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February 21, 2026

गगनयान मिशन के ड्रोग पैराशूट का क्वालिफिकेशन टेस्ट सफल, सुरक्षा मानकों को पूरा करने में मदद करेगा

The CSR Journal Magazine
भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर पार कर लिया है। हाल ही में ड्रोग पैराशूट का क्वालिफिकेशन लेवल लोड टेस्ट सफलतापूर्वक संपूर्ण किया गया। यह टेस्ट यह सुनिश्चित करता है कि पैराशूट की मजबूती और सुरक्षा मानकों को पूरा किया जा सके। जब कैप्सूल पृथ्वी के वातावरण में लौटता है, तब यह पैराशूट उसकी गति को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पैराशूट की मजबूती की जांच

इस टेस्ट में अधिकतम उड़ान भार से कहीं अधिक लोड डालकर पैराशूट की मजबूती की जांच की गई। इससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत सक्षम है एक मजबूत और उच्च क्षमता वाले रिबन पैराशूट को डिजाइन करने में। इस टेस्ट की सफलता आंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की तकनीकी क्षमता को दर्शाती है।

टेस्ट की जगह और प्रक्रिया

यह महत्वपूर्ण टेस्ट 18 फरवरी को चंडीगढ़ स्थित टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL) की रेल ट्रैक रॉकेट स्लेड (RTRS) सुविधा में किया गया। इस डायनेमिक टेस्ट में डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) की स्पेशल हाई-स्पीड एयरोडायनामिक और बैलिस्टिक मूल्यांकन सुविधा का इस्तेमाल किया गया। इस प्रक्रिया में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के सदस्य और अन्य विशेषज्ञ भी शामिल थे।

कार्यक्रम का महत्व

गगनयान मिशन की सफलता के लिए ड्रोग पैराशूट अत्यंत आवश्यक है। यह सुनिश्चित करता है कि अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित तरीके से पृथ्वी पर वापस लाया जा सके। पैराशूट की डिजाइन और परीक्षण प्रक्रिया से यह बात भी स्पष्ट होती है कि भारत अपने अंतरिक्ष मिशन में पूरी तरह से सक्षम है।

टीम का योगदान

इस महत्वपूर्ण टेस्ट में ISRO के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) और DRDO की एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ADRDE) जैसी मान्यता प्राप्त टीमों ने भाग लिया। इन सभी ने मिलकर गगनयान कार्यक्रम को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी विशेषज्ञता और मेहनत से यह मुमकिन हुआ कि भारत ने इस सफल परीक्षण को पूरा किया।

अंतरिक्ष दौरे के नए अवसर

गगनयान मिशन भारत को अंतरिक्ष के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में सहायक होगा। यह न केवल देश के लिए बल्कि पूरी मानवता के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। भविष्य में इस प्रकार की तकनीकें अन्य अंतरिक्ष मिशनों में भी अपनाई जा सकती हैं।

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