ग्रीन कार्ड विवाद की जड़, उच्च-कुशल प्रवासियों का भविष्य, लंबित प्रक्रियाएं और USCIS की मनमानी पर उठते सवाल! USCIS की व्यक्तिपरक प्रक्रिया और ‘Kazarian Rule’ ने पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए। इसी असमानता ने ग्रीन कार्ड को न्याय और अधिकारों की बड़ी बहस बना दिया।
अमेरिका में काम कर रहे उच्च-कुशल विदेशी पेशेवरों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और पत्रकारों के लिए एक ऐतिहासिक राहत भरा फैसला सामने आया है। 28 जनवरी 2026 को अमेरिका की एक संघीय अदालत ने EB-1A ग्रीन कार्ड मामलों में वर्षों से लागू USCIS के ‘Kazarian Rule’ को अवैध करार देते हुए खारिज कर दिया। इस फैसले को भारतीय आवेदकों के लिए खास तौर पर बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि पिछले 15 वर्षों में EB-1A श्रेणी के तहत सबसे ज्यादा आवेदन भारत से ही आए हैं।
क्या है EB-1A और Kazarian Rule?
EB-1A (Extraordinary Ability) ग्रीन कार्ड उन विदेशी नागरिकों के लिए होता है जिन्होंने विज्ञान, कला, शिक्षा, व्यापार या खेल के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियां हासिल की हों। कानून के अनुसार, यदि कोई आवेदक तय 10 मानकों में से कम से कम 3 को पूरा करता है, तो वह इस श्रेणी में पात्र माना जाता है। हालांकि, USCIS ने पिछले कई वर्षों से ‘Final Merits Analysis’ नामक एक अतिरिक्त और व्यक्तिपरक (Subjective) जांच प्रक्रिया लागू कर रखी थी, जिसे आम तौर पर Kazarian Rule कहा जाता है। इस दूसरे चरण में, भले ही आवेदक सभी आवश्यक मानदंड पूरे कर दे, फिर भी अधिकारी यह कहकर आवेदन खारिज कर देते थे कि व्यक्ति “वास्तव में असाधारण स्तर” का नहीं है।
अदालत का क्या कहना है?
इस मामले में वरिष्ठ अमेरिकी जिला न्यायाधीश जोसेफ एफ. बटायलियन (Joseph F. Bataillon) ने स्पष्ट कहा कि USCIS ने बिना किसी औपचारिक नियम निर्माण प्रक्रिया (Rulemaking) के कानून में एक नया और अतिरिक्त मानक जोड़ दिया, जो कि Administrative Procedure Act का उल्लंघन है। अदालत ने माना कि यह दूसरा चरण कानून में नहीं लिखा गया था और इसे मनमाने ढंग से लागू किया गया।
पत्रकार अनाहिता मुखर्जी का मामला
यह फैसला पत्रकार अनाहिता मुखर्जी द्वारा दायर मुकदमे से जुड़ा है। अनाहिता की EB-1A याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि वे सभी जरूरी मानदंड पूरे करने के बावजूद “असाधारण क्षमता” की अंतिम कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए USCIS की प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
भारतीयों के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
इमिग्रेशन विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले से हजारों EB-1A आवेदकों, खासकर भारतीयों को बड़ी राहत मिल सकती है। पिछले 10–15 वर्षों में जिन आवेदनों को Final Merits Analysis के नाम पर खारिज किया गया, वे अब दोबारा समीक्षा (Re-Adjudication) या कानूनी चुनौती के योग्य हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि-
• पुराने EB-1A डिनायल मामलों को दोबारा खोलने की मांग बढ़ेगी,
• USCIS को अब सिर्फ तय मानदंडों के आधार पर फैसला लेना होगा,
• अधिकारियों की मनमानी और अत्यधिक व्यक्तिपरक व्याख्या पर रोक लगेगी!
USCIS दे सकता है अदालत में चुनौती
हालांकि यह फैसला एक जिला अदालत का है और USCIS इसे ऊपरी अदालत में चुनौती दे सकता है, लेकिन फिलहाल इसे EB-1A ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में बड़ा मोड़ माना जा रहा है। इमिग्रेशन वकीलों की सलाह है कि जिन आवेदकों के EB-1A आवेदन पहले इस नियम के तहत खारिज हुए हैं, वे अपने केस की कानूनी समीक्षा जरूर कराएं।
प्रवासियों के लिए उम्मीद की किरण
अमेरिकी अदालत का यह फैसला न सिर्फ EB-1A ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने वाला है, बल्कि उन हजारों उच्च-कुशल प्रवासियों के लिए उम्मीद की नई किरण भी है, जो वर्षों से अनिश्चितता और मनमानी नीतियों का सामना कर रहे थे। खासकर भारतीय पेशेवरों के लिए यह निर्णय अमेरिका में स्थायी निवास के रास्ते को कुछ हद तक आसान बना सके।
लगातार ख़ारिज हो रहे आवेदनों से बढ़ा विवाद
ग्रीन कार्ड को लेकर इतना विवाद इसलिए मचा क्योंकि यह सिर्फ़ अमेरिका में स्थायी निवास का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि करियर, स्थिरता और भविष्य की सुरक्षा का प्रतीक है। खासकर भारतीयों जैसे देशों के हाई-स्किल्ड प्रोफेशनल्स के लिए ग्रीन कार्ड का मतलब है- वर्क वीज़ा की अनिश्चितता से मुक्ति, नौकरी बदलने की आज़ादी और परिवार के साथ सुरक्षित जीवन। लेकिन वर्षों से लंबी वेटिंग, देश-आधारित कोटा और सख्त जांच प्रक्रियाओं ने इसे बेहद मुश्किल बना दिया। EB-1A जैसी “टॉप टैलेंट” कैटेगरी में भी जब योग्य उम्मीदवारों को बार-बार खारिज किया जाने लगा, तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक था।
इमीग्रेशन बनाम न्याय-अधिकार
दूसरा बड़ा कारण USCIS की कथित मनमानी और पारदर्शिता की कमी रहा। ‘Kazarian Rule’ या Final Merits Analysis के तहत अधिकारियों को अतिरिक्त और व्यक्तिपरक अधिकार मिल गए थे, जिससे एक ही जैसे प्रोफाइल पर अलग-अलग फैसले आने लगे। कई आवेदकों ने आरोप लगाया कि नियम पूरे करने के बावजूद “आप पर्याप्त असाधारण नहीं हैं” कहकर आवेदन ठुकरा दिए गए। इसी असमानता और अनिश्चितता ने कानूनी चुनौतियों, सोशल मीडिया बहस और राजनीतिक दबाव को जन्म दिया और ग्रीन कार्ड का मुद्दा सिर्फ़ इमिग्रेशन नहीं, बल्कि न्याय और अधिकारों की बहस बन गया।
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