भारत में पटरी पर कबाड़ से कमाल: न खिड़की, न दरवाजा! भारतीय रेलवे की इस ट्रेन का रहस्य क्या है

The CSR Journal Magazine

 भारत में चलती है बिना दरवाजे और खिड़कियों वाली ट्रेन!

भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है, जो यात्री और माल ढुलाई दोनों के लिए जाना जाता है। आपने अक्सर पटरी पर ऐसी ट्रेनें देखी होंगी जिनमें न खिड़कियां होती हैं और न ही किनारे के दरवाजे। पहली नजर में ये किसी ‘भूतिया ट्रेन’ या बेकार डिब्बों जैसी लग सकती हैं, लेकिन असल में ये भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन ट्रेनों को NMG (New Modified Goods) रेक कहा जाता है, जिन्हें विशेष रूप से ऑटोमोबाइल (कार, ट्रैक्टर, और बाइक) के सुरक्षित परिवहन के लिए तैयार किया गया है।

विशेष ट्रेन का अनोखा डिज़ाइन

क्या आपने कभी सोचा है कि भारत में एक ऐसी ट्रेन भी मौजूद है जो बिना दरवाजे और बिना खिड़कियों के चलती है? यह सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन यह सच है। यह ट्रेन खासतौर पर विशेष कार्यों के लिए डिज़ाइन की गई है। आम यात्रियों के लिए नहीं, बल्कि इससे जुड़े एक महत्वपूर्ण कार्य के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

क्यों है यह ट्रेन खास?

इस ट्रेन को आमतौर पर “गुड्स ट्रेन” कहा जाता है और यह मुख्य रूप से माल ढोने के लिए इस्तेमाल होती है। विशेष रूप से, यह शहरी क्षेत्रों में निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक सामान को लाने और ले जाने में मदद करती है। इस ट्रेन की डिजाइन इस प्रकार की गई है कि सामान को आसानी से लोड और अनलोड किया जा सके।

कोच का निर्माण और डिज़ाइन

ये ट्रेनें नई नहीं बनाई जातीं। जब यात्री डिब्बे (ICF कोच) अपनी 20-25 साल की सेवा पूरी कर लेते हैं, तो उन्हें ‘कबाड़’ घोषित करने के बजाय NMG में बदल दिया जाता है।
डिब्बों के अंदर की सभी सीटें, पंखे और शौचालय हटा दिए जाते हैं ताकि ज्यादा जगह बन सके। सुरक्षा के लिहाज से इनकी सभी खिड़कियों और दरवाजों को लोहे की चादरों से पूरी तरह सील (वेल्ड) कर दिया जाता है।

लोडिंग और अनलोडिंग प्रक्रिया

इन कोचों में किनारे से सामान नहीं चढ़ाया जाता। इसके बजाय, कोच के पिछले हिस्से (Rear End) में एक बड़ा दरवाजा लगाया जाता है जो ऊपर या नीचे की तरफ खुलता है। वाहनों को एक रैंप के माध्यम से कोच के अंदर चलाया जाता है। एक कोच में आमतौर पर 5 से 6 कारें आसानी से समा जाती हैं। बिना खिड़की-दरवाजों वाली डिजाइन कारों को रास्ते में पत्थरबाजी, चोरी, बारिश और धूल-मिट्टी से बचाती है। सड़क मार्ग (ट्रकों) की तुलना में रेलवे से कारें भेजना काफी सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल पड़ता है।मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी बड़ी कंपनियाँ अपने कारखानों (जैसे गुरुग्राम या पुणे) से देश के कोने-कोने तक गाड़ियाँ पहुँचाने के लिए इन्हीं ट्रेनों का सहारा लेती हैं।

सुरक्षित यात्रा के लिए किया गया है निर्माण

इस ट्रेन की खास बात यह है कि इसमें सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। दरवाजे और खिड़कियां न होने के कारण, यह ट्रेन खुली संरचना में सामान को लेकर चलती है और इसके चलते सामान की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकता है। इसे विशेष रूप से उन क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जाता है जहां भारी सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में सहूलियत हो।

NMG ट्रेनों की रफ़्तार (Speed)

पहले की तुलना में इन ट्रेनों की रफ़्तार में काफी सुधार किया गया है। पहले ये ट्रेनें अधिकतम 75 किमी/घंटा की रफ्तार से चलती थीं। अब इन्हें अपग्रेड करके 100 किमी/घंटा की रफ्तार पर चलाया जा रहा है। रफ़्तार बढ़ने से कारखानों से डीलरशिप तक गाड़ियाँ पहुँचने का समय लगभग 20-25% कम हो गया है।

नया वर्जन: NMGH (New Modified Goods High-speed)

रेलवे ने हाल ही में NMGH कोच पेश किए हैं, जो पुराने NMG से कहीं ज्यादा उन्नत हैं। NMGH कोचों की छत सामान्य से ऊंची होती है, जिससे अब बड़े SUVs और ऊंचे वाहनों को आसानी से लोड किया जा सकता है। इसमें ‘साइड-एंट्री’ के बजाय पीछे की तरफ से ऑटोमैटिक और चौड़े दरवाजे दिए गए हैं। इनके फर्श पर ‘चेकर्ड प्लेट्स’ लगाई गई हैं, जो वाहनों के टायरों को बेहतर पकड़ (Grip) देती हैं और उन्हें हिलने से रोकती हैं। कोच के अंदर LED लाइट्स लगाई गई हैं ताकि रात के समय लोडिंग और अनलोडिंग में कोई परेशानी न हो।

पर्यावरण और लागत पर प्रभाव

 एक NMG ट्रेन में लगभग 100 से 125 कारें एक साथ आ जाती हैं। सड़क मार्ग से इतनी कारें भेजने के लिए कम से कम 15-20 बड़े ट्रकों की जरूरत होती, जिससे प्रदूषण और ट्रैफिक बढ़ता है। रेलवे से परिवहन करना सड़क मार्ग के मुकाबले 30% तक सस्ता पड़ता है, जिसका फायदा अंततः ग्राहकों को कार की कम कीमत के रूप में मिल सकता है।

यात्रियों के लिए नहीं है यह सेवा

यह ट्रेन आम यात्रियों के लिए नहीं है। इसलिए, अगर आप इसे देखकर अचंभित होते हैं, तो यह स्वाभाविक है। भारत में चलने वाली सामान्य यात्री ट्रेनों की तुलना में, यह ट्रेन पूरी तरह से अलग है। इसके उपयोग के पीछे का मुख्य उद्देश्य लोगों की यात्रा को सुविधाजनक बनाना नहीं, बल्कि सामान को तेजी से पहुँचाना है।

अनोखे अनुभव का हिस्सा

इस ट्रेन की यात्रा न केवल अनोखी है बल्कि यह एक अलग अनुभव भी है। माल ढोने वाली इस ट्रेन में चलते समय आप देख सकते हैं कि कैसे मजदूर और निर्माण सामग्री एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाई जाती है। यह केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि ढेर सारी गतिविधियों का एक हिस्सा है जो हमारे दैनिक जीवन में अहम भूमिका निभाता है।

भारत में विकास का प्रतीक

बिना दरवाजे और खिड़कियों वाली ट्रेन भारत के तेजी से बढ़ते विकास की कहानी है। यह दिखाती है कि कैसे परिवहन व्यवस्था और ट्रांसपोर्टेशन तकनीक में परिवर्तन लाया जा सकता है। रेलवे नेटवर्क का यह अनूठा पहलू न केवल देश के विकास को दर्शाता है बल्कि यह विश्व के अन्य देशों के लिए एक उदाहरण भी है।

भविष्य में और भी नई ट्रेनें

भारत में रेलवे के क्षेत्र में निरंतर नवाचार हो रहे हैं। बिना दरवाजे और खिड़कियों वाली इस ट्रेन से प्रेरित होकर, भविष्य में और भी अद्वितीय ट्रेनें देखने को मिल सकती हैं। जो कि न केवल सुरक्षित, बल्कि उच्च तकनीक से लैस होंगी। इस तरह की विकासशील परियोजनाएँ देश की परिवहन प्रणाली को और भी मजबूत बनाएंगी। भारत में बिना खिड़की और दरवाजों वाली ये ट्रेनें भारतीय रेलवे की “जुगाड़” और “इंजीनियरिंग” का एक बेहतरीन उदाहरण हैं। पुराने यात्री कोचों को नया जीवन देकर रेलवे न केवल कचरा कम कर रहा है, बल्कि ऑटोमोबाइल उद्योग को एक सुरक्षित और किफायती लॉजिस्टिक समाधान भी दे रहा है। ये ट्रेनें इस बात का प्रतीक हैं कि कैसे सीमित संसाधनों का पुन: उपयोग (Reuse) करके देश की प्रगति में योगदान दिया जा सकता है।

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