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March 13, 2026

मुसलमानों के लिए इस्लामी उत्तराधिकार कानून का पालन अनिवार्य, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का बड़ा दावा

The CSR Journal Magazine
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण घोषणा की है। उन्होंने कहा है कि इस्लामी उत्तराधिकार कानूनों का पालन सभी मुसलमानों के लिए अनिवार्य है। यह बयान उस वक्त आया है जब नया नारी फाउंडेशन ने महिला अधिकारों के संदर्भ में इस कानून को अमान्य करने की मांग की। बोर्ड ने इस मांगे को निराधार और भ्रामक करार दिया है।

धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता, डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि इस्लाम ने पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार दिए हैं। उनके अनुसार, इस्लामी पारिवारिक कानून कुरान और सुन्नत पर आधारित हैं और इनका पालन सभी मुसलमानों के लिए अनिवार्य है।

भेदभाव का आरोप और असली सच्चाई

बोर्ड ने बताया कि मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव का आरोप केवल शरिया के ज्ञान की कमी पर आधारित है। उन्होंने कहा कि भरण-पोषण और घरेलू खर्चों की जिम्मेदारी पुरुषों पर है, जिससे महिलाएं इन दायित्वों से मुक्त होती हैं। इसके बावजूद, महिलाएं अपनी विरासत में हिस्से की हकदार होती हैं।

महिलाओं के अधिकारों की विशेषताएं

प्रवक्ता ने कहा कि इस्लामी उत्तराधिकार कानून कई ऐसी स्थितियां प्रदान करता है जहां महिलाएं पुरुषों के बराबर या कभी-कभी उनसे अधिक भागीदारी प्राप्त करती हैं। इस्लाम ने उन समय में महिलाओं के अधिकारों को मान्यता दी जब उन्हें नजरअंदाज किया जाता था।

समान नागरिक संहिता पर विवाद

डॉ. इलियास ने मुख्य न्यायाधीश के यह कहने पर कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) ही समाधान है, अपनी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करेगा। उत्तराखंड में लागू की गई यूसीसी को उन्होंने अवैध और असंवैधानिक बताया है।

भारतीय मुसलमानों का एकजुट विरोध

डॉ. इलियास ने स्पष्ट किया कि इस्लामी उत्तराधिकार कानून को भेदभावपूर्ण बताना शरिया कानून में हस्तक्षेप का बहाना है। उन्होंने कहा कि 5 करोड़ से अधिक मुसलमान, जिनमें अधिकांश महिलाएं शामिल हैं, यूसीसी का विरोध कर चुके हैं।

बोर्ड की अपील और भविष्य के कदम

इस प्रकार, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से इस्लामी उत्तराधिकार कानून में बदलाव की मांग करने वाली याचिका को खारिज करने की अपील की है। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम महिलाएं शरिया कानूनों में किसी प्रकार के बदलाव की मांग नहीं कर रही हैं।
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