यूरोप में राइट विंग का उभार: क्या ये ग्लोबल बदलाव का संकेत?

The CSR Journal Magazine

जर्मनी में एएफडी की बढ़ती लोकप्रियता

यूरोप में राइट विंग के उभार की चर्चा अब तेज़ी से हो रही है। हाल ही में जर्मनी में एएफडी (ऑल्टरनेटिव फॉर जर्मनी) पार्टी ने विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया है। पार्टी ने 44 फीसदी वोट प्राप्त कर बड़ी जीत दर्ज की, जबकि चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स की पार्टी सीडीयू केवल 17-18 फीसदी वोट ले पाई। ये चुनावी परिणाम यह दर्शाते हैं कि राइट विंग का इस तेज़ी से उभार एक नया राजनीतिक ट्रेंड बन रहा है।

राइट विंग का प्रभाव और वैश्विक संकेत

जर्मनी की इस जीत के साथ-साथ, ईरूप में अन्य देशों में भी राइट विंग पार्टियों की लोकप्रियता बढ़ रही है। 31 देशों में हुए एक रिसर्च के मुताबिक, हर चार में से एक यूरोपीय नागरिक राइट विंग पार्टियों को अपना वोट दे रहा है। यह आंकड़ा 1995 में केवल 5 फीसदी था, जो अब 23 फीसदी तक पहुंच चुका है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या यह स्थिति केवल यूरोप तक सीमित है या इसका असर विश्व राजनीति पर भी पड़ेगा?

संख्यात्मक बढ़त और राजनीतिक रणनीति

इस राजनीतिक परिवर्तन के पीछे कई कारण हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है इमीग्रेशन और राष्ट्रवाद। कई यूरोपीय देशों की दक्षिणपंथी पार्टियों ने चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत की है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रिया की फ्रीडम पार्टी, जिसने 2019 में 16.2 फीसदी वोट हासिल किए थे, अब 29.2 फीसदी वोट ले चुकी है। ये सभी संकेत करते हैं कि यह रुझान और भी मजबूत हो रहा है।

मुख्यधारा की पार्टियों का प्रतिक्रिया

मुख्यधारा की पार्टियां भी अब ऐसे मुद्दों पर दक्षिणपंथी सोच की ओर खिसकने लगी हैं। इमीग्रेशन जैसे विषयों पर उनकी रणनीति भी बदल रही है। इसके पीछे का कारण यह है कि राइट विंग पार्टियों की सफलता ने उन्हें एक सामान्य राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित कर दिया है।

लोकतांत्रिक संस्थाओं पर खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि राइट विंग पार्टियों का बढ़ता प्रभाव लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा बन सकता है। ऐसी सरकारें अक्सर संसद, न्यायपालिका और मीडिया की स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिश करती हैं। इसके अलावा, मानवाधिकारों पर भी असर डालने की संभावना बढ़ जाती है।

सामाजिक ध्रुवीकरण और पर्यावरणीय प्रभाव

राइट विंग पार्टियों के सख्त इमीग्रेशन नीतियों के चलते समाज में जाति, धर्म और वर्ग की आधार पर विभाजन देखे जा सकते हैं। साथ ही, ‘राष्ट्र-प्रथम’ नीतियों के चलते जलवायु परिवर्तन और वैश्विक व्यापार जैसे मुद्दों पर भी बाधाएं आ सकती हैं।

आने वाले समय की चुनौतियाँ

रिसर्च बताती है कि जब लोकलुभावन ताकतें सत्ता में आती हैं, तो लोकतंत्र पर दबाव बढ़ जाता है। यूरोप में राइट विंग का उभार अब कोई असामान्य बात नहीं रह गई है, बल्कि यह एक बड़ा महाद्वीपीय ट्रेंड बन चुका है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बदलाव का असर बाकी दुनिया पर भी पड़ेगा।

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