असम की हेमोप्रोवा चुटिया, भारतीय हैंडलूम को नई पहचान दिलाने वाली पद्मश्री सम्मानित मास्टर बुनकर की कहानी
भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल किताबों, स्मारकों और संग्रहालयों में ही सुरक्षित नहीं है। देश के गांवों और कस्बों में आज भी ऐसे अनेक कलाकार हैं, जिन्होंने अपने हाथों की कला के माध्यम से सदियों पुरानी परंपराओं को जीवित रखा है। असम के डिब्रूगढ़ जिले की प्रसिद्ध मास्टर बुनकर हेमोप्रोवा चुटिया ऐसी ही एक असाधारण हस्तशिल्पी हैं, जिन्होंने धागों को केवल कपड़ा बनाने का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें भाषा, साहित्य और संस्कृति का वाहक बना दिया।
संस्कृत पढ़ना नहीं जानती थीं, फिर भी हर अक्षर को धागों में उतारा
सीमित औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद हेमोप्रोवा चुटिया ने अपनी प्रतिभा, धैर्य और अद्भुत कल्पनाशक्ति के बल पर असम की पारंपरिक बुनाई कला को एक नई ऊंचाई तक पहुंचाया। उन्होंने करघे पर ऐसी कृतियां तैयार कीं, जिनमें शब्द और अक्षर स्वयं कला का रूप ले लेते हैं। उनकी सबसे चर्चित और असाधारण उपलब्धियों में कपड़े पर बुनी गई भगवद्गीता शामिल है। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ को कपड़े पर लिख देने का काम नहीं था। यह तकनीक, स्मृति, गणना, डिजाइन और असाधारण धैर्य का ऐसा संगम था, जिसमें हर अक्षर को धागों के माध्यम से तैयार करना पड़ा। यही कारण है कि हेमोप्रोवा चुटिया की कला आज भारतीय हैंडलूम परंपरा के सबसे अनूठे अध्यायों में गिनी जाती है।
करघे के बीच बीता बचपन, बुनाई बनी जीवन की पहचान
असम की सांस्कृतिक परंपरा में बुनाई का विशेष स्थान रहा है। राज्य के अनेक घरों में करघा केवल आर्थिक गतिविधि का साधन नहीं, बल्कि पारिवारिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रहा है। हेमोप्रोवा चुटिया भी इसी वातावरण में पली-बढ़ीं, जहां कपड़ा बुनना एक कला होने के साथ-साथ जीवन की परंपरा थी। बचपन से ही उन्होंने करघे, धागों और पारंपरिक डिजाइन के बीच अपनी दुनिया देखी। औपचारिक शिक्षा सीमित रही, लेकिन सीखने की उनकी क्षमता असाधारण थी। उन्होंने बुनाई की पारंपरिक तकनीकों को समझा और धीरे-धीरे उन्हें अपनी कल्पनाशक्ति के साथ जोड़ना शुरू किया। समय के साथ उन्होंने केवल सामान्य कपड़े या पारंपरिक वस्त्र तैयार करने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने सोचना शुरू किया कि क्या करघे का इस्तेमाल केवल डिजाइन और आकृतियां बनाने के लिए ही किया जा सकता है, या फिर अक्षरों और शब्दों को भी धागों के माध्यम से जीवंत किया जा सकता है। यहीं से शुरू हुआ उनकी कला का वह सफर, जिसने बाद में उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
जब अक्षर बने डिजाइन और धागों ने लिखी भाषा
हेमोप्रोवा चुटिया की कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अक्षरों को एक दृश्य डिजाइन की तरह समझा। उनके लिए कोई शब्द केवल पढ़ने की चीज नहीं था, बल्कि एक ऐसी संरचना थी जिसे धागों, रंगों और बुनाई की तकनीक से बनाया जा सकता था। करघे पर किसी अक्षर को बनाना सामान्य लेखन से बिल्कुल अलग प्रक्रिया है। बुनाई में हर धागे की दिशा, उसकी स्थिति और पैटर्न पहले से तय करना पड़ता है। यदि किसी शब्द को कपड़े पर सही रूप में दिखाई देना है, तो बुनकर को उसकी संरचना को करघे की तकनीक के अनुसार तैयार करना पड़ता है। इस प्रक्रिया की सबसे कठिन बात यह थी कि बुनाई के दौरान अक्षरों को अक्सर उल्टी या मिरर इमेज संरचना में तैयार करना पड़ता था, ताकि कपड़े के सामने वाले हिस्से पर वे सही दिखाई दें। यानी जिस व्यक्ति ने संस्कृत की औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, उसने संस्कृत अक्षरों को उनकी दृश्य संरचना के आधार पर समझा और उन्हें धागों में बदल दिया। यह उपलब्धि केवल कलात्मक प्रतिभा नहीं, बल्कि असाधारण एकाग्रता और धैर्य का उदाहरण है।
दो वर्षों से अधिक की मेहनत और करघे पर भगवद्गीता
हेमोप्रोवा चुटिया की सबसे चर्चित कृतियों में करघे पर बुनी गई भगवद्गीता का विशेष स्थान है। इस विशाल और जटिल काम को पूरा करने में उन्हें दो वर्षों से अधिक समय लगा। भगवद्गीता जैसे ग्रंथ को धागों के माध्यम से कपड़े पर उतारना सामान्य बुनाई से कहीं अधिक कठिन था। इसमें केवल सुंदर डिजाइन तैयार करना पर्याप्त नहीं था। प्रत्येक अक्षर की स्थिति, क्रम और आकार को बेहद सावधानी से तैयार करना पड़ता था। हर गलती पूरे पैटर्न को प्रभावित कर सकती थी। एक सामान्य चित्र या फूल-पत्ती के डिजाइन में कलाकार अपनी कल्पना के अनुसार बदलाव कर सकता है, लेकिन किसी धार्मिक या साहित्यिक ग्रंथ को अक्षरशः प्रस्तुत करने में ऐसी स्वतंत्रता नहीं होती। एक अक्षर की गलती भी शब्द का अर्थ बदल सकती है। हेमोप्रोवा चुटिया ने इसी चुनौती को स्वीकार किया और अपनी कला के माध्यम से एक ऐसा काम पूरा किया, जिसने भारतीय हस्तकरघा जगत को चकित कर दिया।
संस्कृत, असमिया और अंग्रेज़ी में बुनी गई साहित्यिक विरासत
हेमोप्रोवा चुटिया ने अपनी कला को केवल भगवद्गीता तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने असम की धार्मिक और साहित्यिक परंपरा से जुड़े महत्वपूर्ण ग्रंथों को भी करघे पर उतारा। उनकी उल्लेखनीय कृतियों में नामघोषा, गुणमाला और भगवद् गीता जैसी रचनाएं शामिल हैं। उन्होंने विभिन्न भाषाओं—विशेषकर असमिया, संस्कृत और अंग्रेज़ी—में अक्षरों और पाठ को बुनाई की कला के माध्यम से प्रस्तुत किया। यह काम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भाषा और वस्त्रकला का अद्भुत मेल दिखाई देता है। आमतौर पर किसी पुस्तक को कागज पर पढ़ा जाता है और किसी वस्त्र को उसके डिजाइन के लिए देखा जाता है। लेकिन हेमोप्रोवा चुटिया की कृतियों में पाठ स्वयं वस्त्र का डिजाइन बन जाता है। उनकी कला में शब्द केवल लिखे नहीं जाते—वे बुने जाते हैं।
‘बरनाबस्त्र’—जहां अक्षर बन जाते हैं कला
असम में इस विशेष प्रकार की वस्त्रकला को ‘बरनाबस्त्र’ (Barnabastra) के नाम से जाना जाता है। इसका अर्थ broadly उस कला से जुड़ा है जिसमें वर्ण या अक्षर वस्त्र के मुख्य डिजाइन का हिस्सा बन जाते हैं।बरनाबस्त्र की अवधारणा भारतीय वस्त्रकला की उस अनूठी परंपरा को सामने लाती है, जहां भाषा और शिल्प एक-दूसरे में घुल जाते हैं। हेमोप्रोवा चुटिया ने इस कला को नई पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने दिखाया कि करघा केवल कपड़ा तैयार करने वाली मशीन नहीं है। यह ज्ञान, स्मृति और संस्कृति को संरक्षित करने का माध्यम भी बन सकता है। उनकी रचनाओं को देखकर यह एहसास होता है कि एक बुनकर का करघा कभी-कभी लेखक की कलम जितना ही शक्तिशाली हो सकता है।
मोगा सिल्क से सूती धागों तक, परंपरागत सामग्री का अभिनव इस्तेमाल
असम अपनी समृद्ध वस्त्र परंपरा के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यहां के मोगा सिल्क, रेशम और पारंपरिक सूती वस्त्रों की विशेष पहचान है। हेमोप्रोवा चुटिया ने भी स्थानीय और पारंपरिक सामग्रियों के साथ काम करते हुए अपनी कला को विकसित किया। उन्होंने मोगा सिल्क, सूती कपड़े, ऊन और अन्य पारंपरिक सामग्री का उपयोग कर अनेक प्रकार की कलात्मक कृतियां तैयार कीं। उनकी बुनाई में स्थानीय पहचान और आधुनिक प्रयोग दोनों दिखाई देते हैं। उनकी कला का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष गामोचा से जुड़ा काम भी रहा है।
गामोचा पर मनकों की कला को दी नई पहचान
असम का गामोचा केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक है। सम्मान, परंपरा और सामाजिक जीवन में गामोचा की विशेष भूमिका है। हेमोप्रोवा चुटिया ने गामोचा को भी अपनी कलात्मक प्रयोगशाला का हिस्सा बनाया। उन्होंने पारंपरिक बुनाई के साथ मनकों यानी बीडवर्क की विशिष्ट शैली का इस्तेमाल कर इसे नया रूप दिया। इस तरह उन्होंने पारंपरिक वस्त्र को केवल उसकी मूल संरचना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसमें सजावटी और कलात्मक प्रयोगों के लिए भी नई संभावनाएं पैदा कीं। उनका काम यह साबित करता है कि किसी परंपरा को जीवित रखने का अर्थ उसे ज्यों का त्यों दोहराना नहीं है। परंपरा को बचाने के लिए उसमें नई रचनात्मक ऊर्जा भी जरूरी होती है।
हैंडलूम केवल रोजगार नहीं, एक सांस्कृतिक दस्तावेज
भारत में हैंडलूम उद्योग लाखों परिवारों के जीवन से जुड़ा हुआ है। लेकिन हस्तकरघा का महत्व केवल रोजगार तक सीमित नहीं है। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों की पहचान उनके वस्त्रों में दिखाई देती है। बनारसी बुनाई, कांजीवरम, पटोला, पश्मीना और असम का मोगा—हर परंपरा अपने साथ इतिहास, भूगोल और समाज की कहानी लेकर चलती है।असम की बुनाई परंपरा भी इसी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हेमोप्रोवा चुटिया जैसे कलाकारों का योगदान इसलिए विशेष हो जाता है क्योंकि उन्होंने इस कला को केवल बाजार के लिए उत्पाद बनाने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे संस्कृति को दर्ज करने का माध्यम बनाया। जब कोई धार्मिक ग्रंथ या साहित्यिक पाठ करघे पर बुना जाता है, तो वस्त्र एक प्रकार का सांस्कृतिक दस्तावेज बन जाता है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनीं मास्टर बुनकर
हेमोप्रोवा चुटिया ने अपने जीवन के दशकों असम की पारंपरिक बुनाई कला को बचाने और आगे बढ़ाने में लगाए। उनका काम नई पीढ़ी के बुनकरों और हस्तशिल्प कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज के दौर में मशीनों से बड़े पैमाने पर तैयार होने वाले वस्त्र बाजार पर हावी हैं। ऐसे समय में हाथ से बनी वस्तुओं के लिए समय, धैर्य और कौशल की जरूरत होती है। हैंडलूम का मुकाबला केवल कीमत के आधार पर नहीं किया जा सकता, क्योंकि हाथ से बनी वस्तु के पीछे मानव कौशल और व्यक्तिगत श्रम जुड़ा होता है। हेमोप्रोवा चुटिया की कहानी यह संदेश देती है कि पारंपरिक कला तभी जीवित रहेगी जब उसे नई पीढ़ी तक ज्ञान और कौशल के रूप में पहुंचाया जाएगा।
पद्मश्री से राष्ट्रीय सम्मान
भारतीय हैंडलूम और असम की पारंपरिक बुनाई कला के संरक्षण और विकास में उनके दीर्घकालिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। भारत सरकार ने वर्ष 2023 में हेमोप्रोवा चुटिया को पद्मश्री से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल एक कलाकार की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था। इसे असम की उस बुनाई परंपरा की राष्ट्रीय मान्यता के रूप में भी देखा गया, जिसने पीढ़ियों से भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया है। पद्मश्री सम्मान ने देशभर में लोगों का ध्यान उनकी असाधारण कला की ओर आकर्षित किया। विशेष रूप से करघे पर अक्षरों और धार्मिक-साहित्यिक ग्रंथों को बुनने की उनकी कला ने उन्हें एक अलग पहचान दी।
सीमित शिक्षा, लेकिन असीम सीखने की क्षमता
हेमोप्रोवा चुटिया की जीवन यात्रा का सबसे प्रेरक पहलू यह है कि उन्होंने सीमित औपचारिक शिक्षा को अपनी रचनात्मकता की सीमा नहीं बनने दिया।अक्सर समाज में यह मान लिया जाता है कि महान उपलब्धियों के लिए बड़ी डिग्रियां आवश्यक हैं। लेकिन कला और कौशल की दुनिया में अनुभव, अभ्यास और सीखने की इच्छा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने संस्कृत के अक्षरों को एक विद्वान की तरह पढ़ने के बजाय एक कलाकार की तरह देखा। उन्होंने उनकी आकृतियों को समझा, उनके आकार को पहचाना, उनकी संरचना को धागों में बदला और फिर उन्हें करघे पर जीवंत कर दिया।यही रचनात्मक दृष्टि उन्हें असाधारण बनाती है।
जब धैर्य बन जाता है सबसे बड़ी तकनीक
आधुनिक दुनिया गति पर चलती है। मशीनें मिनटों में हजारों मीटर कपड़ा तैयार कर सकती हैं। डिजिटल तकनीक कुछ सेकंड में हजारों अक्षर लिख सकती है। लेकिन हेमोप्रोवा चुटिया की कला एक बिल्कुल अलग दर्शन प्रस्तुत करती है। उनकी भगवद्गीता को पूरा करने में दो वर्षों से अधिक समय लगा। इस अवधि में हर दिन की मेहनत, हर धागे की स्थिति और हर अक्षर की संरचना एक बड़े लक्ष्य का हिस्सा थी। यह काम हमें याद दिलाता है कि कुछ उपलब्धियां तेजी से नहीं, बल्कि लगातार प्रयास से हासिल होती हैं। हैंडलूम की दुनिया में समय भी कला का हिस्सा होता है। जितना समय कलाकार किसी कृति को देता है, उतना ही उसका अनुभव और संवेदना उस कृति में शामिल हो जाती है।
विश्व संस्कृत दिवस के संदर्भ में विशेष प्रेरणा
हेमोप्रोवा चुटिया की भगवद्गीता से जुड़ी कहानी विश्व संस्कृत दिवस के अवसर पर विशेष रूप से प्रेरणादायक बन जाती है। संस्कृत को सामान्यतः पुस्तकों, श्लोकों और शास्त्रीय अध्ययन से जोड़ा जाता है। लेकिन हेमोप्रोवा चुटिया ने दिखाया कि भाषा का संरक्षण केवल पढ़ने और लिखने से ही नहीं होता। भाषा को कला में भी जीवित रखा जा सकता है। उनके करघे पर संस्कृत के अक्षर एक अलग रूप में सामने आते हैं। यहां शब्दों को आवाज नहीं, बल्कि धागे मिलते हैं। यह भाषा, कला और भारतीय परंपरा के अद्भुत संगम का उदाहरण है।
असम की बेटी, भारतीय कला की पहचान
डिब्रूगढ़ की हेमोप्रोवा चुटिया की कहानी स्थानीय स्तर से शुरू होकर राष्ट्रीय पहचान तक पहुंची। उन्होंने अपने आसपास की परंपरा से सीख लिया, उसे जीवनभर साधा और फिर उसमें ऐसा नवाचार किया जिसने उन्हें देश के प्रमुख हस्तशिल्प कलाकारों की श्रेणी में पहुंचा दिया। उनकी सफलता यह भी साबित करती है कि भारत की सांस्कृतिक शक्ति केवल बड़े शहरों और आधुनिक संस्थानों में नहीं बसती। देश के छोटे शहरों और गांवों में मौजूद पारंपरिक ज्ञान भी उतना ही मूल्यवान है। कई बार एक बुजुर्ग कारीगर के हाथों में सदियों का अनुभव छिपा होता है। हेमोप्रोवा चुटिया उन्हीं कलाकारों में से एक हैं, जिनके हाथों ने केवल कपड़ा नहीं बुना—उन्होंने इतिहास, साहित्य और संस्कृति को धागों में पिरोया।
धागों में दर्ज एक असाधारण विरासत
आज जब पारंपरिक हस्तशिल्प कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब हेमोप्रोवा चुटिया की यात्रा उम्मीद जगाती है। उनकी कहानी बताती है कि परंपरा पुरानी जरूर हो सकती है, लेकिन वह कभी अप्रासंगिक नहीं होती। यदि उसमें नवाचार, समर्पण और नई सोच जुड़ जाए, तो वही परंपरा दुनिया के सामने नई पहचान के साथ खड़ी हो सकती है। एक ओर उनके करघे पर असम की स्थानीय बुनाई परंपरा दिखाई देती है, तो दूसरी ओर संस्कृत, असमिया और अंग्रेज़ी के अक्षर ज्ञान की व्यापक दुनिया से जुड़ते हैं। यही उनकी कला की सबसे बड़ी ताकत है। हेमोप्रोवा चुटिया ने अपने जीवन और काम से साबित किया कि कलाकार के लिए सीमाएं अक्सर परिस्थितियां नहीं, बल्कि कल्पना तय करती है। और जब कल्पना के साथ धैर्य, मेहनत और संस्कृति के प्रति समर्पण जुड़ जाए, तो साधारण धागे भी असाधारण इतिहास लिख सकते हैं।
हेमोप्रोवा चुटिया- भारत की जीवंत सांस्कृतिक परंपरा
हेमोप्रोवा चुटिया की कहानी केवल एक बुनकर की सफलता की कहानी नहीं है। यह भारत की उस जीवंत सांस्कृतिक परंपरा की कहानी है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हाथों से हाथों तक पहुंचती रही है।उनके करघे ने एक संदेश दिया है—किताबों में लिखे शब्द समय के साथ पुराने हो सकते हैं, लेकिन जब वही शब्द धागों में बुने जाएं, तो वे कला बनकर पीढ़ियों तक जीवित रह सकते हैं।
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