चीन की चालाकी: भारत का सामान खरीदता है, लेकिन सीधे नहीं करता आयात

The CSR Journal Magazine

पिछले वित्त वर्ष का व्यापार घाटा

नई दिल्ली. भारत और चीन के बीच व्यापार के आंकड़ों को देखकर ऐसा लगता है कि भारत को चीन से बहुत अधिक सामान खरीदना पड़ रहा है। पिछले वित्त वर्ष में भारत को करीब 90 अरब डॉलर का व्यापार घाटा सहन करना पड़ा, जहां निर्यात की मात्रा बहुत कम थी और आयात की मात्रा काफी अधिक। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने इस स्थिति के बारे में नई जानकारी साझा की है।

भारत का सामान, वियतनाम के रास्ते

वित्तमंत्री ने बताया कि चीन भारत का सामान बड़ी मात्रा में खरीदता है, लेकिन उसे अन्य देशों, जैसे वियतनाम, के माध्यम से मंगवाता है। इसका मतलब यह है कि ये सामान हमारे निर्यात आंकड़ों में शामिल नहीं होते हैं। सीतारमण ने कहा कि यह स्थिति भारत के निर्यात आंकड़ों को बिगाड़ती है, जिससे यह लगता है कि हमें चीन को निर्यात करने में कमी है।

निर्यात में तकनीकी विकास

सीतारमण ने यह भी स्पष्ट किया कि तकनीकी रूप से भारत, चीन को निर्यात कर रहा है, लेकिन इसे मान्यता नहीं मिलती। भारत को कुछ विशेष उत्पादों के लिए चीन के बाजार में घुसपैठ करने में कठिनाई होती है। चाहे वह भैंस का मांस हो या जेनेरिक दवाएं, ये सामान चीन से खरीदे जाते हैं, लेकिन सीधे नहीं भेजे जाते।

सरकार की योजनाएं: मुफ्त नहीं, बल्कि योजनाबद्ध

वित्तमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार की योजनाएं केवल मुफ्त नहीं हैं। ये सभी योजनाएं एक स्पष्ट योजना के तहत तैयार की गई हैं। उन्होंने कहा कि इन योजनाओं का वित्तीय आधार मजबूत है और इन्हें केवल ‘फ्रीबी’ कहकर नहीं देखा जाना चाहिए।

डिजिटल भुगतान पर उठे सवाल

सीतारमण ने डिजिटल भुगतान के बारे में भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) कोई नया कर नहीं है और इसका प्रभाव ग्राहक पर नहीं पड़ेगा। यह शुल्क केवल व्यापारी और भुगतान सेवा प्रदाता के बीच रहेगा।

उद्योगों को मिल रहा है प्रोत्साहन

वित्तमंत्री ने कहा कि सरकार उन उद्योगों को प्रोत्साहन दे रही है जो अपने उत्पादन को बढ़ाकर दूसरे देशों पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। यह कदम भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे न केवल व्यापार घाटा कम होगा बल्कि रोजगार भी बढ़ेगा।

आगामी चुनौतियां

सीतारमण ने यह भी उल्लेख किया कि भारत के निर्यात आंकड़े बेहतर करने के लिए और मेहनत करनी होगी। सरकारी योजनाओं के तहत उद्योगों को मजबूत करने के लिए जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रयास करने होंगे।

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