नेपाल फिर बनेगा हिंदू राष्ट्र? शेर बहादुर देउबा की नई रणनीति

The CSR Journal Magazine
नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा ने नेपाल को पुनः एक हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग उठाई है। इस मांग के साथ, नेपाल में राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है। बालेन शाह की सरकार के लिए यह एक चुनौती बन गई है, क्योंकि नेपाल पहले ही एक हिंदू राष्ट्र रह चुका है, जिसे राजशाही के पतन के बाद कम्युनिस्टों ने धर्मनिरपेक्ष राज्य में बदल दिया था। नेपाली कांग्रेस ने उस समय इस बदलाव का समर्थन किया था, लेकिन अब स्थिति बदल रही है। देउबा की इस मांग से मुख्यधारा की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है, जिसके पीछे बहुसंख्यक हिंदू आबादी की आकांक्षाएँ हैं।

क्या देउबा की रणनीति है राजनीतिक महत्व regained करना?

नेपाली कांग्रेस के भीतर यह बदलाव कई सवालों को जन्म दे रहा है। शेर बहादुर देउबा ने पहले इस मुद्दे से दूरी बनाए रखी थी और अब अचानक इसे क्यों उठाया? उनके करीबी सहयोगियों का कहना है कि यह कदम उनकी राजनीतिक सुरक्षा की कमी को दर्शाता है। राजनीतिक विश्लेषक लोक राज बराल का कहना है कि देउबा की यह नई रुख अपनाने की वजह यह है कि उन्हें अपनी राजनीतिक अहमियत फिर से हासिल करनी है।

नेपाली कांग्रेस में हिंदू राष्ट्र का इतिहास

नेपाली कांग्रेस में हिंदू राष्ट्र की मांग कोई नयी बात नहीं है। इससे पहले, दिवंगत खुम बहादुर खड्का और अन्य नेताओं ने भी इस मुद्दे को उठाया था। 2018 में जब खड्का का निधन हुआ, तब से शशांक कोइराला और शंकर भंडारी जैसे नेताओं ने इसे आगे बढ़ाने का कार्य किया। इसके बावजूद, इस प्रस्ताव को औपचारिक रूप से पार्टी के एजेंडे में शामिल नहीं किया गया था।

विरोधी मुद्दों का सामना करते हुए देउबा का नया कदम

दिलचस्प बात यह है कि शेर बहादुर देउबा ने इस मुद्दे का विरोध किया था जब वह पार्टी के अध्यक्ष थे और अब अचानक इस मुद्दे को लेकर सक्रिय हो गए हैं। पिछले महीनों में, उन्हें मनी-लॉन्ड्रिंग की जांच का सामना करना पड़ा और अब वे फिर से राजनीतिक गतिविधियों को शुरू कर रहे हैं। उनके नेतृत्व वाले गुट ने अब निर्माण की कोशिश की है, जो बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार को चुनौती दे रहा है।

महासमिति में फिर से उठेगा विषय

अगले महीने, देउबा के गुट की महासमिति की बैठक में हिंदू राष्ट्र के मुद्दे को फिर से उठाने की संभावना है। इस बैठक में पहल की जाएगी ताकि पार्टी के भीतर इस मुद्दे के प्रति गंभीरता से विचार किया जा सके। इस बार, दूसरे नेताओं ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया है और यही वजह है कि यह बहस और भी बढ़ती जा रही है। जटिल राजनीतिक हालात में, शेर बहादुर देउबा का यह कदम राजनीतिक एकजुटता और भविष्य की दिशा तय कर सकता है।

देउबा की वापसी और आगामी चुनावों की तैयारी

जून में, देउबा ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों को फिर से सक्रिय किया और अब इस बार उनकी वापसी ने पार्टी के अंदर सुगबुगाहट पैदा कर दी है। उन्होंने कहा है कि वह राजनीतिक हालात के अनुसार कदम उठाएंगे। इस साल के अंत में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए, उनकी रणनीति और भी महत्वपूर्ण हो गई है, खासकर जब वे अपने गुट को बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ खड़ा करना चाहते हैं।

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