यूपी में ‘राज’ के लिए चाहिए राजभर समाज का साथ, जानें कितनी सीटों पर असर और कितना दखल

The CSR Journal Magazine
2027 के विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही उत्तर प्रदेश में कई जातियों की सियासी सक्रियता बढ़ रही है। इनमें राजभर समाज का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) का बीजेपी से अलग होकर सपा के साथ जाना, पूर्वांचल की सियासत को पूरी तरह बदल दिया था। यह दर्शाता है कि राजभर समाज का राजनीतिक गणित में कितना बड़ा हाथ है।

राजभर समाज की जनसंख्या और प्रभाव

उत्तर प्रदेश में राजभर समाज की जनसंख्या लगभग 2.44 प्रतिशत है, जो मुख्य रूप से पूर्वांचल के इलाकों में निवास करती है। यह समाज ओबीसी श्रेणी के तहत अति पिछड़ी जाति में आता है। राजभर समुदाय के लोग पारंपरिक रूप से छोटे किसान या खेतिहर मजदूर के रूप में जुड़े हुए हैं। खेती और पशुपालन इनके लिए आजीविका का मुख्य आधार है।

राजभर समुदाय का वोटबैंक

राजभर समुदाय की आबादी भले ही छोटी हो, लेकिन इसका राजनीतिक प्रभाव काफी बड़ा है। प्रदेश की 153 विधानसभा सीटों पर इस समुदाय की प्रत्यक्ष उपस्थिति है। इनमें से 66 सीटें ऐसी हैं, जहां राजभर समाज हार-जीत तय कर सकता है। पूर्वांचल के 24 जिलों में राजभर समाज का प्रभाव दिखाई देता है। गाजीपुर, बलिया, मऊ, आजमगढ़, वाराणसी जैसे जिलों में राजभर समुदाय का वोट प्रतिशत 18 से 20 प्रतिशत तक हो सकता है।

सियासी दखल और महत्व

राजभर समाज की सियासी भूमिका को देखते हुए सभी दल इस समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव में यह समीकरण निर्णायक साबित हो सकता है। सुभासपा के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर की एनडीए के साथ खड़ी रहने की स्थिति में, राजभर वोट बैंक पर उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।

राजभर समाज के नेता

राजभर समुदाय के सबसे बड़े नेता ओम प्रकाश राजभर हैं, जिन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान बनाई है। सुभासपा भले ही अकेले दम पर चुनावी करिश्मा न दिखा सके, लेकिन गठबंधन के जरिए पूर्वांचल की सियासत में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बीजेपी में अनिल राजभर, सपा में राम अचल राजभर और बसपा में भीम राजभर जैसे नेता इस समाज के प्रमुख चेहरे हैं।

राजभर समाज का भविष्य

आगामी विधानसभा चुनाव में राजभर समुदाय किसका समर्थन करेगा, यह एक बड़ा सवाल है। सुभासपा के बीजेपी के साथ जाने के बाद, सपा को राजभर समाज को अपने पाले में लाने के लिए नई रणनीतियों पर काम करना पड़ रहा है। इसके लिए पार्टी ने राम अचल राजभर और रमाशंकर राजभर जैसे नेताओं को आगे किया है।

राजभर समाज का राजनीतिक सफर

राजभर समाज का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 2017 में बीजेपी के साथ गठबंधन कर ओम प्रकाश राजभर मंत्री बने, लेकिन 2019 में अलग हो गए। 2022 में सपा के साथ आने से पूर्वांचल में बड़ा सियासी असर दिखा। हालांकि, 2023 में वे फिर से एनडीए के साथ चले गए।

सपा की नई रणनीतियाँ

सपा के रणनीतिकार मानते हैं कि राजभर मतों पर ओम प्रकाश राजभर का प्रभाव अब पहले जितना मजबूत नहीं है। सीमा राजभर जैसे नए चेहरे को सपा ने आगे बढ़ाया है, जो राजभर समाज से आती हैं और जमीनी स्तर पर सक्रिय हैं। यह सपा के लिए एक नई चुनौती है।

भविष्य की सियासी लड़ाई

बीजेपी अनिल राजभर और ओम प्रकाश राजभर के साथ अपनी केमिस्ट्री को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। 2027 के चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजभर समाज का झुकाव किस ओर होता है। क्या वे सपा के नए चेहरे को स्वीकार करेंगे या फिर ओम प्रकाश राजभर के साथ रहेंगे, यह एक बड़ा सवाल है।

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