राम मंदिर में दान का बड़ा विवाद: कैश निकलवाने का खेल और मास्टरमाइंड की तलाश
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे (दान) की चोरी और वित्तीय अनियमितताओं का मामला जून 2026 में एक बड़े विवाद के रूप में सामने आया है, जिसकी जांच उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) कर रही है. शुरुआती अनुमानों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस घोटाले की राशि ₹5 करोड़ से लेकर ₹200 करोड़ तक होने की आशंका जताई जा रही है। श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस संवेदनशील मामले ने देशव्यापी राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी है।
कैश गायब होने का चौंकाने वाला मामला
राम मंदिर के दानपात्रों से गायब पैसे का मामला हर दिन नया मोड़ ले रहा है। एसआईटी (स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम) अब रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और बैंक डिटेल्स की जांच कर रही है। चर्चाएं तेज हैं कि गायब हुई रकम करोड़ों में जा सकती है। जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अभी पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है, लेकिन यह सवाल उठता है कि इतनी बड़ी अनियमितता लंबे समय से कैसे चलती रही।
कैश गायब होने का खेल
जांच में सामने आया है कि दानपात्रों से नकदी निकालने वाली काउंटिंग टीम के कुछ कर्मचारी वाउचर में वास्तविक रकम से काफी कम राशि दर्ज करते थे और बाकी कैश आपस में बांट लेते थे। मामले को छुपाने के लिए मंदिर परिसर की पिछले 7 से 8 महीनों की CCTV फुटेज डिलीट कर दी गई, जिससे कैश काउंटिंग टेबल की इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग पूरी तरह नष्ट हो गई। ट्रस्ट के सूत्रों के अनुसार, परिसर में आने-जाने वाले कर्मचारियों की कोई कड़ी सुरक्षा जांच (फ्रिस्किंग) नहीं होती थी, जिसका फायदा उठाकर कैश और सोने-चांदी के आभूषण आसानी से बाहर भेज दिए गए। इसके अलावा, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के बैंक खातों से क्लोन चेक के जरिए करीब ₹6 लाख की धोखाधड़ी से निकासी का मामला भी उजागर हुआ है।
मास्टरमाइंड की तलाश- SIT का एक्शन
इस खेल के पीछे के मुख्य मास्टरमाइंड और इसमें शामिल सिंडिकेट को बेनकाब करने के लिए SIT की जांच बेहद तेज हो गई है। ₹18,000 से ₹20,000 की मामूली सैलरी पाने वाले कुछ कर्मचारियों द्वारा ₹40 लाख से ₹1.5 करोड़ तक के महंगे प्लॉट और लग्जरी गाड़ियां खरीदने के बाद एजेंसियां सक्रिय हुईं। छापेमारी में अब तक संदिग्धों के पास से करीब ₹2 करोड़ कैश, एक लग्जरी कार और 3 आईफोन जब्त किए जा चुके हैं। पुलिस ने मंदिर के कर्मचारी लवकुश मिश्रा के रुदौली स्थित आवास से ₹10 लाख से ₹12 लाख बरामद किए। इसके अलावा काउंटिंग टीम से जुड़े मनीष यादव के ठिकानों से ₹36 लाख नकद बरामद होने की बात सामने आई है।
रडार पर मुख्य चेहरे
मंदिर के सुरक्षा और जनशक्ति प्रबंधन से जुड़े राम शंकर यादव (टिन्नू यादव), उनके करीबियों और लगभग 50 से अधिक कैश काउंटिंग व बैंक कर्मचारियों से गहन पूछताछ चल रही है। SIT ने राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े महत्वपूर्ण पदाधिकारी अनिल मिश्रा से भी कई घंटों तक कड़े सवाल-जवाब किए हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस बड़े स्तर के घोटाले की भनक अंदरूनी तौर पर किसे थी।
अनुकल्प मिश्रा: मुख्य संदिग्ध
जाँच के दौरान अनुकल्प मिश्रा का नाम सबसे आगे आया है। वह एक ट्रस्टी की सिफारिश पर मंदिर में शामिल हुए थे और उन्हें दान राशियों की गणना का काम मिला। सूत्रों के अनुसार, अनुकल्प ने दानराशि में हेराफेरी करने के लिए अपने परिचितों का एक नेटवर्क स्थापित किया था। यह भी खुलासा हुआ है कि अनुकल्प ने अपने बहनोई को भी इस कार्य में शामिल किया।
कैसे किया जाता था कैश का खेल?
जिन श्रद्धालुओं ने दान दिया, उनकी नकदी को पहले यात्री सुविधा केंद्र के बाथरूम में छिपाया जाता था। इसके बाद मौके का फायदा उठाकर इसे बाहर निकाला जाता था। जांच एजेंसियों को पता चला है कि कौशलपुरी में एक ठिकाने पर पैसे का वितरण होता था। इस तरह का खेल कितने समय से चल रहा था, एसआईटी इसे भी खंगालने में जुटी है।
कर्मचारियों की नियुक्तियों की जांच
इस मामले में एक और अहम बिंदु है कि कर्मचारियों की नियुक्ति किसके निर्देश पर की जाती थी। सूत्रों के अनुसार, दान राशि की गणना पर काम करने वाले कर्मचारियों की तैनाती ट्रस्टी डॉ. अनिल कुमार मिश्र की अनुशंसा पर की गई थी। यह पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है, लेकिन जांच एजेंसियों द्वारा इन सभी तथ्यों का मूल्यांकन किया जा रहा है।
जिम्मेदार लोगों की भूमिका पर सवाल
SIT ने हाल के दिनों में कई कर्मचारियों और अधिकारियों से पूछताछ की है। पूछताछ के दौरान यह सवाल भी उठाया गया कि गणना कर्मियों की सुरक्षा जांच क्यों नहीं होती थी। अब रिटायर्ड बैंककर्मी सुभाष श्रीवास्तव के नाम भी इस जांच में शामिल हो गए हैं, जिन पर दान राशि की गणना के बाद उसे बैंक में जमा कराने की जिम्मेदारी थी।
गायब हुई रकम: अनसुलझा सवाल
राम मंदिर में दान राशि से जुड़ी अनियमितताओं ने न केवल श्रद्धालुओं को चिंतित किया है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी सवाल उठाए हैं। जांच के दौरान इस बात की तलाश की जा रही है कि आखिर गायब हुई धनराशि कितनी थी। एसआईटी का कहना है कि जब तक सभी कड़ियाँ जुड़ नहीं जातीं, वास्तविक नुकसान का आंकलन करना मुश्किल है।
सरकार की पैनी नजर के बावजूद राम मंदिर में कैसे हुआ इतना बड़ा घोटाला?
राम मंदिर जैसे अत्यंत सुरक्षित और हाई-प्रोफाइल परिसर में सरकार और सुरक्षा बलों की कड़ी निगरानी के बावजूद इतना बड़ा घोटाला होने के पीछे सिस्टम की खामियां, तकनीकी छेड़छाड़ और अंदरूनी साठगांठ का एक बड़ा नेटवर्क सामने आया है। SIT की शुरुआती जांच और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस घोटाले को अंजाम देने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की कमजोर कड़ियों (Loopholes) का इस्तेमाल किया गया।
अंदरूनी साठगांठ
यह बाहरी चोरों द्वारा नहीं, बल्कि मंदिर के भीतर कैश काउंटिंग (चढ़ावे की गिनती) और सुरक्षा प्रबंधन से जुड़े अधिकृत कर्मचारियों द्वारा किया गया। भरोसेमंद कर्मचारियों के शामिल होने के कारण किसी को शुरुआती संदेह नहीं हुआ। आरोपियों ने चालाकी से पिछले 7 से 8 महीनों की सीसीटीवी (CCTV) फुटेज के साथ छेड़छाड़ की और डेटा डिलीट कर दिया। इसके चलते निगरानी टीम लाइव कैमरों में सब कुछ ठीक देखती रही, लेकिन गड़बड़ी का कोई डिजिटल रिकॉर्ड या बैकअप उपलब्ध नहीं रहा।
सुरक्षा जांच में ढील
मंदिर की सुरक्षा में करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे थे, लेकिन काउंटिंग रूम से बाहर आने वाले आंतरिक कर्मचारियों की गहन शारीरिक तलाशी (फ्रिस्किंग) नहीं ली जाती थी। इसी ढिलाई का फायदा उठाकर नकद राशि और आभूषण धीरे-धीरे बाहर भेजे गए। डिजिटल ट्रैकिंग के बजाय चढ़ावे की गिनती काफी हद तक मैन्युअल होती थी। कर्मचारी वास्तविक दान राशि की तुलना में वाउचर पर बहुत कम रकम दर्ज करते थे। उदाहरण के लिए, यदि दानपात्र से ₹10 लाख निकले, तो रिकॉर्ड में केवल ₹2 लाख ही दर्ज किए जाते थे।
सुरक्षा बलों का फोकस केवल सुरक्षा पर
अयोध्या में सुरक्षा एजेंसियों (जैसे यूपी पुलिस, STF और CRPF) का पूरा ध्यान मुख्य रूप से आतंकवादी खतरों, कानून व्यवस्था और VIP मूवमेंट को संभालने पर केंद्रित था। काउंटिंग रूम के भीतर कौन सा कर्मचारी क्या लिख रहा है या नोटों की गड्डियों में क्या हेरफेर हो रही है, यह जांचना सुरक्षा बलों के मुख्य सुरक्षा प्रोटोकॉल (SOP) का हिस्सा नहीं था।
आंतरिक कर्मचारियों पर ‘अंधविश्वास’
मंदिर में तैनात अधिकांश कर्मचारी और काउंटिंग टीम के सदस्य ट्रस्ट के पदाधिकारियों या स्थानीय धार्मिक समूहों के अत्यधिक करीबी और भरोसेमंद थे। इस अत्यधिक भरोसे के कारण आंतरिक कर्मचारियों की बाहर आते-जाते समय सख्त शारीरिक तलाशी (Frisking) नहीं ली जाती थी, जिसका फायदा उठाकर वे आसानी से नकद और कीमती सामान बाहर ले जाते रहे।
कड़े स्वतंत्र ऑडिट का अभाव
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा आंतरिक रूप से तो ऑडिट किए जा रहे थे, लेकिन किसी बाहरी सरकारी एजेंसी या कैग (CAG) द्वारा दैनिक वित्तीय मिलान और सख्त ऑडिट की व्यवस्था नहीं थी, जिससे यह गड़बड़ी महीनों तक पकड़ में नहीं आई।
व्यवस्था सुधारने के लिए उठाए जा रहे कदम
इस महाघोटाले के उजागर होने के बाद अब सरकार और निर्माण समिति मंदिर प्रबंधन को पूरी तरह बदलने की तैयारी कर रही हैं। मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र के सुझाव पर, काशी विश्वनाथ मंदिर की तर्ज पर अब राम मंदिर में भी एक सीनियर IAS अधिकारी को मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त करने पर मंथन चल रहा है, ताकि प्रशासनिक नियंत्रण पूरी तरह पारदर्शी हो।
तिरुपति मंदिर का मॉडल
राम मंदिर के चढ़ावे और भीड़ प्रबंधन के लिए देश के सबसे व्यवस्थित तिरुपति बालाजी मंदिर का मैनेजमेंट मॉडल अपनाने की तैयारी की जा रही है। भविष्य में मैन्युअल काउंटिंग को पूरी तरह बंद कर, हर एक रुपये और आभूषण की डिजिटल रिकॉर्डिंग और लाइव क्लाउड बैकअप वाली सीसीटीवी निगरानी रखने की योजना है। इस मामले पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद सीधे नजर बनाए हुए हैं और SIT को आरोपियों के खिलाफ बेहद सख्त कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
पूरे मामले की जांच की दिशा
जांच एजेंसियाँ अब उन सबूतों को इकट्ठा कर रही हैं, जो इस धन की हेराफेरी की कथानक को सामने ला सके। जांच का यह चरण अब उन लोगों की पहचान पर केंद्रित है, जिन्होंने इस मामले में भूमिका निभाई। राम मंदिर जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल पर इस तरह की घटनाएँ गंभीर चिंता का विषय हैं।
उच्चस्तरीय जांच की मांग
उत्तर प्रदेश सरकार की 3-सदस्यीय SIT (जिसमें लखनऊ के कमिश्नर विजय विश्वास पंत, आईजी किरण एस. और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन शामिल हैं) को जल्द से जल्द अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। वहीं दूसरी ओर, इस मामले को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट (लखनऊ बेंच) और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें पूरे मामले की CBI जांच और CAG (कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) से ऑडिट कराने की मांग की गई है।
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