Delhi High Court का बड़ा फैसला: महिला की छाती पर ‘रेपिस्ट’ टैटू, आरोपी की सजा हुई कम

The CSR Journal Magazine
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने 2009 में एक लड़की के साथ रेप के आरोपी की सजा को घटाकर उतनी ही कर दी है, जितनी सजा वह पहले ही काट चुका है। कोर्ट ने यह ध्यान रखा कि अब वे दोनों अपने-अपने साथी के साथ नई जिंदगी जी रहे हैं। कोर्ट के जस्टिस वीके यादव ने कहा कि आरोपी को जेल भेजने का कोई लाभ नहीं नजर आता, क्योंकि समय के साथ दोनों ही अब माता-पिता बन चुके हैं। इस मामले में पीड़िता की उम्र भी एक महत्वपूर्ण कारक है, क्योंकि उस समय वह नाबालिग थी।

टैटू और युवाओं की सोच

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि जिस वक्त महिला ने आरोपी का नाम अपनी छाती पर गुदवाया, वह उसके साथ अपनी मर्जी से घूमने गई थी। इस पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणियां कीं कि ऐसा कोई भी निर्णय न्याय का मजाक बना देता है। ऐसा लगता है कि दोनों के बीच एक खास रिश्ता था, और नाबालिग होने के नाते कुछ चीजें समझदारी से नहीं हुईं।

‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ का जिक्र

कोर्ट ने ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ का उल्लेख करते हुए कहा कि कम उम्र के बच्चे जब रोमांटिक संबंधों में होते हैं, तो उनके बीच का फर्क काफी कम होता है। वकील ने इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट की सिफारिश का भी हवाला दिया, जिसमें ऐसे मामलों के लिए इस तरह का प्रावधान लाने का सुझाव दिया गया था। इस क्लॉज का उपयोग उन मामलों में किया जाता है, जहां दोनों की उम्र में बहुत कम फर्क होता है।

महिला की मंशा की चर्चा

अदालत ने कहा कि महिला ने भी इस केस को आगे नहीं बढ़ाने की इच्छा जताई है। ऐसा लगता है कि उसने भी अपने जीवन के बारे में सोच विचार किया है और वह इस मामले में आगे नहीं जाना चाहती। कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला अपनी स्थिति और टैटू के संदर्भ में जवाब ढूंढने की कोशिश कर रही होगी।
जस्टिस वीके यादव ने कहा कि साफ-सुथरे रिकॉर्ड को देखते हुए यह अजीब होगा कि अब आरोपी को फिर से जेल में रखा जाए। उनका लंबा आपराधिक मुकदमा और उसकी प्रक्रिया ने उन्हें समझदार बना दिया होगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस कार्रवाई का परिणाम केवल आरोपी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उनकी जिंदगी में आगे होने वाले प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष की जगह पर विचार

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला एक महत्वपूर्ण मिसाल प्रस्तुत करता है कि कैसे न्याय प्रणाली में जटिलताएं और व्यक्तिगत परिस्थितियां एक विशेष केस में विचारणीय होती हैं। नाबालिग होने का तर्क और इस केस में शामिल संबंध आवश्यक रूप से ध्यान में रखने वाली बातें हैं।

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