Gujarat UCC Bill: गुजरात विधानसभा में UCC बिल पेश, अब सभी पर समान नियम लागू होंगे

The CSR Journal Magazine
गुजरात विधानसभा में मंगलवार को यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक पेश किया गया। इस कानून के तहत वसीयत न होने पर माता-पिता, बच्चों और पति/पत्नी को बराबर संपत्ति का अधिकार मिलेगा। गृह मंत्री हर्ष संघवी ने इसे गुजरात के लिए एक ऐतिहासिक दिन बताया। उन्होंने कहा कि यह दिन समाज के सभी वर्गों के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर महिलाओं के लिए।

Gujarat UCC Bill: सभी के लिए समान कानून

हर्ष संघवी ने कहा कि UCC का कानून विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों को समाप्त कर एक समान नियम लागू करेगा। इससे विवाह, उत्तराधिकार और नागरिक मामलों में सभी को एक समान न्याय मिलेगा। महिलाएं काफी समय से इस दिन का इंतजार कर रही थीं और अब वे इस विधेयक को लेकर खुश होंगी। यही नहीं, विवाह पंजीकरण न कराने वालों पर ₹10,000 से ₹25,000 तक का जुर्माना भी लगाया जाएगा।

Gujarat UCC Bill: विवाह पंजीकरण के नए नियम

UCC के मसौदे में विवाह पंजीकरण को अनिवार्य किया गया है। विवाह का पंजीकरण न कराने पर दंड तो रहेगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होगा कि विवाह अमान्य हो जाएगा। इसके अलावा, पूर्व में हुए विवाहों के लिए एक विशेष पंजीकरण प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है। इस नियम का उद्देश्य व्यक्तिगत कानूनों को अधिक पारदर्शी और एकीकृत बनाना है।

उत्तराधिकार के कानून में बदलाव

यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु वसीयत न होने के कारण होती है, तो उसकी संपत्ति का बंटवारा माता-पिता, पति/पत्नी और बच्चों के बीच समान रूप से होगा। इसका उद्देश्य पारिवारिक संपत्ति को सही वितरण सुनिश्चित करना है। ऐसे मामलों में कोई भी भेदभाव नहीं रहेगा, चाहे वह किसी भी धर्म या वर्ग से संबंधित क्यों न हो।

लिव-इन रिलेशनशिप पर नए दिशा-निर्देश

यूसीसी के तहत लिव-इन रिलेशनशिप को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। गुजरात में लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य होगा। यदि कोई कपल बिना पंजीकरण के 30 दिन से अधिक समय तक लिव-इन में रहता है, तो उन्हें कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इससे बच्चों को भी एक वैध पहचान मिलेगी और उनके अधिकार सुनिश्चित होंगे।

Gujarat UCC Bill: तलाक के नए नियम

तलाक के मामले में भी यूसीसी कानून में संशोधन किए गए हैं। अब तलाक केवल आपसी सहमति पर आधारित होगा। इसके अंतर्गत वैवाहिक जीवन में गंभीर समस्याओं के आधार पर ही तलाक मांगा जा सकेगा। इससे विवाह की स्थिरता को बनाए रखने में मदद मिलेगी और पति-पत्नी को एक दूसरे की स्थिति का सम्मान करना होगा।

UCC की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

समान नागरिक संहिता का मुद्दा भारत में पहले बार 1835 में उठा था। तब से लेकर आज तक इस कानून की मांग लगातार की जाती रही है। बाद में 1941 में बीएन राव समिति ने हिंदुओं के लिए समान नागरिक संहिता की सिफारिश की थी। इसके अंतर्गत महिलाओं को अधिकार दिलाने के लिए कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।

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