बेखौफ अपराधी, लाचार कानून: बिहार के जमुई कांड ने खोली सुशासन की पोल

The CSR Journal Magazine

बिहार में शर्मनाक घटना: जमुई का वायरल वीडियो और समाज की चुप्पी

बिहार के जमुई जिले से हाल ही में सामने आया एक भयावह और विचलित करने वाला वीडियो केवल एक अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारी सामाजिक चेतना की मृत्यु का एक जीता-जागता दस्तावेज़ है। कोचिंग से लौट रहे नाबालिग छात्र-छात्राओं के साथ सरेआम सड़क पर की गई बर्बरता, प्रताड़ना और यौन उत्पीड़न की इस घटना ने कानून व्यवस्था के दावों को तो तार-तार किया ही है, साथ ही उस समाज के चेहरे से भी नकाब हटा दिया है जो खुद को ‘संस्कारी’ और ‘सभ्य’ कहता है। सबसे डरावना पहलू यह है कि जब यह सब हो रहा था, तब वहां मौजूद भीड़ पीड़ितों को बचाने के बजाय इस वीभत्स दृश्य का वीडियो बनाने और तमाशबीन बनने में मशगूल थी। यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि एक समाज के रूप में हम कितने संवेदनहीन और नैतिक रूप से खोखले हो चुके हैं।

घटना का खौफनाक मंजर और कानून व्यवस्था पर सवाल

यह घटना जमुई जिले के एक व्यस्त इलाके की बताई जा रही है, जहां दिनदहाड़े कुछ असामाजिक तत्वों ने पढ़ने जा रहे या कोचिंग से लौट रहे मासूम बच्चों को घेर लिया। अपराधियों ने न सिर्फ लड़कियों के साथ बदसलूकी और यौन उत्पीड़न किया, बल्कि उनके साथ मौजूद छात्रों को भी बेरहमी से पीटा। यह सब किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि खुलेआम सड़क पर हुआ। इस घटना ने सुशासन के तमाम दावों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। आखिर अपराधियों में पुलिस और कानून का खौफ इतना कम क्यों हो गया है कि वे दिन के उजाले में, सार्वजनिक स्थान पर ऐसी घिनौनी हरकत को अंजाम देने से भी नहीं हिचकिचाते? क्या हमारी पुलिस व्यवस्था सिर्फ कागजों पर मुस्तैद है? जब अपराधी इतने बेखौफ हो जाएं कि वे खुद अपनी बर्बरता का वीडियो बनाने दें या उन्हें इस बात का डर न हो कि कोई उन्हें पकड़ लेगा, तो समझ जाना चाहिए कि प्रशासनिक तंत्र में कहीं गहरी सड़न आ चुकी है। पुलिस द्वारा बाद में की जाने वाली गिरफ्तारियां केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह जाती हैं, जबकि असली जरूरत उस खौफ को पैदा करने की है जो ऐसी घटनाओं को होने ही न दे।

तमाशबीन समाज: मोबाइल कैमरे की फ्लैश में मरती संवेदनाएं

जमुई की इस घटना का सबसे घिनौना और चिंताजनक पहलू वहां मौजूद भीड़ का व्यवहार था। जब उन मासूम बच्चों की चीखें गूंज रही थीं, जब वे मदद के लिए गुहार लगा रहे थे, तब आसपास खड़े दर्जनों लोग मूकदर्शक बने रहे। किसी भी शख्स ने आगे बढ़कर अपराधियों को रोकने की हिम्मत नहीं दिखाई। इसके विपरीत, लोग अपने मोबाइल फोन निकालकर इस शर्मनाक हरकत को कैमरे में कैद करने में व्यस्त थे। आज का समाज ‘डिजिटल वॉयरिज्म’ (दूसरों के दुख और उत्पीड़न को कैमरे में कैद कर आनंद लेने की प्रवृत्ति) का शिकार हो चुका है। हम किसी तड़पते हुए इंसान की मदद करने के लिए हाथ बढ़ाने से पहले अपना फोन निकालकर वीडियो बनाना ज्यादा जरूरी समझते हैं, ताकि उसे सोशल मीडिया पर ‘वायरल’ कर सकें। यह प्रवृत्ति एक मानसिक बीमारी की तरह फैल रही है। जमुई में जुटी वह भीड़ केवल मूकदर्शक नहीं थी, बल्कि वह उस अपराध में बराबर की भागीदार थी। जब समाज अपराधियों का विरोध करना बंद कर देता है, तो वह परोक्ष रूप से अपराध को अपनी मौन स्वीकृति दे रहा होता है।

डर और समाज की चुप्पी के पीछे का मनोविज्ञान

आखिर क्यों लोग मदद के लिए आगे नहीं आए? इस चुप्पी के पीछे कई सामाजिक और प्रशासनिक कारण छिपे हैं। पहली वजह है—”मुझे क्या फर्क पड़ता है” वाली मानसिकता। जब तक कोई आपदा या अपराध हमारे अपने परिवार के साथ नहीं होता, हम उसे दूसरों की समस्या मानकर आंखें मूंद लेते हैं। दूसरी वजह है पुलिसिया कार्रवाई और कानूनी पचड़ों का डर। आम नागरिक अक्सर यह सोचकर पीछे हट जाता है कि अगर वह बीच-बचाव करेगा, तो अपराधी उसके दुश्मन बन जाएंगे या फिर उसे अदालतों और थानों के चक्कर काटने पड़ेंगे। गवाहों की सुरक्षा को लेकर हमारे देश में जो लचर व्यवस्था है, वह भी आम आदमी को ‘अवांछित नायक’ बनने से रोकती है। लेकिन क्या यह डर इतना बड़ा होना चाहिए कि हम अपनी आंखों के सामने किसी मासूम की अस्मत और जिंदगी को लुटते हुए देखते रहें? यदि आज हम दूसरों के बच्चों के लिए नहीं बोलेंगे, तो कल जब हमारे अपने संकट में होंगे, तब हमारे लिए बोलने वाला भी कोई नहीं बचेगा।

सोशल मीडिया का आत्मघाती इस्तेमाल

सोशल मीडिया जिसे सूचनाओं के आदान-प्रदान और जागरूकता का माध्यम होना चाहिए था, वह अब विकृत मानसिकता को परोसने का जरिया बनता जा रहा है। जमुई के इस वीडियो को जिस तरह से सोशल मीडिया पर शेयर और फॉरवर्ड किया गया, उसने पीड़ितों के मानसिक आघात (ट्रॉमा) को कई गुना बढ़ा दिया। कानूनन किसी भी यौन उत्पीड़न या नाबालिग पीड़ित की पहचान उजागर करना अपराध है, लेकिन इंटरनेट की दुनिया में इन नियमों की धज्जियां उड़ा दी गईं। वीडियो को वायरल करने वाले लोग यह भूल गए कि वे पीड़ितों को बार-बार उस जघन्य कृत्य से गुजार रहे हैं। यह डिजिटल असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा है, जहां ‘व्यूज’ और ‘लाइक्स’ की होड़ में मानवीय गरिमा को पूरी तरह भुला दिया जाता है।

खोखली होती शिक्षा और नैतिक मूल्य

यह घटना इस बात का भी प्रमाण है कि हमारी शिक्षा प्रणाली और पारिवारिक परवरिश में कहीं न कहीं कोई बहुत बड़ी कमी रह गई है। हम अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर और अफसर बनाने की होड़ में दौड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें एक संवेदनशील और अच्छा इंसान बनाना भूल रहे हैं। यदि शिक्षा पुरुषों को महिलाओं का सम्मान करना और कमजोरों की रक्षा करना नहीं सिखा पा रही है, तो वह शिक्षा पूरी तरह से व्यर्थ है। स्कूलों और कॉलेजों में केवल किताबी ज्ञान देने के बजाय नैतिक शिक्षा, जेंडर संवेदीकरण (Gender Sensitization) और नागरिक कर्तव्यों का पाठ पढ़ाया जाना अनिवार्य होना चाहिए।

अब सिर्फ निंदा से काम नहीं चलेगा

जमुई की यह शर्मनाक घटना बिहार या देश की कोई पहली घटना नहीं है, और यदि हम अब भी नहीं जागे, तो यह आखिरी भी नहीं होगी। इस मामले में केवल चंद अपराधियों को जेल भेज देने से न्याय पूरा नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि-
त्वरित न्याय (Fast-Track Trial): अपराधियों को इतनी सख्त और जल्द सजा मिले जो मिसाल बन सके, ताकि भविष्य में कोई भी ऐसा करने की सोच भी न सके।
पुलिस की जवाबदेही: उस इलाके के जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई हो, जिन्होंने गश्त और सुरक्षा में ढिलाई बरती।
मूकदर्शकों के लिए कड़े नियम: कानून में ऐसे प्रावधान होने चाहिए जहां सरेआम हो रहे अपराध को देखकर भी अनदेखा करने वाले और वीडियो बनाने वाले तमाशबीनों को भी कानूनी रूप से जवाबदेह ठहराया जा सके।
सामाजिक आत्ममंथन: हमें अपने घरों में, अपने समाज में संवाद शुरू करना होगा। चुप्पी तोड़नी होगी और अपराध के खिलाफ खड़े होने का साहस जुटाना होगा।
यह समय केवल शोक व्यक्त करने या सोशल मीडिया पर आक्रोश जताने का नहीं है। यह समय अपने भीतर झांकने का है कि हम एक समाज के रूप में जीवित हैं या केवल चलती-फिरती लाशों का एक समूह बनकर रह गए हैं। जमुई की चीखें हमसे सवाल पूछ रही हैं—क्या हम वाकई एक सभ्य समाज हैं?

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