दिल्ली में बेटियों के लिए खुला नया आंगन, बेटों की गोद लेने में कमी

The CSR Journal Magazine
दिल्ली में एक नई सोच का उदय हो रहा है, जहां लोग बेटों की बजाय बेटियों को गोद लेने में रुचि दिखा रहे हैं। पिछले एक दशक में, यह देखा गया है कि दिल्लीवालों ने बेटों के मोह को छोड़कर बेटियों को अपनाने की ओर कदम बढ़ाया है। महिला एवं बाल विकास विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 11 वर्षों में गोद लिए गए बच्चों में बेटियों की संख्या बेटों से लगभग 24 प्रतिशत अधिक रही है।

आशियाना पाने वाले बच्चों की संख्या

दिल्ली में 2015-16 से 2025-26 के बीच, 1000 से अधिक बेटियों को नया घर मिला, जबकि बेटों की संख्या मात्र 760 रही। यह आंकड़े इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि समाज में बेटियों के प्रति सोच में बदलाव आ रहा है। 2015-16 में गोद लेने का क्रेज अपने चरम पर था, जब रिकॉर्ड 178 बच्चों को नए परिवार मिले। हालांकि, इसके बाद कुछ वर्षों में यह संख्या घटती गई।

कोरोना का प्रभाव

कोरोना महामारी और प्रशासनिक बदलावों के कारण 2021-22 में गोद लिए गए बच्चों की संख्या गिरकर केवल 87 रह गई। लेकिन, धीरे-धीरे स्थिति में सुधार होने लगा और लोग फिर से बच्चों को गोद लेने के लिए आगे आने लगे। 2026 में जनवरी से सितंबर के बीच 71 बच्चों को गोद लिया गया, जिसमें अप्रैल में सबसे ज्यादा 14 बच्चे गोद लिए गए।

विशेष बच्चों के लिए उम्मीद की किरण

2025-26 का साल इस मामले में खास रहा, जब कई परिवारों ने शारीरिक या मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे बच्चों को गोद लिया। इस साल लगभग छह ऐसे बच्चों को गोद लिया गया, जो विशेष जरूरतों वाले थे। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बच्चों की देखभाल करना एक बड़ी जिम्मेदारी होती है, इसलिए इन्हें गोद लेने की दर पहले बहुत कम थी।

महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रयास

महिला एवं बाल विकास विभाग के विशेष प्रयासों और संभावित माता-पिता की काउंसलिंग के जरिए इस चुनौती को पार किया गया। खुशी की बात यह है कि इन छह विशेष बच्चों में से दो को देश के भीतर और चार को विदेश में रहने वाले परिवारों ने अपनाया है। यह एक सकारात्मक बदलाव है, जो समाज में विशेष बच्चों के प्रति सोच में बदलाव लाने का संकेत है।

गोद लेने की प्रक्रिया का महत्व

बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम और गोद लेने से जुड़े नियमों के तहत होती है। इस प्रक्रिया में बच्चों को चार आयु वर्गों में बांटा गया है, ताकि माता-पिता अपनी पसंद और सहूलियत के अनुसार बच्चों का चयन कर सकें। ये आयु वर्ग 2 साल तक, 2 से 4 साल, 4 से 8 साल और 8 से 18 साल के बीच हैं।

समाज में बदलाव की दिशा

दिल्ली में बेटियों को गोद लेने की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि समाज में सोच में बदलाव आ रहा है। लोग अब बेटियों को भी अपनाने में आगे आ रहे हैं, जो कि एक सकारात्मक संकेत है। यह बदलाव न केवल बच्चों के लिए बेहतर भविष्य की उम्मीद जगाता है, बल्कि समाज में समानता की दिशा में भी एक कदम है।

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