सिर्फ एक स्थानीय या क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक बड़ी सिरदर्दी बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) और ओपेक (OPEC) के हालिया आंकड़े बताते हैं कि सऊदी अरब के तेल उत्पादन और निर्यात में भारी गिरावट दर्ज की गई है। हूतियों द्वारा सऊदी अरब के तेल बुनियादी ढांचे और लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाए जाने की धमकियों के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने की राह पर है, जबकि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बाजारों में डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। ऊर्जा की इन बढ़ी हुई कीमतों ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों पर ब्याज दरें बढ़ाने का भारी दबाव बनाया है, जिससे वैश्विक आर्थिक मंदी का खतरा और गहरा गया है। हूतियों ने स्पष्ट किया है कि वे केवल सऊदी अरब और उनके सहयोगियों के जहाजों को निशाना बना रहे हैं, लेकिन जहाजों का बीमा प्रीमियम (इन्शुरन्स) इतना बढ़ चुका है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह चरमरा गई है।

बदलता राजनीतिक परिदृश्य और अंतरराष्ट्रीय समीकरण

मारिब की लड़ाई ने यमन के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से ध्रुवीकृत कर दिया है। 2022 में संयुक्त राष्ट्र (UN) की मध्यस्थता में हुआ संघर्षविराम अब पूरी तरह से बेअसर हो चुका है। यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार, जो सना से बेदखल होने के बाद अदन से काम कर रही थी, अब बेहद कमजोर स्थिति में है। वहीं दूसरी ओर, दक्षिणी अलगाववादी समूह (STC) जैसी ताकतें जो पहले सरकार के साथ मिलकर हूतियों के खिलाफ लड़ रही थीं, उनके आपसी मतभेद भी इस संकट को बढ़ा रहे हैं। इस संघर्ष के पीछे चल रहा छद्म युद्ध (प्रॉक्सी वॉर) भी अब खुलकर सामने आ गया है। एक तरफ ईरान है जो हूतियों को हथियारों, ड्रोन और सैन्य प्रशिक्षण के जरिए मजबूत कर रहा है, ताकि वह अमेरिका और इजरायल के खिलाफ पश्चिम एशिया में अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत कर सके। दूसरी तरफ सऊदी अरब है जो अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय साख को बचाने के लिए यमन सरकार के पीछे खड़ा है। अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा हूतियों पर की गई जवाबी सैन्य कार्रवाई भी इस विद्रोही गुट के हौसलों को पस्त करने में नाकाम रही है।

मानवीय त्रासदी: युद्ध की सबसे भीषण मार

इस पूरे राजनीतिक और आर्थिक घमासान के बीच यमन की आम जनता इतिहास की सबसे भयावह मानवीय त्रासदी झेलने को मजबूर है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों के मुताबिक, सितंबर के शुरुआती हफ्तों में ही भड़की ताजा लड़ाई के कारण यमन में 80,000 से अधिक लोग बेघर हो चुके हैं। मारिब प्रांत, जो कभी यमन के अन्य हिस्सों से भागे हुए लाखों विस्थापितों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह माना जाता था, आज खुद युद्ध के मैदान में तब्दील हो चुका है। देश में ब्लैक मार्केट में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिसके कारण अस्पतालों को चलाना, साफ पानी की आपूर्ति करना और खाद्य पदार्थों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना लगभग असंभव होता जा रहा है। यमन इस समय भुखमरी और महामारियों के कगार पर खड़ा है।

आगे की मुश्किल राह

यमन का राजनीतिक परिदृश्य आज उस मुहाने पर है जहां से वापसी का कोई आसान रास्ता नहीं दिखता। लाल सागर पर हूतियों की हालिया जीत और मारिब को हथियाने की उनकी आक्रामक जिद यह साफ संकेत देती है कि विद्रोही गुट अब यमन की वास्तविक सत्ता के रूप में खुद को स्थापित कर चुका है। मारिब का भविष्य केवल यमन की संप्रभुता को ही तय नहीं करेगा, बल्कि यह आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया में शक्ति के संतुलन की नई इबारत लिखेगा। यदि मारिब का पतन होता है, तो यमन में शांति की बची-कुची उम्मीदें भी समाप्त हो जाएंगी और दुनिया को एक लंबे समय तक चलने वाले ऊर्जा संकट के लिए तैयार रहना होगा।

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