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March 4, 2026

कहीं संतों का श्राप, कहीं राजा का फरमान… इन गांवों में क्यों नहीं खेली जाती होली?

The CSR Journal Magazine
भारत में होली का नाम लेते ही गुलाल से रंगी गलियां, ढोल की थाप और हंसी-ठिठोली का दृश्य सामने आ जाता है। मथुरा से लेकर मुंबई तक यह त्योहार उत्साह, प्रेम और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। लेकिन देश के कुछ हिस्से ऐसे भी हैं जहां होली के दिन न रंग उड़ते हैं और न ही ढोल बजते हैं। इन जगहों पर सन्नाटा यूं ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी मान्यताओं और लोककथाओं की वजह से कायम है।

झारखंड का दुर्गापुर: 350 साल से सूनी होली

झारखंड के बोकारो जिले का दुर्गापुर गांव एक अनोखी परंपरा निभा रहा है। यहां पिछले लगभग 350 वर्षों से होली नहीं मनाई जाती। लोककथाओं के अनुसार, होली के दिन राजा के पुत्र की असमय मृत्यु हो गई थी। कुछ समय बाद स्वयं राजा भी चल बसे। शोक में डूबे शासक ने गांव में होली मनाने पर रोक लगा दी। आज भी ग्रामीणों का विश्वास है कि उनके ग्राम देवता इस पर्व को स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि यदि होली मनाई गई तो गांव पर विपत्ति आ सकती है।

उत्तराखंड के क्विली और कुरझाण: देवी की शांति सर्वोपरि

रुद्रप्रयाग की पहाड़ियों में बसे क्विली और कुरझाण गांवों में भी होली का शोर नहीं सुनाई देता। यहां की आस्था स्थानीय देवी त्रिपुरा बाला त्रिपुर सुंदरी से जुड़ी है। ग्रामीणों का मानना है कि देवी को शोर-शराबा पसंद नहीं, इसलिए उनके सम्मान में होली जैसे रंग और धूमधाम वाले त्योहार से परहेज किया जाता है। हिमालयी समाज में देव आस्था इतनी गहरी है कि वही सामाजिक नियम तय करती है।

पुलिकट झील: परंपरा का अलग रंग

आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित पुलिकट झील के आसपास रहने वाले समुदायों में भी होली का विशेष चलन नहीं है। इस समय उनके धार्मिक कैलेंडर में मासी मगम जैसे पर्व का अधिक महत्व होता है। श्रद्धालु पवित्र स्नान और मंदिर उत्सवों में भाग लेते हैं, इसलिए रंगों का उत्सव यहां प्राथमिकता नहीं पाता।

गुजरात का रामसन: संतों के श्राप की कथा

गुजरात के बनासकांठा जिले का रामसन गांव भी करीब 300 साल से होली से दूर है। लोक मान्यता है कि किसी समय गांव के शासक ने संतों का अपमान किया था। नाराज संतों ने श्राप दिया कि यहां होली मनाना दुर्भाग्य लाएगा। तब से ग्रामीण न होलिका दहन करते हैं और न गुलाल खेलते हैं। उनके लिए यह दिन सामान्य दिन की तरह गुजरता है।

पुडुचेरी: अलग सांस्कृतिक पहचान

पुडुचेरी के फ्रेंच और तमिल इलाकों में भी होली सीमित रूप में ही दिखती है। यहां पोंगल और दीपावली जैसे त्योहार अधिक प्रमुख हैं। फ्रेंच क्वार्टर की गलियों में होली के दिन भी सामान्य गतिविधियां चलती रहती हैं, जिससे यह क्षेत्र अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाए रखता है।
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