इजराइल में मुसलमानों को वोटर लिस्ट से बाहर करने की तैयारी, नेतन्याहू की चुनावी चाल?

The CSR Journal Magazine

वेधने का फैसला: किसकी बारी?

इजराइल की चुनाव कमेटी ने 27 अक्टूबर के चुनाव से पहले बड़ी अरब पार्टियों रा’म और जॉइंट लिस्ट को बाहर करने का फैसला किया है। यह निर्णय 23 सितंबर को लिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि ये पार्टियां चुनाव में भाग ले सकेंगी या नहीं। बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ताधारी लिकुड पार्टी ने इस कदम का समर्थन किया है।

क्या है कानून का आधार?

यह कार्रवाई बेसिक लॉ: द नेसेट की धारा 7A के तहत की गई है। इस धारा के अनुसार, किसी पार्टी या उम्मीदवार को चुनाव से बाहर रखा जा सकता है यदि वे इजराइल को यहूदी और लोकतांत्रिक देश मानने से इनकार करते हैं या फिर नस्लवाद भड़काते हैं। रा’म पार्टी के खिलाफ याचिकाएं लिकुड पार्टी और अन्य संगठनों द्वारा दायर की गई थीं।

क्या कहती हैं पार्टियां?

रा’म पार्टी और जॉइंट लिस्ट ने इस निर्णय को अस्वीकार किया है और संकेत दिया है कि वे इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी। उनके नेता मंसूर अब्बास का कहना है कि यह फैसला राजनीति से प्रेरित है। जॉइंट लिस्ट में हदाश, ताअल और बालद पार्टियां शामिल हैं और इनकी रद्दीकरण की खबर ने क्षेत्र में हलचल मचा दी है।

आसन्न चुनाव पर क्या होगा असर?

इस फैसले का अरब वोटर्स पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। 2021 में रा’म ने नफ्ताली बेनेट की सरकार बनाने में मदद की थी, जिससे नेतन्याहू की 12 साल की सत्ता का अंत हुआ। अब लिकुड ने अरब पार्टियों को चुनाव से बाहर करने की मांग की है। हालिया सर्वेक्षणों में जॉइंट लिस्ट और रा’म के लिए सीटें मिलने का अनुमान 12 था। हालांकि, अरब पार्टियों का वोटिंग पैटर्न विपक्ष में मतभेद पैदा कर रहा है।

अगली सुनवाई की तारीखें

सुप्रीम कोर्ट में इन मामलों पर सुनवाई अगले हफ्ते हो सकती है। अदालत पहले भी अरब पार्टियों के खिलाफ लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को रद्द कर चुकी है। इससे यह संभावना बनी हुई है कि चुनाव में उन पार्टियों का नाम बैलेट पर हो सकता है या नहीं, यह फैसला कोर्ट पर निर्भर करेगा।

सामाजिक तनाव का बढ़ता माहौल

इजराइल में मौजूदा तनाव और राजनीतिक हालात ने आम जनता में चिंताओं को बढ़ा दिया है। नेतन्याहू की सरकार द्वारा उठाए गए कदम से देश में धार्मिक और सामुदायिक विभाजन की संभावना बढ़ सकती है। इस बार वोटिंग में मुस्लिम समुदाय का भारी असर रहने की संभावना है, जो कि चुनावी समीकरण को बदल सकता है।

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