संयुक्त राष्ट्र की कई संस्थाओं समेत 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका ने नाता तोड़ा, व्हाइट हाउस ने कहा-यह अमेरिका के हित में नहीं! व्हाइट हाउस ने फैसले को “अमेरिकी हितों के खिलाफ और करदाताओं के पैसे की बर्बादी” बताया, संयुक्त राष्ट्र की कई अहम संस्थाएं भी सूची में शामिल!
डोनाल्ड ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन से जुड़े दर्जनों अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को किया अलग
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन से जुड़े कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को अलग करने का फैसला किया है। इस फैसले के तहत अमेरिका 66 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बाहर हो गया है। इनमें से करीब आधी संस्थाएं संयुक्त राष्ट्र (UN) से जुड़ी हैं। सबसे अहम नाम संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) का है, जो दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने की नींव माना जाता है। व्हाइट हाउस ने कहा है कि ये संस्थाएं अब “अमेरिकी हितों के लिए काम नहीं कर रहीं” और यहां खर्च किया जा रहा पैसा अमेरिकी करदाताओं की बर्बादी है।
जलवायु समझौतों को बड़ा झटका
UNFCCC के तहत ही दुनिया के देश मिलकर जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए समझौते करते हैं। इसी मंच से पेरिस जलवायु समझौता भी बना था। अमेरिका के बाहर होने से वैश्विक जलवायु प्रयासों को बड़ा झटका लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे गरीब और विकासशील देशों को मिलने वाली मदद भी प्रभावित हो सकती है।
ट्रंप का पुराना रुख: जलवायु परिवर्तन पर संदेह
राष्ट्रपति ट्रंप पहले भी कई बार मानव-जनित जलवायु परिवर्तन (Man-Made Climate Change) के वैज्ञानिक निष्कर्षों को खारिज करते रहे हैं। वे इसे अतीत में एक बार “Hoax(धोखा)” तक करार दे चुके हैं। अपने पहले कार्यकाल में भी उन्होंने पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका को बाहर निकालने का फैसला किया था और कई बहुपक्षीय संस्थाओं की फंडिंग रोक दी थी। नए फैसले के तहत भी ट्रंप प्रशासन ने साफ कर दिया है कि जिन संगठनों को वह “अनावश्यक” या “अमेरिका के लिए नुकसानदेह” मानता है, उन्हें न तो वित्तीय सहायता दी जाएगी और न ही उनमें अमेरिकी भागीदारी जारी रहेगी।
व्हाइट हाउस की दलील
व्हाइट हाउस के अनुसार, एक समीक्षा के बाद यह फैसला लिया गया। प्रशासन का कहना है कि ये संस्थाएं अमेरिका के खिलाफ नीतियां अपनाती हैं और इन पर पैसा खर्च करना सही नहीं है। प्रशासन का कहना है कि अमेरिका अब उन मंचों पर संसाधन खर्च करेगा, जो सीधे तौर पर उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक हितों और ऊर्जा स्वतंत्रता को मजबूत करें। सरकार का मानना है कि यह धन अब देश के अंदर विकास और सुरक्षा पर खर्च किया जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के इस फैसले से यूरोप, विकासशील देशों और जलवायु समर्थक राष्ट्रोंके साथ उसके संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र और पर्यावरण से जुड़े वैश्विक संगठनों की ओर से आने वाले दिनों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। जलवायु विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि दुनिया के सबसे बड़े ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जकों में शामिल अमेरिका का इस तरह पीछे हटना, वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने के प्रयासों को कमजोर कर सकता है।
ट्रंप के फैसले का वैश्विक असर
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जलवायु परिवर्तन से जुड़े दर्जनों अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलने के फैसले का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका पूरी दुनिया पर गहरा प्रभाव पड़ने वाला है। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और ग्रीनहाउस गैसों के बड़े उत्सर्जकों में शामिल है। ऐसे में उसका वैश्विक जलवायु मंच से पीछे हटना अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को कमजोर कर सकता है। सबसे बड़ा असर संयुक्त राष्ट्र के जलवायु कार्यक्रमों पर पड़ेगा। UNFCCC जैसे मंच पर अमेरिका की गैर-मौजूदगी से जलवायु समझौतों की गति धीमी हो सकती है। कई देशों को आशंका है कि इससे पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्य हासिल करना और मुश्किल हो जाएगा। खासकर विकासशील और गरीब देशों को मिलने वाली तकनीकी और आर्थिक मदद में कमी आ सकती है।
यूरोप समेत अन्य देशों ने जताई चिंता
यूरोप और अन्य विकसित देशों ने पहले ही संकेत दिए हैं कि वे इस फैसले से निराश हैं। उनका मानना है कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है और इससे निपटने के लिए सभी बड़े देशों की भागीदारी जरूरी है। अमेरिका के अलग होने से वैश्विक नेतृत्व में खालीपन पैदा हो सकता है। इस फैसले का असर जलवायु कूटनीति पर भी पड़ेगा। अब कई देशों को अपनी रणनीतियां दोबारा तय करनी पड़ सकती हैं। कुछ देश चीन और यूरोपीय संघ जैसे अन्य बड़े खिलाड़ियों की ओर ज्यादा देखने लगेंगे, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव संभव है।
ट्रंप के फैसले का नुकसान उठाएगी दुनिया
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका जैसे देश उत्सर्जन घटाने की जिम्मेदारी से पीछे हटते हैं, तो इसका सीधा असर धरती के बढ़ते तापमान, मौसम की चरम घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं पर पड़ेगा। इसका नुकसान पूरी मानवता को झेलना पड़ सकता है। कुल मिलाकर, ट्रंप सरकार का यह फैसला वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के खिलाफ साझा लड़ाई को कमजोर करता दिख रहा है और आने वाले वर्षों में इसके दूरगामी परिणाम सामने आ सकते हैं।
दुनिया भर में प्रतिक्रिया
अमेरिका के इस कदम से कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में नाराजगी देखी जा रही है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका जैसे बड़े देश का पीछे हटना जलवायु संकट से लड़ाई को कमजोर कर सकता है। ट्रंप सरकार का यह फैसला साफ दिखाता है कि अमेरिका अब अंतरराष्ट्रीय मंचों की बजाय अपने घरेलू हितों पर ज्यादा ध्यान देना चाहता है। लेकिन इस कदम से जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक सहयोग को बड़ा नुकसान पहुंचने की आशंका है।
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