ATMA के जरिए महिला किसानों को मिल रही नई ताकत! प्रशिक्षण, तकनीकी ज्ञान, कौशल विकास और नए अवसरों से मजबूत हो रही महिला किसानों की भूमिका
भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है और देश की कृषि व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका सदियों से बेहद महत्वपूर्ण रही है। खेतों में बीज बोने से लेकर रोपाई, निराई-गुड़ाई, कटाई, पशुपालन, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि उत्पादों के प्रबंधन तक महिलाएं लगातार योगदान देती रही हैं। इसके बावजूद लंबे समय तक कृषि क्षेत्र में महिलाओं के श्रम को वह पहचान, प्रशिक्षण और संस्थागत अवसर नहीं मिल पाए, जिसकी वे हकदार थीं। अब कृषि क्षेत्र में यह तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। ATMA यानी Agricultural Technology Management Agency के माध्यम से महिला किसानों तक प्रशिक्षण, कृषि संबंधी नई जानकारी, तकनीकी ज्ञान, कौशल विकास और विभिन्न अवसरों की पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इस पहल का मूल संदेश स्पष्ट है—जब महिलाएं कृषि में अधिक भागीदारी करेंगी, तो खेती अधिक मजबूत, आधुनिक और समावेशी बनेगी। महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, उनकी भागीदारी बढ़ेगी और कृषि की ताकत भी बढ़ेगी।
ATMA क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?
ATMA यानी कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी कृषि विस्तार व्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संस्थागत ढांचा है। इसका उद्देश्य किसानों तक कृषि विज्ञान, नई तकनीक, बेहतर उत्पादन पद्धतियां और कृषि से जुड़ी उपयोगी जानकारी पहुंचाना है। कृषि क्षेत्र में नई तकनीक का विकास तभी सफल माना जाता है, जब वह खेत तक पहुंचे और किसान उसे अपनाने में सक्षम हो। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए कृषि विस्तार सेवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।ATMA का व्यापक उद्देश्य कृषि से जुड़े विभिन्न विभागों, संस्थानों और किसानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है। इसके माध्यम से किसानों को उनकी स्थानीय जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण और जानकारी उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जाता है। महिला किसानों के लिए यह व्यवस्था विशेष महत्व रखती है, क्योंकि बड़ी संख्या में महिलाएं खेती और उससे जुड़े कार्यों में सक्रिय होने के बावजूद अक्सर औपचारिक प्रशिक्षण और तकनीकी संसाधनों तक समान पहुंच नहीं रख पातीं।
खेतों में महिलाओं की मेहनत, लेकिन पहचान की चुनौती
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की कृषि भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वे खेती के लगभग हर चरण में योगदान देती हैं। महिलाएं बीजों की तैयारी करती हैं, रोपाई और बुवाई में हिस्सा लेती हैं, निराई-गुड़ाई करती हैं, फसलों की कटाई और छंटाई करती हैं, अनाज और बीजों का संरक्षण करती हैं, पशुपालन और डेयरी से जुड़ी रहती हैं, सब्जी उत्पादन करती हैं, मशरूम उत्पादन जैसे कार्यों में भाग लेती हैं, खाद्य प्रसंस्करण करती हैं, घरेलू स्तर पर कृषि उत्पादों का मूल्यवर्धन करती हैं। इसके बावजूद कई मामलों में महिला किसानों की पहचान केवल “किसान परिवार की सदस्य” के रूप में होती रही है, जबकि वे स्वयं कृषि उत्पादन में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। ऐसे में महिला किसानों को प्रशिक्षण, जानकारी और निर्णय लेने की क्षमता से जोड़ना केवल महिला सशक्तिकरण का मुद्दा नहीं, बल्कि कृषि विकास की आवश्यकता भी है।
ATMA के जरिए प्रशिक्षण से बढ़ रहा आत्मविश्वास
कृषि में बदलाव तेजी से हो रहा है। आज खेती केवल पारंपरिक अनुभव के आधार पर नहीं चलती। किसानों को मौसम, मिट्टी, बीज, जल प्रबंधन, कीट नियंत्रण, बाजार और नई तकनीकों की जानकारी भी चाहिए। महिला किसानों को ATMA जैसे कृषि विस्तार कार्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षण और जानकारी उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाता है। इनमें शामिल हो सकते हैं—
बेहतर खेती की तकनीक- महिला किसानों को आधुनिक और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों की जानकारी दी जाती है, ताकि वे कम संसाधनों में बेहतर उत्पादन की दिशा में काम कर सकें।
फसल विविधीकरण- किसान केवल एक फसल पर निर्भर न रहें, बल्कि सब्जियां, फल, दलहन, तिलहन और अन्य कृषि गतिविधियों को अपनाकर आय के नए स्रोत विकसित कर सकें।
पशुपालन और डेयरी- ग्रामीण महिलाओं की बड़ी संख्या पहले से पशुपालन से जुड़ी हुई है। वैज्ञानिक प्रशिक्षण से दूध उत्पादन, पशु स्वास्थ्य और बेहतर प्रबंधन में मदद मिल सकती है।
कृषि उत्पादों का मूल्यवर्धन- महिलाओं को अचार, जैम, मसाले, अनाज आधारित उत्पाद और अन्य खाद्य प्रसंस्करण गतिविधियों से जोड़कर अतिरिक्त आय के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
समूह आधारित खेती और उद्यमिता- महिला समूहों के माध्यम से सामूहिक उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन की संभावनाएं मजबूत होती हैं।
ज्ञान से बढ़ती है किसान की ताकत
आज की कृषि में जानकारी भी एक महत्वपूर्ण संसाधन बन चुकी है। किसान को यह जानना जरूरी है किकौन-सी फसल कब लगानी है?मौसम में बदलाव का खेती पर क्या असर पड़ेगा?मिट्टी की गुणवत्ता कैसी है? किस कीट या बीमारी से फसल प्रभावित हो सकती है? पानी का बेहतर उपयोग कैसे किया जाए? उत्पाद को बाजार तक कैसे पहुंचाया जाए? जब महिला किसान इन जानकारियों तक पहुंच बनाती हैं, तो वे केवल खेतों में श्रमिक की भूमिका नहीं निभातीं, बल्कि कृषि निर्णयों में सक्रिय भागीदार बनती हैं। यही बदलाव महिला सशक्तिकरण की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक है।
कृषि में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना क्यों जरूरी?
विशेषज्ञों के अनुसार कृषि में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है। महिलाओं के पास जब बेहतर प्रशिक्षण और संसाधनों की जानकारी होती है, तो वे अपने परिवार और समुदाय में भी उस ज्ञान को आगे पहुंचाती हैं। एक प्रशिक्षित महिला किसान का प्रभाव केवल उसके खेत तक सीमित नहीं रहता। वह परिवार की खेती संबंधी योजनाओं को प्रभावित कर सकती है, बच्चों तक बेहतर जानकारी पहुंचा सकती है, स्वयं सहायता समूहों को मजबूत कर सकती है, गांव की अन्य महिलाओं को प्रेरित कर सकती है, कृषि आधारित छोटे उद्यम शुरू कर सकती है। इसलिए महिला किसान को सक्षम बनाना ग्रामीण समाज को सक्षम बनाने जैसा है।
‘अधिक महिलाएं, अधिक भागीदारी, मजबूत कृषि’ का संदेश
महिला किसानों की भागीदारी बढ़ाने की सोच तीन महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर आधारित है।
अधिक महिलाएं- कृषि प्रशिक्षण और विस्तार कार्यक्रमों में महिलाओं की संख्या बढ़ाई जाए।
अधिक भागीदारी- महिलाएं केवल प्रशिक्षण में उपस्थित न रहें, बल्कि कृषि निर्णयों, योजनाओं और आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाएं।
मजबूत कृषि- जब खेती में महिलाओं और पुरुषों दोनों की क्षमताओं का पूरा उपयोग होगा, तब कृषि क्षेत्र अधिक मजबूत और टिकाऊ बन सकेगा।
यही कारण है कि कृषि विकास की नई सोच में Inclusive Agriculture यानी समावेशी कृषि को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
महिला किसानों के लिए कौशल विकास के नए अवसर
कृषि का स्वरूप बदल रहा है। आज किसान केवल उत्पादन करने वाला व्यक्ति नहीं रह गया है। उसे बाजार, तकनीक और उद्यमिता की भी समझ होनी चाहिए। महिला किसानों के लिए कौशल विकास के कई क्षेत्र महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जैसे जैविक खेती, प्राकृतिक खेती से जुड़ी पद्धतियां, सब्जी उत्पादन, नर्सरी प्रबंधन, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, पोल्ट्री, डेयरी, मत्स्य पालन से जुड़े कार्य, खाद्य प्रसंस्करण, पैकेजिंग और स्थानीय उत्पादों का मूल्यवर्धन। इन गतिविधियों से महिलाओं को कृषि के साथ-साथ अतिरिक्त आय के अवसर भी मिल सकते हैं।
तकनीक तक पहुंच भी उतनी ही जरूरी
आज कृषि में डिजिटल तकनीक का महत्व लगातार बढ़ रहा है। मोबाइल फोन के माध्यम से किसान मौसम की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। बाजार भाव देख सकते हैं। कृषि संबंधी सलाह प्राप्त कर सकते हैं और सरकारी योजनाओं की जानकारी हासिल कर सकते हैं। लेकिन तकनीक का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब महिला किसानों तक भी इसकी समान पहुंच होगी। कई ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के पास मोबाइल तो होता है, लेकिन उसका उपयोग कृषि संबंधी जानकारी के लिए सीमित हो सकता है। प्रशिक्षण और जागरूकता के माध्यम से इस स्थिति में बदलाव लाया जा सकता है। ATMA जैसी कृषि विस्तार प्रणालियों की भूमिका यहां और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वे किसान और कृषि ज्ञान के बीच पुल का काम कर सकती हैं।
कृषि में महिला नेतृत्व की बढ़ती जरूरत
कृषि विकास केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। आज जरूरत है टिकाऊ खेती की, जल संरक्षण की, मिट्टी की गुणवत्ता बचाने की, जलवायु परिवर्तन के अनुसार खेती अपनाने की, और बाजार से बेहतर जुड़ाव की। इन सभी क्षेत्रों में महिला किसानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। ग्रामीण महिलाएं पारंपरिक रूप से बीज संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और घरेलू संसाधन प्रबंधन में महत्वपूर्ण अनुभव रखती हैं। यदि इस पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक प्रशिक्षण से जोड़ा जाए, तो कृषि के लिए नए मॉडल विकसित हो सकते हैं।
प्रशिक्षण से बदल सकती है आर्थिक स्थिति
महिला सशक्तिकरण का सबसे महत्वपूर्ण आधार आर्थिक स्वतंत्रता है। जब महिला किसान बेहतर उत्पादन करती है, कृषि से जुड़ा छोटा व्यवसाय शुरू करती है या अपने उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने में सक्षम होती है, तो उसकी आर्थिक भूमिका मजबूत होती है। उदाहरण के लिए, केवल कच्ची उपज बेचने के बजाय यदि कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण किया जाए, तो उनकी कीमत बढ़ सकती है। टमाटर से सॉस, फलों से जैम, दूध से विभिन्न उत्पाद, अनाज से पैक किए गए खाद्य पदार्थ और स्थानीय कृषि उपज से मूल्यवर्धित वस्तुएं तैयार की जा सकती हैं।इस तरह कृषि और उद्यमिता को जोड़कर ग्रामीण महिलाओं के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
महिला किसान केवल लाभार्थी नहीं, विकास की भागीदार
कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि महिलाओं को केवल योजनाओं की लाभार्थी के रूप में न देखा जाए। उन्हें कृषि विकास की भागीदार के रूप में स्वीकार किया जाए। जब महिला किसान को प्रशिक्षण मिलता है, तो वह ज्ञान का उपयोग करती है। जब उसे तकनीक मिलती है, तो वह उत्पादन में बदलाव ला सकती है। जब उसे बाजार की जानकारी मिलती है, तो वह बेहतर आर्थिक निर्णय ले सकती है। और जब उसे निर्णय लेने का अधिकार मिलता है, तो उसका परिवार और समुदाय भी मजबूत हो सकता है। इसलिए महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं, बल्कि कृषि की प्रगति की रणनीति भी है।
समावेशी कृषि से बनेगा मजबूत भविष्य
भारत की कृषि को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना है। बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन, जल संकट और बाजार की बदलती परिस्थितियां किसानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं।इन चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि में समाज के हर वर्ग की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। महिलाओं को पीछे रखकर कृषि का पूर्ण विकास संभव नहीं है। महिला किसानों को प्रशिक्षण, ज्ञान, कौशल और अवसरों से जोड़ना इसलिए भविष्य की कृषि रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ATMA के माध्यम से कृषि विस्तार सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करने का प्रयास इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
महिला मजबूत तो कृषि मजबूत
असम से लेकर महाराष्ट्र, पंजाब से लेकर तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान तक—भारत की खेती में महिलाओं का योगदान हर जगह दिखाई देता है। फिर भी जरूरत है कि उनके योगदान को केवल श्रम के रूप में नहीं, बल्कि नेतृत्व और ज्ञान की क्षमता के रूप में भी पहचाना जाए। ATMA जैसे कृषि विस्तार कार्यक्रम महिलाओं को प्रशिक्षण, तकनीकी जानकारी, कौशल और नए अवसरों से जोड़कर इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जब महिलाओं को कृषि में बराबर अवसर मिलेंगे, तो वे केवल अपने खेत नहीं बदलेंगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा भी बदल सकती हैं। इसलिए संदेश बिल्कुल स्पष्ट है- अधिक महिलाएं, अधिक भागीदारी, अधिक ज्ञान और कौशल और अधिक मजबूत कृषि। क्योंकि जब महिलाएं खेती में आगे बढ़ती हैं, तो केवल फसलें नहीं, बल्कि पूरे समाज का भविष्य आगे बढ़ता है।
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