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CSR: जातियों की जंग

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Bharat Bandh
 
भारत बंद है, देश बंद है, बंद है कई प्रदेश, बंद है दुकानें, बंद है मकान, बंद है देश की आर्थिक व्यवस्था, आराजकता है, खौफ है, नफरत है, आग है, आगजनी है, हर तरफ जातियों की राजनीति ही ठनी है। जंग है एक समाज का दूसरे समाज से, एक सभ्यता का दूसरी सभ्यता से, ये क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, जो भी हो रहा है सब घातक है, सब राजनीति है, सब अपने अपने भले की लिए देश की भलाई को ताक पर रख रहे है। इंडिया फर्स्ट की संकल्पना को सबसे आखिरी में रखते हुए, हमारी भलाई कैसे हो, हमारी राजनीति कैसे चमके, इसी जद्दोजहद में हर पार्टी, हर नेता पड़ा हुआ है. देश बट रहा है, पहले जातिगत राजनीति पर समाज बटा, अब अगड़ा पिछड़ा हो रहा है। पिछड़े ने आरक्षण की मांग की तो भला अगड़ा कैसे पिछड़ा रहे। हर जाति के लोग, हर धर्म के लोग, हर कोई उठकर आ रहा है और आरक्षण को बपौती समझकर मांग कर रहा है। सरकार भी मजबूर है, पिछड़े की सुने तो अगड़ा नाराज़, अगड़े की माने तो पिछड़ा नाराज़, लिहाजा देश में सरकार इसी राजनीति में उलझी हुई है। जहाँ भारत 72 साल की आज़ादी में वैश्विक स्तर पर अपना परचम लहराने का माद्दा रखता है वही हम जातियों की जंग में उलझे है।
आखिरकार हम क्या हासिल करना चाह रहे है, ये नफरत की राजनीति क्यों बार बार समाज में जहर घोलने का काम कर रही है, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ केंद्र की मोदी सरकार द्वारा एससी/एसटी एक्ट में किए गए संशोधन के विरोध को लेकर कुछ सवर्ण संगठनों द्वारा 6 सितंबर को ‘भारत बंद’ बुलाया है, बंद का सबसे ज्‍यादा असर मध्‍य प्रदेश, उत्‍तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार में देखने को मिल रहा है, कई जगह ट्रेनों को रोका गया है और कई जगह प्रदर्शनकारी सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं, मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जहां स्कूलों-कॉलेजों को बंद रखने के आदेश दिये गये हैं, वहीं, मध्यप्रदेश के 10 जिलों में एहतियात के तौर पर धारा 144 लगा दी गई है। कई शहरों में आगजनी हुई तो कही शहरों में हिंसक आंदोलन। हम आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मार्च में एक आदेश दिया, इसमें कहा गया कि अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के किसी भी सदस्य पर अत्याचार करने के आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी, इसके लिए मंजूरी जरूरी होगी, साथ ही अग्रिम जमानत का प्रावधान भी किया गया था, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये सुरक्षा उपाय इसलिए किए जा रहे हैं ताकि इस कानून का दुरुपयोग रोका जा सके, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले का तीखा विरोध शुरू हो गया, देशभर के दलित संगठनों ने इसके विरोध में आवाज़ उठाई और भारत बंद का एलान किया, दो अप्रैल को बुलाए गए भारत बंद के दौरान कई राज्यों में हिंसा हुई जिनमें 9 लोग मारे गए, अकेले मध्य प्रदेश में छह लोगों की मौत हुई थी।
इससे पहले सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर कर चुकी थी, मॉनसून सत्र में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए बिल लाने का फैसला किया जिसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया, लेकिन अब कई राज्यों में सवर्ण तबका नाराज हो गया है, उन्हें लगता है किसुप्रीम कोर्ट ने कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए जो दिशा-निर्देश दिए थे, उन्हें बदलने की जरूरत नहीं थी। अब यही कारण है कि दोनों ही जातियों के बीच टकराव बनी है। कहने के लिए तो भारत बंद है लेकिन भारत बंद का सबसे ज्यादा असर सिर्फ उन राज्यों में ही क्यों है जहाँ चुनाव दहलीज पर है, आखिरकार इसके क्या मायने है, साफ़ है सब राजनीति का खेल है, लेकिन ये खेल उतना ही पुराना है जितनी पुरानी हमारी डेमोक्रेसी है, बहरहाल मोदी सरकार के लिए अगड़े पिछड़े की राजनीति गले की हड्डी बनी है जिसे ना निगला जा रहा है और ना उगला।