सीसे से सोना बनाना संभव, लेकिन लागत सुनकर उड़ जाएंगे होश, अल्केमिस्टों का सपना सच, CERN ने बनाया सोना
सोना बनाने का सपना सदियों पुराना है। प्राचीन काल में अल्केमिस्ट यानी रसायनविद अपनी पूरी जिंदगी इस कोशिश में लगा देते थे कि सीसे जैसी सस्ती धातु को सोने में बदला जा सके। उनका मानना था कि किसी विशेष रासायनिक प्रक्रिया या रहस्यमयी पदार्थ की मदद से ऐसा करना संभव हो सकता है। हालांकि, वे अपने प्रयासों में सफल नहीं हुए। आधुनिक विज्ञान ने अब यह साबित कर दिया है कि एक तत्व के परमाणु नाभिक में बदलाव करके उसे दूसरे तत्व में बदला जा सकता है। इस प्रक्रिया से सोने के परमाणु भी बनाए जा सकते हैं। यूरोप की परमाणु अनुसंधान संस्था CERN के वैज्ञानिकों ने अपने विशाल कण त्वरक में सीसे के नाभिकों से सोने के नाभिक बनने की प्रक्रिया का अध्ययन किया। इस प्रयोग में सोने की मात्रा इतनी कम थी कि उससे न आभूषण बनाए जा सकते थे और न ही उसे बाजार में बेचकर कोई आर्थिक लाभ कमाया जा सकता था। इसके बावजूद यह प्रयोग विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने दिखाया कि सदियों पुराना सपना सिद्धांत के स्तर पर ही नहीं, बल्कि वास्तविक नाभिकीय प्रक्रियाओं के माध्यम से भी संभव है।
सोने और सीसे में क्या अंतर है?
सोना और सीसा दोनों धातुएं हैं, लेकिन उनके परमाणुओं की संरचना अलग होती है। किसी भी रासायनिक तत्व की पहचान उसके परमाणु नाभिक में मौजूद प्रोटॉनों की संख्या से होती है। सोने के प्रत्येक परमाणु में 79 प्रोटॉन होते हैं, जबकि सीसे के परमाणु में 82 प्रोटॉन होते हैं। यही अंतर उन्हें दो अलग-अलग तत्व बनाता है। परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन होते हैं, जबकि उसके बाहर इलेक्ट्रॉन मौजूद रहते हैं। सामान्य रासायनिक प्रतिक्रियाओं में मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनों और परमाणुओं के बीच बनने वाले रासायनिक बंधनों में बदलाव होता है। इससे किसी पदार्थ का रंग, अवस्था या रासायनिक गुण बदल सकते हैं, लेकिन उसका मूल तत्व नहीं बदलता। सीसे को गर्म करने, पिघलाने या उसमें दूसरे रसायन मिलाने से उसके नाभिक में मौजूद प्रोटॉनों की संख्या तीन कम नहीं हो जाती। इसलिए सामान्य रासायनिक तरीकों से सीसे को सोने में बदलना संभव नहीं है। इसके लिए परमाणु नाभिक में बदलाव करना पड़ता है। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को नाभिकीय रूपांतरण कहते हैं। यदि किसी सीसे के नाभिक से तीन प्रोटॉन निकल जाएं, तो उसकी प्रोटॉन संख्या 82 से घटकर 79 हो सकती है। ऐसी स्थिति में वह सोने का नाभिक होगा। हालांकि, उसके न्यूट्रॉनों की संख्या और नाभिक की स्थिरता भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए हर नाभिकीय प्रतिक्रिया से उपयोगी और स्थिर सोना नहीं बनता।
1941 में हार्वर्ड में हुआ था सोना बनाने का प्रयोग
कृत्रिम सोना बनाने के इतिहास में वर्ष 1941 महत्वपूर्ण माना जाता है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों आर. शेर, के. टी. बेनब्रिज और एच. एच. एंडरसन ने पारे पर तेज न्यूट्रॉनों की बौछार करके उसके नाभिकीय रूपांतरण का अध्ययन किया। इस प्रयोग में सोने के रेडियोधर्मी समस्थानिक बने, जिनमें सोना-198 और सोना-199 शामिल थे। इस शोध के निष्कर्ष 1 अक्टूबर 1941 को वैज्ञानिक पत्रिका Physical Review में प्रकाशित हुए थे। समस्थानिक एक ही तत्व के ऐसे परमाणु होते हैं, जिनमें प्रोटॉनों की संख्या समान, लेकिन न्यूट्रॉनों की संख्या अलग होती है। कुछ समस्थानिक स्थिर होते हैं, जबकि रेडियोधर्मी समस्थानिक समय के साथ क्षय होकर दूसरे नाभिकों में बदल सकते हैं। इस प्रयोग ने साबित किया कि नाभिकीय प्रतिक्रियाओं के जरिये एक तत्व से दूसरे तत्व का निर्माण किया जा सकता है। हालांकि, इससे बड़े पैमाने पर सोने का उत्पादन संभव नहीं हुआ। प्रयोग में तैयार सोने की मात्रा बेहद कम थी और उसमें बने रेडियोधर्मी समस्थानिक सामान्य आभूषणों के लिए उपयोगी नहीं थे।
ग्लेन सीबोर्ग के प्रयोग ने भी दिखाई राह
अमेरिकी वैज्ञानिक ग्लेन टी. सीबोर्ग का नाम भी कृत्रिम तत्वों और नाभिकीय रूपांतरण के अध्ययन से जुड़ा है। वर्ष 1980 के आसपास कैलिफोर्निया की लॉरेंस बर्कले प्रयोगशाला में भारी तत्वों के नाभिकों पर कणों की बौछार करके सोने सहित विभिन्न तत्वों के निर्माण का अध्ययन किया गया। ऐसे प्रयोगों में भारी नाभिकों की संरचना बदलने के लिए अत्यधिक ऊर्जा वाले कणों का उपयोग किया जाता है। हर प्रतिक्रिया में सोना नहीं बनता और बनने वाले नाभिकों की संख्या भी सीमित रहती है। इसलिए इन प्रयोगों का प्रमुख उद्देश्य सोना कमाना नहीं, बल्कि परमाणु नाभिकों के व्यवहार और तत्वों के रूपांतरण को समझना था।
CERN में कितना सोना बना और इसकी लागत कितनी है?
CERN के लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में सीसे के नाभिकों को लगभग प्रकाश की गति तक पहुंचाया जाता है। जब वे एक-दूसरे के बेहद करीब से गुजरते हैं, तो उनके तीव्र विद्युत चुंबकीय क्षेत्रों के कारण ऐसी प्रक्रियाएं हो सकती हैं, जिनमें नाभिक से प्रोटॉन और न्यूट्रॉन बाहर निकल जाते हैं। CERN के ALICE प्रयोग के अनुसार, 2015 से 2018 के दौरान चार प्रमुख प्रयोग स्थलों पर लगभग 86 अरब सोने के नाभिक बने। इनका कुल द्रव्यमान केवल 29 पिकोग्राम था। यह मात्रा एक ग्राम के लगभग 34 अरबवें हिस्से के बराबर है। वर्ष 2025 में जारी वैज्ञानिक जानकारी के अनुसार, बाद के प्रयोगों में सोने के नाभिक बनने की मात्रा बढ़ी, लेकिन कुल उत्पादन अब भी आभूषण बनाने के लिए आवश्यक मात्रा से बहुत कम है। यहां लागत को लेकर भी सावधानी जरूरी है। CERN के इस प्रयोग की कोई ऐसी सरल प्रति-ग्राम उत्पादन लागत नहीं है, जिसकी तुलना सीधे बाजार में बिकने वाले सोने से की जा सके। विशाल वैज्ञानिक उपकरणों का निर्माण, संचालन और रखरखाव अनेक अनुसंधान उद्देश्यों के लिए होता है। फिर भी तैयार सोने की अत्यंत कम मात्रा और प्रक्रिया की जटिलता के कारण इसे व्यावसायिक रूप से बनाना फिलहाल आर्थिक रूप से अव्यावहारिक है।
पृथ्वी का सोना आखिर आया कहां से?
सोने की उत्पत्ति का रहस्य पृथ्वी से भी पुराना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि सोने जैसे भारी तत्वों का निर्माण ब्रह्मांड की अत्यंत ऊर्जावान घटनाओं में हुआ। इनमें दो न्यूट्रॉन तारों का विलय एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। 17 अगस्त 2017 को वैज्ञानिकों ने GW170817 नाम की घटना से आने वाली गुरुत्वीय तरंगों का पता लगाया। इसके बाद दूरबीनों से प्राप्त प्रकाश के अध्ययन ने संकेत दिए कि न्यूट्रॉन तारों के विलय से भारी तत्वों का निर्माण हुआ था। ऐसी घटनाओं में पदार्थ अत्यधिक न्यूट्रॉन-समृद्ध होता है, जिससे तीव्र न्यूट्रॉन अभिग्रहण की प्रक्रिया के माध्यम से सोना और प्लैटिनम जैसे भारी तत्व बन सकते हैं। इसका अर्थ है कि आज पृथ्वी पर मौजूद सोने के परमाणुओं का इतिहास अरबों वर्ष पुरानी ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं से जुड़ा हो सकता है। हालांकि, यह दावा करना सही नहीं होगा कि पृथ्वी का सारा सोना किसी एक न्यूट्रॉन तारे की टक्कर से बना था।
अगर कृत्रिम सोना सस्ता हो जाए तो क्या होगा?
यदि भविष्य में वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित कर लें, जिससे बड़ी मात्रा में स्थिर और शुद्ध सोना कम लागत पर बनाया जा सके, तो वैश्विक बाजार पर इसका असर पड़ सकता है। सोने की कीमत उसकी सीमित उपलब्धता, निवेश की मांग, आभूषण उद्योग, केंद्रीय बैंकों की खरीद और आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होती है। कृत्रिम सोने का सस्ता और बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव होने पर आपूर्ति बढ़ सकती है और कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। लेकिन कीमत में कितनी गिरावट आएगी, यह उत्पादन की वास्तविक लागत, उपलब्ध मात्रा और बाजार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। फिलहाल ऐसी कोई तकनीक उपलब्ध नहीं है, जो खनन से प्राप्त सोने को बड़े पैमाने पर आर्थिक रूप से पीछे छोड़ सके। CERN का प्रयोग सोने की कीमत गिराने वाली औद्योगिक क्रांति नहीं, बल्कि परमाणु विज्ञान की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।
सदियों पहले अल्केमिस्ट जिस सपने को पूरा करना चाहते थे, आधुनिक वैज्ञानिकों ने उसे नाभिकीय रूपांतरण के जरिये संभव कर दिखाया है। लेकिन सोने के कुछ परमाणु बनाना और बाजार के लिए पर्याप्त मात्रा में सोना तैयार करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। फिलहाल सोना बनाने की यह तकनीक धन कमाने का रास्ता नहीं, बल्कि पदार्थ की मूल संरचना और ब्रह्मांड के इतिहास को समझने का माध्यम है।
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