दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: नाबालिग पत्नी से संबंध बनाना POCSO के तहत अपराध

The CSR Journal Magazine

जस्टिस संजीव नरूला का फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण मामले में निर्णय सुनाया है जिसमें एक व्यक्ति पर 16 साल की लड़की के साथ दुष्कर्म का आरोप था। न्यायालय ने आरोपी की स्थिति को खारिज करते हुए कहा कि नाबालिग से शादी करना उसे कानूनी कार्रवाई से नहीं बचा सकता। जस्टिस संजीव नरूला ने 26 सितंबर 2026 को इस आदेश को निष्पादित किया। आरोपी ने दावा किया कि लड़की उसकी कानूनी पत्नी है और उनकी शादी मुस्लिम रीतियों के अनुसार हुई थी, लेकिन कोर्ट ने इसे मानने से इनकार कर दिया।

शादी का हवाला और मेडिकल जांच

इस मामले में आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 375 और POCSO एक्ट, 2012 के तहत मामला दर्ज किया गया है। आरोपी ने इस स्थिति को खत्म कराने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। अदालत में प्रस्तुत याचिका में महिला ने बताया कि जब उसकी शादी हुई, तब उसकी उम्र 16 साल 3 महीने थी। इसके विपरीत, उसके पति की उम्र 28 वर्ष थी।

कानूनी दावे और सामाजिक मुद्दे

महिला ने अदालत में बताया कि शादी उसकी इच्छा से हुई थी और उस पर किसी भी तरह का दबाव नहीं था। उसने अपने पति की जमानत का भी समर्थन किया, साथ ही गर्भावस्था के दौरान उसे अपने पति के साथ रखने की मांग की। याचिका में यह भी कहा गया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत लड़की अब बालिग हो चुकी है, इसलिए उनके संबंधों को अपराध नहीं माना जाना चाहिए।

अलग-अलग अदालतों के रुख

यह मामला केवल दिल्ली हाईकोर्ट तक सीमित नहीं है। इससे पहले केरल हाईकोर्ट ने भी इसी तरह के मामलों में और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी की परिभाषा पर विचार किया था। आगामी सुनवाई में इन अदालतों ने भी इसी सोच का समर्थन किया था। इस प्रवृत्ति से यह स्पष्ट होता है कि कानूनी दस्तावेजों के बावजूद, अदालतों का रुख समान नहीं है।

कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण

इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि नाबालिग विवाह की धारा और पर्सनल लॉ के अंतर्गत भी विभिन्न अदालतों का दृष्टिकोण अलग है। जैसे कि केरल और दिल्ली हाईकोर्ट ने विभिन्न फैसले सुनाए हैं जो इस संवेदनशील विषय पर बहस को और अधिक बढ़ाते हैं। ऐसे में यह देखा जाना है कि भविष्य में इस तरह के मामलों में अदालतें किस दिशा में आगे बढ़ती हैं।

समाज पर प्रभाव

यह मामला केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। युवाओं की सुरक्षा और कानूनी अधिकारों का महत्व ऐसी स्थिति में अत्यधिक बढ़ जाता है। ऐसे मामलों में न्यायालय का निर्णय एक मिसाल कायम करता है, जिससे समाज में परिपक्वता और समझदारी का संचार होता है।

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