सिद्धिविनायक मंदिर की जमीन पर हाईकोर्ट का फैसला, मालिकों और किरायेदार को बराबर मिलेगा 10.94 करोड़ का मुआवजा

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सिद्धिविनायक मंदिर की जमीन पर बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मालिकों और किरायेदार को मिलेगा ₹10.94 करोड़ का बराबर मुआवजा

मुंबई के प्रभादेवी स्थित श्री सिद्धिविनायक गणपति मंदिर न्यास से जुड़ी जमीन के मुआवजे को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने जमीन के अधिग्रहण के बदले निर्धारित 10.94 करोड़ रुपये की राशि को जमीन के मालिकों और लंबे समय से वहां कारोबार कर रहे किरायेदार सदानंद गैरेज के बीच बराबर बांटने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति अमित बोरकर की एकलपीठ ने 3 नवंबर 2026 को दिए फैसले में स्पष्ट किया कि संपत्ति पर मालिकाना हक होने के साथ-साथ किरायेदार के स्थापित अधिकारों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने जमीन के बाजार मूल्य का नए सिरे से आकलन करते हुए मुआवजे की राशि तय की और संबंधित प्राधिकरण को निर्धारित समय में भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।
यह मामला केवल जमीन की कीमत तय करने तक सीमित नहीं था। इसके केंद्र में यह सवाल भी था कि जब किसी संपत्ति का अधिग्रहण किया जाता है और उस पर जमीन मालिक के साथ लंबे समय से किरायेदार का भी वैध हित जुड़ा हो, तो मुआवजे की राशि का बंटवारा किस आधार पर किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के दावों, उपलब्ध दस्तावेजों और संपत्ति के वास्तविक उपयोग पर विचार करने के बाद 50:50 के अनुपात में राशि बांटने का निर्णय लिया।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद मुंबई के प्रभादेवी इलाके में स्थित लगभग 642.98 वर्ग मीटर के भूखंड से संबंधित है। इस संपत्ति की पहचान फाइनल प्लॉट नंबर 901 के रूप में की गई है। राज्य सरकार ने श्री सिद्धिविनायक गणपति मंदिर न्यास से जुड़े सार्वजनिक उद्देश्य के लिए इस जमीन का अधिग्रहण किया था। इसका उपयोग श्रद्धालुओं के लिए प्रतीक्षा कक्ष और ‘भक्ति निवास’ जैसी सुविधाओं के निर्माण से जुड़ा था। जमीन पर सदानंद गैरेज नाम से कारोबार संचालित होता था। गैरेज लंबे समय से इस संपत्ति का इस्तेमाल कर रहा था। ऐसे में जमीन के अधिग्रहण के बाद मुआवजे की रकम किसे और कितनी मिले, इसे लेकर विवाद पैदा हो गया। एक तरफ जमीन के मालिकों का कहना था कि संपत्ति उनके स्वामित्व में थी, इसलिए मुआवजे की पूरी राशि उन्हें मिलनी चाहिए। दूसरी तरफ सदानंद गैरेज ने लंबे समय से जमीन पर अपने कब्जे और किरायेदारी के आधार पर मुआवजे में 75 प्रतिशत हिस्से की मांग की थी। मामले में जमीन के बाजार मूल्य और मुआवजे के बंटवारे से जुड़े तीन परस्पर संबंधित संदर्भ हाईकोर्ट के सामने आए। इनमें जमीन के मालिकों, सदानंद गैरेज और अन्य दावेदारों के अधिकारों पर विचार किया गया। अदालत ने सभी संबंधित पहलुओं की एक साथ सुनवाई कर साझा निर्णय दिया।

2004 में तय मुआवजे को लेकर क्यों उठा विवाद?

इस मामले में विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने फरवरी 2004 में जमीन के लिए 2,01,37,662 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था। जमीन के मालिकों ने इस राशि और मुआवजे के निर्धारण के तरीके पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि संपत्ति का वास्तविक बाजार मूल्य इससे अधिक था। मामले में सरकारी रेडी रेकनर दरों के आधार पर मूल्यांकन का मुद्दा भी उठा। रेडी रेकनर दरें संपत्तियों के सरकारी मूल्यांकन और पंजीकरण से संबंधित गणना में इस्तेमाल होती हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 23 के तहत खुले बाजार में जमीन का उचित मूल्य तय करने के लिए केवल रेडी रेकनर दरों को निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने आसपास की तुलनीय संपत्तियों के वास्तविक पंजीकृत बिक्री सौदों और उपलब्ध मूल्यांकन संबंधी साक्ष्यों पर विचार किया। इसी आधार पर जमीन का बाजार मूल्य 19 सितंबर 2002 की स्थिति के अनुसार निर्धारित किया गया।

प्रति वर्ग मीटर 1.70 लाख रुपये से अधिक तय हुआ मूल्य

हाईकोर्ट ने संबंधित भूखंड का बाजार मूल्य 1,70,200 रुपये प्रति वर्ग मीटर निर्धारित किया। 642.98 वर्ग मीटर क्षेत्रफल के हिसाब से जमीन का कुल मूल्य 10,94,35,196 रुपये, यानी लगभग 10.94 करोड़ रुपये बैठा। इसके अतिरिक्त, जमीन पर मौजूद निर्माण और पेड़ों का मूल्य 3,85,300 रुपये अलग से आंका गया। यह राशि जमीन के मुआवजे से अलग है और अदालत के निर्देशानुसार जमीन के मालिकों को उनके स्वामित्व के हिस्से के आधार पर दी जानी है। इस तरह जमीन और उस पर मौजूद निर्माण तथा पेड़ों का कुल निर्धारित मूल्य 10,98,20,496 रुपये हुआ। हालांकि, 10.94 करोड़ रुपये की जिस राशि को बराबर बांटने का आदेश दिया गया है, वह केवल जमीन के मुआवजे से संबंधित है। इसे निर्माण और पेड़ों की अलग से निर्धारित राशि के साथ मिलाकर नहीं देखना चाहिए। वैधानिक अतिरिक्त लाभ और ब्याज की गणना भी लागू कानून के अनुसार अलग से की जानी है।

मालिकों और सदानंद गैरेज के बीच बराबर बंटेगी रकम

मुआवजे के बंटवारे पर फैसला सुनाते हुए अदालत ने जमीन मालिकों और सदानंद गैरेज, दोनों के दावों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। मालिक संपत्ति के स्वामित्व के आधार पर पूरी रकम चाहते थे, जबकि गैरेज ने लंबे समय से जमीन के इस्तेमाल का हवाला देते हुए 75 प्रतिशत हिस्सेदारी मांगी थी। अदालत ने पाया कि सदानंद गैरेज ने संपत्ति पर अपनी किरायेदारी और व्यावसायिक कब्जे से जुड़े अधिकारों को साबित किया है। हालांकि, वह पूरे भूखंड पर अपना मालिकाना हक या स्थायी पट्टे का अधिकार साबित नहीं कर पाया। इसलिए उसे मुआवजे का 75 प्रतिशत हिस्सा देने का आधार स्वीकार नहीं किया गया। दूसरी ओर, अदालत ने यह भी माना कि जमीन मालिकों को पूरी राशि देना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे गैरेज के स्थापित किरायेदारी और कब्जे से जुड़े हितों की अनदेखी होगी। अदालत के अनुसार, संपत्ति का मूल्यांकन और मुआवजे का बंटवारा दो अलग-अलग प्रश्न हैं। मुआवजे का वितरण इस आधार पर होना चाहिए कि अधिग्रहण के कारण किस पक्ष का कौन-सा कानूनी हित समाप्त हुआ है। इसी दृष्टिकोण के आधार पर जमीन के मुआवजे को बराबर बांटने का आदेश दिया गया।

किसे कितनी रकम मिलेगी?

जमीन के मालिक- ₹5,47,17,598- जमीन के मुआवजे का 50 प्रतिशत
सदानंद गैरेज- ₹5,47,17,598- जमीन के मुआवजे का 50 प्रतिशत
इसके अतिरिक्त ₹3,85,300 निर्माण और पेड़ों के लिए निर्धारित हैं। यह राशि मालिकों को उनके संबंधित स्वामित्व हिस्सों के अनुसार दी जाएगी। लागू वैधानिक लाभ और ब्याज की गणना अलग से होगी।

अन्य दावेदारों को भी नहीं मिली राहत

इस मामले में सेंचुरी डेवलपर्स और कुछ संभावित फ्लैट खरीदारों ने भी मुआवजे में हिस्सेदारी का दावा किया था। अदालत ने इन दावों को स्वीकार नहीं किया। उसका कहना था कि मुआवजे में हिस्सा पाने के लिए संबंधित संपत्ति पर कानूनी रूप से मान्य अधिकार या ऐसा हित साबित करना आवश्यक है, जो अधिग्रहण के कारण समाप्त हुआ हो। डेवलपर और संभावित खरीदार अपने दावों के समर्थन में ऐसा अधिकार स्थापित नहीं कर सके, जिसके आधार पर उन्हें अधिग्रहण की राशि में हिस्सा दिया जा सके। अदालत ने उनके मुआवजा संबंधी दावे खारिज कर दिए। हालांकि, पक्षकारों के बीच अलग-अलग अनुबंधों से जुड़े अधिकारों के लिए स्वतंत्र कानूनी उपाय अपनाने का रास्ता खुला रखा गया।

आठ सप्ताह में भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकरण को आदेश दिया कि वह मुआवजे की संबंधित राशि की गणना करे और आठ सप्ताह के भीतर भुगतान जारी करने की प्रक्रिया पूरी करे। वैधानिक अतिरिक्त राशि और ब्याज, जहां लागू हों, उनकी गणना भी कानून के अनुसार की जाएगी। पहले किए गए किसी भुगतान को भी अंतिम गणना में समायोजित किया जाना है। इस फैसले का महत्व इसलिए भी है कि यह जमीन अधिग्रहण के मामलों में स्वामित्व और किरायेदारी के बीच अधिकारों के संतुलन को रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमीन का मालिक होना अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता कि अधिग्रहण का पूरा मुआवजा उसी को मिले। इसी तरह, लंबे समय तक संपत्ति का इस्तेमाल करने वाला किरायेदार भी केवल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक के बराबर हिस्सा मांगने का स्वतः अधिकारी नहीं बन जाता।
निष्कर्षतः, सिद्धिविनायक मंदिर से जुड़े इस जमीन अधिग्रहण मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने संपत्ति के वास्तविक बाजार मूल्य और दोनों पक्षों के प्रमाणित अधिकारों को ध्यान में रखते हुए 10.94 करोड़ रुपये के जमीन मुआवजे का समान बंटवारा तय किया है। अब संबंधित प्राधिकरण को अदालत के निर्देशों के अनुसार भुगतान की गणना और वितरण करना होगा।

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