राजनीति का गरमाहट: बाबा साहेब की 135वीं जयंती
Baba Saheb Ambedkar Jayanti Special: बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती पर उत्तर प्रदेश की सियासत ने एक बार फिर से नया मोड़ लिया है। बहुजन समाज पार्टी (BSP), समाजवादी पार्टी (SP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) तीनों दल दलित वोट बैंक को साधने के लिए बड़ी तैयारियों में जुट गए हैं। इसे 2027 के विधानसभा चुनाव का अनौपचारिक आगाज़ माना जा रहा है, क्योंकि बाबा साहेब की विरासत अब सभी के लिए राजनीतिक मजबूरी बन गई है। दलित मतदाताओं को लुभाने में हर पार्टी अपनी रणनीति पर काम कर रही है।
बसपा का शक्ति प्रदर्शन
बसपा ने लखनऊ में डॉ. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल अंबेडकर पार्क में एक विशाल कार्यक्रम की योजना बनाई है। मायावती के नेतृत्व में लाखों कार्यकर्ताओं का जुटान हो रहा है। पार्टी इसे 2027 के चुनावों के लिए एक बड़ा कदम मानती है। इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए आकाश आनंद समेत अन्य नेता गहन बैठकों में जुटे हैं, जिससे बसपा की पारंपरिक जड़ों को पुनः मजबूत किया जा सके।
Baba Saheb Ambedkar Jayanti Special: सपा की बदली रणनीति
अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने इस बार अंबेडकर जयंती को गांव-गांव और सेक्टर स्तर पर मनाने का निर्णय लिया है। लखनऊ में पार्टी के ऑफिस के चारों ओर हजारों पोस्टर लगाए गए हैं। SP का फोकस PDA (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर है। इस बार संविधान की सुरक्षा और सामाजिक न्याय को बूथ स्तर तक पहुंचाने की योजना बनी है। SP, बसपा पर निशाना साधते हुए दलित वोटों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।
BJP का सामाजिक समरसता अभियान
सत्ताधारी बीजेपी ने इस जयंती को सरकारी कार्यक्रम का रूप दे दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने डॉ. बीआर अंबेडकर मूर्ति विकास योजना के तहत 403 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। हर विधानसभा क्षेत्र में 10-10 मूर्तियों का सौंदर्यीकरण किया जाएगा। 14 अप्रैल को सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में ‘युवा संवाद संगम’ का आयोजन किया जाएगा, जहां मंत्री और विधायक अंबेडकर के विचारों पर चर्चा करेंगे। BJP का मकसद दलित बस्तियों में पहुँच बनाना और एक भारत, संयुक्त भारत की थीम पर काम करना है।
राजनीतिक गणित: 21 प्रतिशत का महत्व
उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति (SC) मतदाता करीब 21 प्रतिशत हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में इन अधिकारियों का बिखराव बीजेपी के लिए महंगा साबित हुआ था। अब 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले, हर पार्टी इस वोट बैंक को अपnanek liye अंबेडकर जयंती का सहारा ले रही है। BSP के लिए यह विचारधारा और वोट पाने का मुद्दा है, जबकि SP के लिए PDA को मजबूत करने का अवसर है। BJP के लिए सभी के साथ विकास का संदेश देकर दलितों को भी जोड़ना है।
बाबा साहेब की विरासत: सभी के लिए राजनीतिक मजबूरी
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बाबा साहेब की विरासत, संविधान और सामाजिक न्याय अब किसी एक पार्टी की नहीं रह गई है। यह सब के लिए एक राजनीतिक मजबूरी बन गई है। दलित मतदाता अब केवल वादों पर नहीं, बल्कि प्रदर्शन और सम्मान पर वोट डालते हैं। इस अवसर पर हर पार्टी के लिए बाबा साहेब अब कोई एकाधिकार नहीं रहे।
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