मैसूर दशहरे की शान ‘गजराज अभिमन्यु’ की विदाई, स्वर्ण सिंहासन उठाने की परंपरा पर विराम

The CSR Journal Magazine
बेंगलुरु: मैसूर दशहरे का जुलूस जब भव्यता के साथ निकलता है, तो उसमें शामिल सोने से सजा स्वर्ण सिंहासन हर किसी का ध्यान खींचता है। इस सिंहासन को उठाने वाला हाथी ‘गजराज अभिमन्यु’ अब अपने कामकाजी जीवन के एक बड़े अध्याय को समाप्त करने जा रहा है। 61 साल का यह हाथी, जो 2020 से स्वर्ण सिंहासन उठाने का कार्य कर रहा था, अब आराम करने की तैयारी में है। अभिमन्यु की पहचान केवल दशहरे तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने वन विभाग के लिए भी कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं।

दशहरे का गर्वीला हाथी

अभिमन्यु का नाम सुनते ही लोगों के मन में उसकी भव्यता और ताकत का चित्र उभरता है। यह गजराज केवल एक हाथी नहीं, बल्कि दशहरे की शाही परंपरा का प्रतीक बन चुका है। 750 किलो वजनी स्वर्ण सिंहासन को उठाना उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी रही है। इस कार्य को करने के लिए अभिमन्यु ने वर्षों तक प्रशिक्षण लिया और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखा। उसकी उपस्थिति हर साल दशहरे के जुलूस में लोगों के लिए एक खास आकर्षण का केंद्र बनती थी।

जंगलों में अभिमन्यु का योगदान

अभिमन्यु की पहचान केवल मैसूर दशहरे तक नहीं है। 1977 से कुमकी हाथी के रूप में काम करते हुए, उसने जंगली हाथियों को पकड़ने और बाघों को काबू करने के अभियानों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उसके नाम 300 से अधिक हाथियों और 80 से ज्यादा बाघों को पकड़ने का रिकॉर्ड है। यह उसकी मेहनत और समर्पण का प्रमाण है कि उसने वन विभाग के साथ मिलकर कई कठिन अभियानों में हिस्सा लिया।

महावत के साथ भावनात्मक रिश्ता

हाथी और महावत का रिश्ता केवल काम तक सीमित नहीं होता। अभिमन्यु ने अपने जीवन के कई दशक महावतों और वन विभाग के कर्मचारियों के साथ बिताए हैं। उनके बीच का तालमेल और आपसी समझ एक गहरी दोस्ती का परिचायक है। अब जब अभिमन्यु की विदाई का समय आ गया है, तो यह पल उन सभी के लिए भावुक है, जिन्होंने उसे वर्षों तक काम करते देखा और उसकी देखभाल की।

अभिमन्यु की सेवानिवृत्ति का नया अध्याय

अभिमन्यु की सेवानिवृत्ति का अर्थ यह नहीं है कि उसकी यात्रा समाप्त हो रही है। बल्कि, यह एक नए दौर की शुरुआत है। अब मथिगोडु हाथी शिविर में रहकर वह अपनी बाकी की जिंदगी बिताएगा। जुलाई 2026 में एक दुर्घटना के दौरान उसके बाएं दांत की नोक टूट गई थी, लेकिन पशु चिकित्सकों ने बताया कि वह अन्यथा स्वस्थ है। इसके बाद भी उसने बाघों के ट्रैकिंग अभियानों में हिस्सा लिया, जो उसकी जीवटता को दर्शाता है।

दशहरे की परंपरा में अभिमन्यु की भूमिका

मैसूर दशहरे की परंपरा में अभिमन्यु की भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उसकी ताकत और साहस ने उसे एक अद्वितीय पहचान दी है। अब जब उसकी जिम्मेदारियां दूसरे हाथियों को सौंप दी जाएंगी, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि वे उसकी विरासत को कैसे आगे बढ़ाते हैं। अभिमन्यु का योगदान हमेशा याद रखा जाएगा, चाहे वह जंगलों में हो या दशहरे के भव्य जुलूस में।

अभिमन्यु का नया जीवन

अभिमन्यु की विदाई के बाद अब मथिगोडु हाथी शिविर में उसकी देखभाल की जाएगी। यह स्थान उसके लिए एक नया आश्रय बनेगा, जहां वह आराम कर सकेगा। उसके साथ बिताए गए समय की यादें और उसके द्वारा किए गए कार्य हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेंगी। मैसूर दशहरे की परंपरा में उसकी उपस्थिति एक अद्वितीय अनुभव थी, जिसे लोग हमेशा याद करेंगे।

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