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विश्व हिंदी दिवस – गंगा की तरह है हिंदी की अविरल यात्रा

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हिंदी – सपनों की भाषा, अपनों की भाषा  
 
भारत अपनी परंपराओं के लिए जाना जाता है, अपनी विविधता में एकता के लिए जाना जाता है। अपने लोकतंत्र के लिए विश्वभर में प्रसिद्द है। यहां कई धर्म है, कई बोली है। वैसे तो भारत में बंगाली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, उड़िया, गुजराती, मराठी और पंजाबी जैसी कई भाषाएं बोली जाती हैं। लेकिन देश में अधिकतर लोग बोलचाल में हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं। 2011 की जनसंख्या के आंकड़ों को मानें तो 26 फीसदी भारतीय हिंदी को मातृभाषा के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। भारत में बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी का स्थान सबसे ऊपर है। बावजूद इसके संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है लेकिन राष्ट्र भाषा नहीं बन पाया। यहां तक कि तमिलनाडु और दक्षिण भारत के कई राज्यों में हिंदी का विरोध भी है। तमिलनाडु में हिंदी के विरोध में आंदोलन भी होता रहता है। हिन्दी के सामने एक नहीं कई तरह चुनौतियां हैं। आईये आज हम विश्व हिंदी दिवस के ख़ास मौके पर हिंदी के संपूर्ण विकास और इससे जुड़ी रोचक बातों को जानते हैं।

1000 साल पुरानी भाषा है हिंदी

आपको जानकार हैरानी होगी कि हिंदी को 1000 साल पुरानी भाषा माना जाता है, जो संस्कृत से निकली थी। हिंदी का बोलबाला सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में है। भारत के अलावा बात की जाए तो मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, टोबैगो और नेपाल ऐसे देश हैं जहां हिंदी बोली जाती है। 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं। जबकि 42.50 करोड़ लोग इसकी 50 से अधिक बोलियों में से एक को इस्तेमाल करते हैं। हिंदी दिवस को एक खास मकसद से मनाना शुरू किया गया था। दरअसल अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद भी भारत में अंग्रेजी की अहमियत दिन व दिन बढ़ती जा रही थी। ऐसे में युवाओं को हिंदी के महत्व को समझाने के लिए इसे मनाना शुरू किया गया।

कैसे हुआ हिंदी का विकास, कैसी है हिंदी की यात्रा

हिंदी दिवस के विशेष अवसर पर ये बताना जरुरी है कि इस भाषा का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है। संस्कृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा है, जिसे आर्य या देव भाषा भी कहा जाता है। हिंदी को इसी आर्य भाषा यानी संस्कृत का उत्तराधिकारी माना जाता है। गौर करने वाली बात ये है कि संस्कृत से निकली हिंदी फारसी भाषा का शब्द है, जिसका मतलब है हिंद से संबंधित, हिंदी शब्द सिन्धु से आया था, क्योंकि ईरानी भाषा में ‘स’ को ‘ह’ बोला जाता है। इस तरह सिन्धु शब्द से हिंद, और हिंद से हिन्दी बना। भारत में आर्य भाषाएं अलग-अलग काल में विभिन्न रूपों में बोली गईं। जैसे संस्कृत के बाद पालि, फिर प्राकृत और इसके बाद अपभ्रंश और इसके बाद हिन्दी भाषा बोली जानी शुरू हुई। हिंदी का जन्म 1000 ई. पूर्व माना जाता है। जिसे आधुनिक भारतीय आर्यभाषा भी माना जाता है।

संस्कृत निष्ठ भाषा से Hinglish में बदल गयी है हमारी हिंदी

हिंदी के विकास को भी तीन चरणों में माना जाता है। जैसे वर्तमान में पुरानी हिंदी से ही इसकी शुरुआत मानी जाती है। हालांकि अलग-अलग कालों में इसे अलग-अलग तरह से बोला गया है। जैसे 1100 से 1350 ई. तक प्राचीन हिंदी का उपयोग किया गया। वहीं 1350 से 1850 ई. तक मध्यकालीन हिंदी का उपयोग किया गया और 1850 से अब तक आधुनिक हिंदी का उपयोग किया जा रहा है। 10वीं से 15वीं सदी तक के समय को हिंदी का आदिकाल कहा जाता है। इस काल में धीरे-धीरे ये अपभ्रंश के प्रभाव से मुक्त हुई और स्वतंत्र रूप से बोली जाने वाली भाषा बनी। जिसके बाद 15वीं सदी आने तक हिंदी में साहित्य भी लिखा जाने लगा। 15वीं से 19वीं सदी तक का समय हिन्दी भाषा का मध्यकाल कहा जाता है। इस दौर में मुगलों के कारण फारसी, तुर्की, अरबी, पुर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी,अंग्रेजी आदि भाषाओं के शब्द हिन्दी में शामिल होने लगे थे, क्योंकि पश्चिमी एशिया और यूरोप से व्यापार के कारण बाहरी लोगों से भारत के लोगों का ज्यादा संपर्क होने लगा था।

विश्व हिंदी दिवस पर जानें ये रोचक तथ्य

मध्यकाल में सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, मलिक मोहम्मद जायसी आदि भक्ति आंदोलन के कवियों ने हिंदी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। इस दौरान उत्तर भारत में ब्रज और अवधी ही बोली गई। इसके साथ ही बघेली, भोजपुरी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली, हरिवाणी, कन्नौजी, कुमायूंनी, मागई, मारवाड़ी जैसी बोलियां भी हिंदी से निकली मानी गईं। 1860 के बाद हिंदी को आम भाषा के रूप में बोलचाल में उपयोग किया जाने लगा था। इसके बाद अंग्रेजों का भी हिन्दी को व्यापक भाषा बनाने में बड़ा योगदान रहा। ईसाई पादरियों ने अपने धर्म का प्रचार करने के लिए हिंदी का उपयोग किया। इसके इतर जब भी अंग्रेजों के खिलाफ बंगाल, महाराष्ट्र जैसे राज्यों के लोगों को आपस में बातचीत करने की जरूरत महसूस हुई तो उस बातचीत का माध्यम हिंदी ही बनी। 20वीं सदी में मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथलीशरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत जैसे महान रचनाकारों ने भी हिंदी का विस्तार किया। अब हिंदी और अंगेजी का इतना मिश्रण हो गया है कि अब लोग हिंग्लिश बोलने लगे है।

सरकार भी हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए कर रही है प्रयास, इसलिए मनाया जाता है विशेष दिवस

सरकार भी हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए समय-समय पर नए प्रयास कर रही है। शिक्षा के क्षेत्र में भी हिंदी को वरीयता दी जा रही है। साथ ही सरकारी कामकाजों में भी हिंदी का उपयोग बढ़ रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार हिंदी को हमारे देश की राजभाषा माना गया है। वहीं अगर आप राजभाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर को समझना चाहते हैं तो बात दें, सरकार का शासकीय काम जिस भाषा में किया जाता है वो राजभाषा मानी जाती है। वहीं देश की अधिकतर आबादी जिस भाषा का उपयोग करती है उसे राष्ट्रभाषा कहते हैं। लेकिन फिलहाल आधिकारिक तौर पर हिंदी को राष्ट्र भाषा नहीं बनाया गया है। भले ही विश्व में सबसे ज्यादा बोलने वाली भाषा Hindi हो लेकिन किसी भी बड़े स्तर पर हमेशा से अंग्रेजी के उपयोग को ही प्राथमिकता दी जाती रही है। यही वजह है कि हमें Hindi को आगे बढ़ाने के लिए साल में एक बार हिंदी दिवस (World Hindi Day) मनाने की जरूरत पड़ती है।
आईपीएस मनोज शर्मा

सफलता अंग्रेजी की मोहताज नहीं, हिंदी ने भी लहराया है परचम

हिंदी दिवस पर अंग्रेजी भाषा का गुमान करनेवालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी और अंग्रेजी दोनों में महज भाषा मात्र का फर्क होता है। हिंदी मीडियम (Hindi Medium) के युवाओं की परवरिश कुछ ऐसी हुई होती है कि उन्हें हमेशा ऐसा लगता रहता है कि अंग्रेजी मीडियम में पढ़ने वाले लोग बेहतर होते हैं। लेकिन सच्चाई इससे परे है। सफलता अंग्रेजी की मोहताज नहीं होती है, हिंदी मीडियम से पढ़े लोगों ने भी अपना परचम लहराया है। सबसे ताज़ा उदाहरण है आईपीएस मनोज शर्मा। महाराष्ट्र कैडर से आईपीएस मनोज शर्मा (IPS Manoj Sharma) की कहानी इस देश के हर युवा के लिए मिसाल है। बारहवीं फेल मनोज शर्मा (12th Fail Manoj Sharma) की जिंदगी से हर युवा को सीखने की जरूरत है। मनोज शर्मा ने The CSR Journal से बातचीत करते हुए बताया कि गांव में शुरुआती पढ़ाई लिखाई हिंदी मीडियम से थी। जिसकी वजह से अंग्रेजी बहुत कमजोर थी। Hindi Medium से पढ़ने वाले मनोज शर्मा यूपीएससी के इंटरव्यू के दौरान उनसे पूछा गया कि आपको अंग्रेजी नहीं आती तो फिर शासन कैसे चलाएंगे। मनोज को इंटरव्यू के दौरान एक ट्रांसलेटर भी दिया गया। मनोज ने बताया कि शुरुआत में मेरी अंग्रेजी काफी कमजोर थी। लेकिन आज वह महाराष्ट्र के सफल और तेज़तर्रार आईपीएस अधिकारियों में से एक है और उनको भी हिंदी भाषा पर गर्व है।
दरअसल हिंदी भले ही भारत के सबसे ज्यादा राज्यों में बोली जाती हो लेकिन इसको अभी तक अभिजात्य वर्ग की भाषा का दर्जा नहीं मिला है। इस मामले में अंग्रेजी किसी भारतीय भाषाओं से भी ऊपर है। वहीं हिंदी भी दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपने में समाहित करने में पीछे नहीं है। हिंदी अब संस्कृत निष्ठ भाषा से Hinglish में बदल रही है। गंगा की तरह ही हमारी हिंदी भी तमाम तरह की चुनौतियों, विरोधाभाषों को सहेजते हुए सदियों से अविरल है। इसलिए हम कहते है –

जय हिंद, जय हिंदी।