हिमालय में 8 मैग्नीट्यूड का भूकंप आने का खतरा? वैज्ञानिकों ने किया अलर्ट

The CSR Journal Magazine

तिब्बत में भूकंप के बाद आफ्टरशॉक्स का सिलसिला

हाल ही में तिब्बत में 7 मैग्नीट्यूड का शक्तिशाली भूकंप आया, जिसके बाद 17-18 आफ्टरशॉक दर्ज किए गए हैं। यह भूकंप इतना शक्तिशाली था कि इससे कई लोगों की जान गई और कई इमारतें भी क्षतिग्रस्त हुईं। इसके अलावा, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भी 4.0 से ज्यादा तीव्रता के भूकंप आए हैं। भारत के उत्तराखंड में भी सितंबर के आखिरी हफ्ते और अक्टूबर की शुरुआत में कई भूकंप महसूस किए गए। इस स्थिति ने वैज्ञानिकों के बीच सवाल उठाए हैं कि क्या तिब्बत और उत्तराखंड में आए भूकंपों का आपस में कोई संबंध है।

भूकंपों का संबंध और खतरा

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. नरेश कुमार ने बताया कि भारत और एशिया की टेक्टोनिक प्लेटों के बीच लगातार टकराव होता है। इससे जमीन के नीचे दबाव बनता है और ऊर्जा जमा होती है। यह ऊर्जा कई दशकों तक जमा हो सकती है। जब यह ऊर्जा बाहर निकलती है, तो भूकंप आता है। उन्होंने बताया कि तिब्बत में आए भूकंप के बाद 17-18 आफ्टरशॉक दर्ज किए गए हैं, जो उसी इलाके में आए हैं जहां मुख्य भूकंप का केंद्र था।

आफ्टरशॉक का कारण

डॉ. कुमार ने बताया कि जब बड़ा भूकंप आता है, तो उसके बाद जमीन के नीचे चट्टानों में बदलाव होते हैं। इसी कारण छोटे-छोटे भूकंप आते हैं, जिन्हें आफ्टरशॉक कहा जाता है। तिब्बत में आए भूकंप के दौरान जमीन के नीचे करीब 60-70 किलोमीटर लंबे और 20-25 किलोमीटर चौड़े इलाके में रूप्चर हुआ। यह भूकंप लगभग 18 किलोमीटर की गहराई पर आया था।

हिमालय में भूकंपों का कारण

डॉ. नरेश कुमार ने बताया कि हिमालय में मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT), मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) और हिमालयन फ्रंटल थ्रस्ट (HFT) जैसी बड़ी फॉल्ट लाइनें मौजूद हैं। ये भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच होने वाली हलचल से जुड़ी हैं। इस कारण हिमालय के कई इलाकों में भूकंप आते रहते हैं। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में भी भूकंपीय गतिविधियों का संबंध तिब्बत से है।

उत्तराखंड और तिब्बत का कनेक्शन

डॉ. कुमार के अनुसार, उत्तराखंड में हर महीने कम तीव्रता के दो-तीन भूकंप आते हैं। हाल ही में चमोली के पास भूकंप आया था, जिसके बाद बड़कोट के पास 4.2 मैग्नीट्यूड का भूकंप दर्ज किया गया। थराली, चमोली और बड़कोट जैसे इलाके भूकंप के लिहाज से संवेदनशील माने जाते हैं। GPS डेटा की मदद से वैज्ञानिक यह पता लगाते हैं कि जमीन में लंबे समय के दौरान किस तरह बदलाव हो रहे हैं।

क्या हिमालय में 8 मैग्नीट्यूड का भूकंप आ सकता है?

डॉ. नरेश कुमार ने बताया कि पिछले 200 सालों में हिमालयी क्षेत्र में कई बड़े भूकंप आए हैं, जिनमें चमोली और उत्तरकाशी के भूकंप शामिल हैं। उन्होंने कहा कि हिमालय के नीचे 15-20 किलोमीटर की गहराई पर ऐसा क्षेत्र है, जहां दबाव और ऊर्जा जमा होती है। यदि चमोली या उत्तरकाशी में 8 या उससे ज्यादा मैग्नीट्यूड का भूकंप आता है, तो इसका असर बड़े इलाके में हो सकता है।

भविष्य की संभावनाएं

डॉ. कुमार ने 2015 में नेपाल में आए भूकंप का उदाहरण दिया, जिसमें जमीन के नीचे करीब 140 किलोमीटर लंबे और 50-60 किलोमीटर चौड़े इलाके में रूप्चर हुआ था। बड़े भूकंप में जमीन के नीचे टूटने और खिसकने वाला क्षेत्र ज्यादा बड़ा हो सकता है, जिससे उसका असर भी बड़े इलाके में हो सकता है। वैज्ञानिक हिमालय और तिब्बत में भूकंपों का अध्ययन कर रहे हैं।

भूकंप की प्राकृतिक प्रक्रिया

डॉ. कुमार ने कहा कि भूकंप एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल से जमीन के नीचे दबाव और ऊर्जा जमा होती है। जब यह ऊर्जा बाहर निकलती है, तो भूकंप आता है। हिमालय में लगातार भूकंप आना बताता है कि यह इलाका भूकंपीय रूप से सक्रिय है। भविष्य में भी भूकंप आने की संभावना बनी रहेगी। हालांकि, किसी भूकंप के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि अगला बड़ा भूकंप कब और कहां आएगा।

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