कानून निर्माताओं के दागदार दामन: राजनीति में अपराधीकरण पर सुप्रीम कोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े

The CSR Journal Magazine

326 सांसदों और 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर आपराधिक केस: सुप्रीम कोर्ट में पेश रिपोर्ट

देश के 326 सांसदों और 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिसकी गवाही हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में पेश की गई एक आधिकारिक रिपोर्ट ने दी है। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता और द्वारा दाखिल इस स्थिति रिपोर्ट और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के विश्लेषण ने भारतीय राजनीति के अपराधीकरण की एक बेहद गंभीर और चिंताजनक तस्वीर पेश की है।

राजनीति का अपराधीकरण; नीति निर्माताओं के दागदार दामन

भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर, संसद और राज्यों की विधानसभाओं में बैठने वाले माननीय जनप्रतिनिधियों के दामन पर लगे आपराधिक मामलों के दाग एक बार फिर देश के सबसे बड़े न्यायालय के सामने बेनकाब हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई ताजा स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, देश के कुल 326 मौजूदा सांसदों और 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं।यह हैरान करने वाला खुलासा वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया द्वारा शीर्ष अदालत में दाखिल किए गए एक हलफनामे में हुआ है। वे देश के राजनेताओं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमों के त्वरित निपटारे के लिए दायर एक जनहित याचिका (PIL) में सुप्रीम कोर्ट की सहायता कर रहे हैं। इस रिपोर्ट ने देश के चुनावी सुधारों पर काम करने वाली संस्था ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया है कि भारतीय विधायिका का एक बड़ा हिस्सा अदालती मुकदमों का सामना कर रहा है। इनमें से कई मामले तो अत्यंत गंभीर प्रकृति के हैं, जिनमें पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है।

संसद के दोनों सदनों का सांख्यिकीय विश्लेषण

हलफनामे में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, भारतीय संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में दागी सांसदों की संख्या काफी अधिक है।

लोकसभा (निचला सदन)

कुल सदस्य संख्या: 543
आपराधिक मामलों वाले सांसद: 251 (लगभग 46%)
गंभीर आपराधिक मामलों वाले सांसद: 170 (लगभग 31%)
गंभीर आरोपों की प्रकृति: इन 170 सांसदों पर हत्या, हत्या का प्रयास, बलात्कार, अपहरण और जबरन वसूली जैसे संगीन आरोप शामिल हैं, जिनमें दोषी पाए जाने पर कम से कम 5 वर्ष या उससे अधिक की जेल हो सकती है।

राज्यसभा (उच्च सदन)

कुल सदस्य संख्या: 233
आपराधिक मामलों वाले सांसद: 75 (लगभग 32%)
गंभीर आपराधिक मामलों वाले सांसद: 40 (लगभग 18%)
नोट: वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों से रिपोर्ट जुटाकर यह विश्लेषण तैयार किया है। हालांकि, इस रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश का आंकड़ा शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय से समय पर डेटा प्राप्त नहीं हो सका था। उत्तर प्रदेश का डेटा शामिल होने पर यह संख्या और अधिक बढ़ सकती है।

मुख्यमंत्रियों के कटघरे में खड़े आंकड़े

संसद ही नहीं, राज्यों की कमान संभालने वाले मुख्यमंत्रियों की स्थिति भी इस मामले में चिंताजनक है। रिपोर्ट के अनुसार, देश के 28 राज्यों में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों (यानी 50% मुख्यमंत्रियों) ने अपने चुनावी हलफनामे में खुद पर आपराधिक मामले दर्ज होने की घोषणा की है। इनमें से 11 मुख्यमंत्रियों पर रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और आपराधिक धमकी जैसे बेहद गंभीर मामले चल रहे हैं।

शीर्ष तीन दागी मुख्यमंत्री

तेलंगाना के मुख्यमंत्री (अनमुला रेवंत रेड्डी): इनके खिलाफ सबसे अधिक 89 आपराधिक मामले दर्ज हैं।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री (सुवेंदु अधिकारी): इस सूची में दूसरे स्थान पर हैं, जिनके खिलाफ 29 मामले लंबित हैं।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री (डी. के. शिवकुमार): इनके खिलाफ 19 आपराधिक मामले दर्ज हैं और ये तीसरे स्थान पर हैं।

कानूनी पहलू

भारतीय कानून के सिद्धांतों के अनुसार, जब तक किसी व्यक्ति को अदालत द्वारा अंतिम रूप से दोषी नहीं ठहराया जाता, तब तक उसे कानूनी तौर पर अपराधी नहीं माना जाता। इनमें से कई मामले राजनीतिक धरने, प्रदर्शनों, रैलियों या राजनीतिक प्रतिशोध के कारण भी दर्ज हो सकते हैं। लेकिन नीति निर्माताओं पर इतने बड़े पैमाने पर मुकदमों का होना कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।

राज्यों के आधार पर सांसदों का लेखा-जोखा

विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर राजनेताओं के अपराधीकरण की राज्यवार स्थिति इस प्रकार है-
केरल: इस राज्य में सांसदों का अपराधीकरण सबसे शीर्ष पर है। केरल के 20 सांसदों में से 19 सांसदों (95%) पर आपराधिक आरोप हैं, जिनमें से 11 सांसद बेहद गंभीर मामलों का सामना कर रहे हैं।
तेलंगाना: राज्य के 17 सांसदों में से 14 सांसदों (82%) पर आपराधिक मुकदमे लंबित हैं। ओडिशा: यहाँ के 21 सांसदों में से 16 सांसद (76%) आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं।
झारखंड: राज्य के 14 सांसदों में से 10 सांसद (71%) दागी छवि वाले हैं।
तमिलनाडु: यहाँ के 39 सांसदों में से 26 सांसद (67%) अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।

बड़े राज्यों की स्थिति

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे भारत के राजनीतिक रूप से बड़े और प्रभावशाली राज्यों के करीब 50% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

साफ-सुथरी छवि वाले राज्य

इसके विपरीत, कुछ राज्यों में राजनीतिक अपराधीकरण की दर काफी कम देखी गई है-
हरियाणा: 10 सांसदों में से केवल 1 पर मामला दर्ज है।
छत्तीसगढ़: 11 सांसदों में से केवल 1 पर आपराधिक आरोप है।
पंजाब: 13 में से केवल 2 सांसदों पर मामले हैं।
असम: 14 में से केवल 3 सांसद दागी हैं।
राजस्थान: 25 में से केवल 4 सांसदों पर मुकदमे हैं।
गुजरात: 25 में से केवल 5 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

मुकदमों की पेंडेंसी: न्यायिक गति पर बड़ा सवाल

इस रिपोर्ट का सबसे निराशाजनक पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट और देश के विभिन्न हाई कोर्ट्स द्वारा लगातार की जा रही निगरानी के बावजूद, नेताओं के खिलाफ मामलों के निपटारे की दर बेहद धीमी है। वर्ष 2018 से लेकर अब तक सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की कुल संख्या लगभग उसी स्तर पर बनी हुई है। वर्तमान में देश भर में पूर्व और मौजूदा सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ कुल 4,192 आपराधिक मामले लंबित हैं। अकेले वर्ष 2025 के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो-
निपटाए गए मामले: वर्ष 2025 में विशेष अदालतों द्वारा 1,243 आपराधिक मामलों का फैसला सुनाया गया।
नए दर्ज मामले: इसी समान अवधि (2025) के दौरान राजनेताओं के खिलाफ 1,050 नए मामले दर्ज कर लिए गए।
यानी जितने पुराने मामले सुलझाए नहीं जाते, लगभग उतने ही नए मामले दर्ज हो जाते हैं, जिससे लंबित मामलों का अंबार कभी कम नहीं हो पा रहा है।

विशेष अदालतों को लेकर एमीकस क्यूरी की सिफारिशें

न्यायिक प्रक्रिया को गति देने और भारतीय राजनीति को साफ-सुथरा बनाने के लिए एमीकस क्यूरी विजय हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कई कड़े सुझाव और मांगें रखी हैं-
विशेष अदालतों का विशेष उपयोग: सांसद-विधायकों (MP-MLA) के मामलों की सुनवाई के लिए गठित विशेष अदालतें सिर्फ और सिर्फ उन्हीं के मामलों की सुनवाई करें। इन विशेष अदालतों को सामान्य दीवानी या फौजदारी मामलों का काम तब तक न सौंपा जाए, जब तक कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मुकदमों की सुनवाई पूरी तरह से समाप्त न हो जाए।
एक वर्ष की समय-सीमा: किसी भी राजनेता के खिलाफ अदालत में आरोप (Chargesheet) तय होने के एक साल के भीतर मुकदमे की सुनवाई को अनिवार्य रूप से पूरा किया जाना चाहिए।
मासिक निगरानी: सभी राज्यों के उच्च न्यायालय (High Courts) अपने स्तर पर स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए रिट याचिका के जरिए इन मामलों की प्रगति की हर महीने सूक्ष्म निगरानी (Micro-Monitoring) करें।
पुराने मामलों पर विशेष ध्यान: जो आपराधिक मामले पिछले 3 या उससे अधिक वर्षों से लंबित पड़े हैं, उन पर हाई कोर्ट विशेष प्रभावी आदेश जारी करे ताकि उनका तत्काल निपटारा हो सके।

अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका और सुप्रीम कोर्ट का रुख

यह पूरी न्यायिक कवायद भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका (PIL) का हिस्सा है। इस याचिका में मांग की गई है कि दागी और सजायाफ्ता राजनेताओं पर आजीवन चुनाव लड़ने का प्रतिबंध लगाया जाए और उनके मुकदमों का निपटारा फास्ट-ट्रैक कोर्ट के माध्यम से जल्द से जल्द किया जाए। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई कड़े कदम उठा चुका है।

9 नवंबर 2023 का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट्स को राजनेताओं के खिलाफ लंबित 5,000 से अधिक आपराधिक मामलों की सुनवाई तेज करने के लिए एक विशेष बेंच (Special Bench) गठित करने का आदेश दिया था। शीर्ष अदालत ने विशेष अदालतों को स्पष्ट निर्देश दिया था कि वे सांसदों और विधायकों के मामलों में सुनवाई को बार-बार न टालें। सुनवाई को केवल “दुर्लभ और बेहद अनिवार्य” कारणों से ही टाला जा सकता है। अदालतों से कहा गया है कि वे मौजूदा और पूर्व सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों (MLCs) से जुड़े आपराधिक मुकदमों को न्यायिक सूची में सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

लोकतंत्र पर इसका प्रभाव और आगे की राह

जब देश के कानून बनाने वाले ही खुद कानून के कटघरे में खड़े होते हैं, तो इससे आम जनता का न्याय प्रणाली और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर से विश्वास डगमगाने लगता है। राजनीति में धनबल और बाहुबल का बढ़ता प्रभाव स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा को चोट पहुंचाता है।

सुधार के आवश्यक कदम:कड़े विधायी कानून

चुनाव आयोग और संसद को मिलकर ऐसे कानून बनाने चाहिए जिससे गंभीर धाराओं में आरोपित व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोका जा सके। राजनीतिक दलों को टिकट वितरण के समय उम्मीदवारों की छवि को प्राथमिकता देनी होगी। केवल ‘जिताऊ उम्मीदवार’ (Winnability) के नाम पर अपराधियों को टिकट देने की प्रथा पर स्व-अंकुश लगाना होगा। मतदाताओं को भी अपने मताधिकार का प्रयोग करते समय उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास (ADR की रिपोर्ट आदि के माध्यम से) को ध्यान में रखना होगा।

भारतीय राजनीति के शुद्धिकरण की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई यह स्टेटस रिपोर्ट भारतीय राजनीति के शुद्धीकरण की दिशा में एक अलार्म की तरह है। न्यायपालिका अपनी ओर से मुकदमों को तेज करने का पूरा प्रयास कर रही है, लेकिन जब तक राजनीतिक दल और देश की विधायिका खुद के भीतर सुधार करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाएगी, तब तक राजनीति को अपराध मुक्त बनाना एक दूर का सपना ही रहेगा।

Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

App Store –  https://apps.apple.com/in/app/newspin/id6746449540 

Google Play Store – https://play.google.com/store/apps/details?id=com.inventifweb.newspin&pcampaignid=web_share

Latest News

Popular Videos