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January 11, 2026

ग्रीनलैंड पर अमेरिका की नज़र: ‘पसंद हो या न हो, हम इसे लेंगे’, ट्रंप की धमकी से NATO- आर्कटिक में बढ़ा तनाव ! 

The CSR Journal Magazine

 

ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्ज़े की खुली चेतावनी दी! ‘आसान या कठिन तरीका’ बयान से यूरोप में चिंता। डेनमार्क ने अमेरिकी कार्रवाई को NATO के लिए खतरा बताया! आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ते तनाव से वैश्विक सुरक्षा पर असर !

ट्रंप की धमकी से यूरोप में हड़कंप, डेनमार्क ने कहा- ग्रीनलैंड पर ज़बरदस्ती NATO को तोड़ देगी

दुनिया की राजनीति में एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस बार मुद्दा है ग्रीनलैंड- दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप! अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुले शब्दों में कहा है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ग्रीनलैंड पर नियंत्रण हासिल करेगा, चाहे डेनमार्क और ग्रीनलैंड को यह पसंद हो या नहीं। ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर बातचीत और सौदे से बात नहीं बनी, तो अमेरिका इसे “कठिन तरीके” से भी ले सकता है। ट्रंप के इस बयान से यूरोप में हड़कंप मच गया है, डेनमार्क ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि अगर अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई की, तो इससे NATO टूट सकता है और आर्कटिक क्षेत्र की शांति खतरे में पड़ जाएगी।

ट्रंप का बयान- ‘आसान या कठिन तरीका’

9 जनवरी 2026 को व्हाइट हाउस में मीडिया से बातचीत के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर बेहद सख्त भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, “हम ग्रीनलैंड को लेकर कुछ न कुछ करेंगे, चाहे उन्हें यह पसंद हो या न हो। अगर हमने ऐसा नहीं किया, तो रूस या चीन ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा कर लेंगे, और हम ऐसा नहीं होने देंगे।”
ट्रंप ने आगे कहा, “मैं सौदा आसान तरीके से करना चाहता हूं। लेकिन अगर आसान तरीके से बात नहीं बनी, तो हम इसे कठिन तरीके से करेंगे।” इन शब्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुले तौर पर धमकी के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि ट्रंप ने यह स्पष्ट नहीं किया कि “कठिन तरीका” क्या होगा, लेकिन जानकारों का  मानना है कि यह सैन्य दबाव या बल प्रयोग की ओर इशारा करता है।

ट्रंप ग्रीनलैंड को इतना अहम क्यों मानते हैं?

ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा, “जब आप किसी चीज़ के मालिक होते हैं, तभी आप उसकी सही तरह से रक्षा कर सकते हैं। लीज़ या समझौते से सुरक्षा नहीं होती।” ट्रंप के अनुसार, ग्रीनलैंड-
• आर्कटिक क्षेत्र में रणनीतिक रूप से स्थित है,
• अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच महत्वपूर्ण स्थान पर है,
• भविष्य में नए समुद्री रास्तों और प्राकृतिक संसाधनों का केंद्र बन सकता है!
उनका दावा है कि अगर अमेरिका पीछे हटा, तो रूस या चीन वहां अपनी सैन्य और आर्थिक मौजूदगी बढ़ा सकते हैं, जो अमेरिका के लिए खतरा होगा।

डेनमार्क का सख्त जवाब- “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं’

ट्रंप के बयान के तुरंत बाद डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेते फ्रेडरिक्सेन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने साफ कहा कि, “ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है। यह कोई संपत्ति नहीं है जिसे खरीदा या छीना जा सके।डेनमार्क ने अमेरिका को चेतावनी दी कि अगर उसने ग्रीनलैंड में सैन्य कार्रवाई की, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। प्रधानमंत्री ने कहा, “अगर NATO का एक सदस्य दूसरे सदस्य के इलाके पर हमला करता है, तो यह पूरे गठबंधन को तोड़ सकता है।” डेनमार्क का कहना है कि ट्रंप की धमकियां अंतरराष्ट्रीय कानून और NATO की भावना के खिलाफ हैं।

NATO को क्यों बताया जा रहा है खतरा?

ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन है और डेनमार्क NATO का सदस्य है। अमेरिका भी NATO का प्रमुख सदस्य है। ऐसे में अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर बल प्रयोग करता है तो यह NATO के भीतर ही टकराव होगा, जिससे गठबंधन की विश्वसनीयता खत्म हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि NATO की पूरी संरचना इस सिद्धांत पर टिकी है कि सदस्य देश एक-दूसरे के खिलाफ बल प्रयोग नहीं करेंगे।

ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार का रुख

ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार ने भी ट्रंप के बयान को सिरे से खारिज कर दिया है। वहां के नेताओं ने कहा कि ग्रीनलैंड किसी की जागीर नहीं है। हमारे भविष्य का फैसला ग्रीनलैंड के लोग करेंगे। ग्रीनलैंड को डेनमार्क से काफी हद तक स्वशासन मिला हुआ है। स्थानीय सरकार का कहना है कि कोई भी देश जबरन कब्ज़ा नहीं कर सकता। किसी भी बदलाव के लिए जनता की सहमति जरूरी है।

ट्रंप का डेनमार्क पर विवादित बयान

ट्रंप ने डेनमार्क के ऐतिहासिक दावे पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “सिर्फ इसलिए कि 500 साल पहले किसी ने वहां जहाज़ उतारा था, इसका मतलब यह नहीं कि जमीन उसकी हो गई।” इस बयान को डेनमार्क में अपमानजनक माना गया है और यूरोपीय नेताओं ने इसकी आलोचना की है।

यूरोप में चिंता और समर्थन

ट्रंप की धमकी के बाद कई यूरोपीय देशों ने डेनमार्क के समर्थन में बयान दिए। कहा गया कि आर्कटिक में  सुरक्षा सहयोग धमकी से नहीं, बातचीत से होना चाहिए। यूरोपीय नेताओं का मानना है कि रूस और चीन से निपटने के लिए NATO को मजबूत करना चाहिए न कि अपने ही सहयोगियों को धमकाना चाहिए।

रूस और चीन का संदर्भ

हालांकि रूस और चीन ने इस मुद्दे पर सीधे बयान नहीं दिए हैं, लेकिन आर्कटिक क्षेत्र में रूस की सैन्य  गतिविधियां बढ़ी हैं। चीन खुद को “नियर-आर्कटिक स्टेट” बताता रहा है। इसी पृष्ठभूमि में ट्रंप ग्रीनलैंड को भविष्य की रणनीतिक कुंजी मानते हैं।

क्या अमेरिका सच में सैन्य कार्रवाई कर सकता है?

अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी इस मुद्दे पर एकमत नहीं है। कुछ नेता कहते हैं कि यह सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति है। ट्रंप की सैन्य कार्रवाई की कोई ठोस योजना नहीं है। लेकिन ट्रंप की भाषा ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अमेरिका वाकई इतना आगे जा सकता है।

ग्रीनलैंड: एक नजर में

ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो आर्कटिक महासागर में स्थित है और प्रशासनिक रूप से डेनमार्क के अधीन आता है, हालांकि उसे व्यापक स्वशासन प्राप्त है। यहां की आबादी बहुत कम है और अधिकांश क्षेत्र बर्फ से ढका रहता है। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण ग्रीनलैंड अमेरिका, यूरोप और रूस के बीच रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के चलते यहां प्राकृतिक संसाधनों और नए समुद्री मार्गों की संभावनाएं बढ़ी हैं, जिससे वैश्विक शक्तियों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है।

बयान से आगे बढ़ता संकट

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का बयान केवल शब्दों का खेल नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय कानून, NATO की एकता और आर्कटिक की शांति, तीनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने साफ कर दिया है कि जमीन सौदे या धमकी से नहीं ली जाती, जबकि ट्रंप इसे अमेरिका की सुरक्षा से जोड़कर देख रहे हैं। अब दुनिया की नजर इस पर टिकी है कि-
• क्या यह विवाद बातचीत से सुलझेगा?
• या आर्कटिक क्षेत्र एक नए तनाव का केंद्र बनेगा?

ग्रीनलैंड विवाद: अमेरिका बनाम यूरोप, शक्ति, सुरक्षा और सहयोग की असली परीक्षा

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वैश्विक राजनीति अब सहयोग से हटकर दबाव और धमकी की ओर बढ़ रही है? ट्रंप का यह कहना कि अमेरिका ग्रीनलैंड को “आसान या कठिन तरीके” से हासिल करेगा, सिर्फ एक द्वीप को लेकर विवाद नहीं है, बल्कि यह अमेरिका और यूरोप के बीच सोच, रणनीति और मूल्यों की टकराहट को उजागर करता है।

अमेरिका की सोच: सुरक्षा पहले, सहयोग बाद में

अमेरिका, खासकर ट्रंप के नेतृत्व में, ग्रीनलैंड को राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से देख रहा है। ट्रंप का तर्क सीधा है- अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण नहीं किया, तो रूस या चीन वहां अपनी मौजूदगी बढ़ा सकते हैं। अमेरिकी दृष्टिकोण के मुख्य बिंदु हैं-
• आर्कटिक क्षेत्र भविष्य की रणनीतिक लड़ाई का मैदान बन सकता है,
• प्राकृतिक संसाधन और नए समुद्री रास्ते अमेरिका के लिए अहम हैं,
• सुरक्षा के लिए “मालिकाना हक़” जरूरी है, सिर्फ समझौते नहीं ! ट्रंप की भाषा यह दिखाती है कि अमेरिका अब कूटनीति से ज़्यादा दबाव की नीति को प्राथमिकता दे रहा है।

यूरोप की सोच: सहयोग, कानून और संतुलन

इसके उलट यूरोप, खासकर डेनमार्क और अन्य NATO देश, इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय कानून और सहयोग के नजरिये से देख रहे हैं। यूरोप का कहना है-
• ग्रीनलैंड कोई ज़मीन का सौदा नहीं है,
• किसी भी देश को बल प्रयोग का अधिकार नहीं है,
• NATO आपसी भरोसे पर टिका है, धमकी पर नहीं!
डेनमार्क की चेतावनी कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई NATO को तोड़ सकती है, यह दिखाती है कि यूरोप इस विवाद को अस्तित्व के संकट के रूप में देख रहा है।

NATO: सुरक्षा कवच या कमजोर कड़ी?

ग्रीनलैंड विवाद ने NATO की एक बड़ी कमजोरी उजागर कर दी है। अगर NATO का सबसे ताकतवर देश ही अपने सहयोगी को धमकाने लगे, तो सवाल उठता है-
• क्या NATO सिर्फ कमजोर देशों के लिए है?
• क्या ताकतवर देश नियमों से ऊपर हैं? यूरोप को डर है कि अगर आज ग्रीनलैंड पर चुप्पी रही, तो कल कोई और देश निशाने पर हो सकता है।

अमेरिका बनाम यूरोप: असली टकराव किस बात पर?

यह टकराव सिर्फ ग्रीनलैंड पर नहीं, बल्कि दुनिया को देखने के नजरिये पर है।
अमेरिका (ट्रंप मॉडल)
यूरोप (सहयोग मॉडल)
शक्ति आधारित नीति
नियम आधारित व्यवस्था
दबाव और सौदे
बातचीत और सहमति
सुरक्षा सर्वोपरि
संतुलन और कानून
‘America First’
सामूहिक हित

क्या यह नेतृत्व है या दबाव की राजनीति?

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का बयान नेतृत्व से ज्यादा दबाव की राजनीति दिखाता है। यह सही है कि आर्कटिक क्षेत्र रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि धमकी से सहयोग नहीं बनता। अगर अमेरिका सच में रूस और चीन के बढ़ते प्रभाव से चिंतित है, तो उसे NATO को मजबूत करना चाहिए, यूरोप को साथ लेकर चलना चाहिए न कि अपने ही सहयोगियों को डराना चाहिए।इतिहास गवाह है कि जब बड़ी ताकतें नियम तोड़ती हैं, तो वही नियम उनके खिलाफ भी इस्तेमाल होते हैं।

यूरोप के लिए सबक

यूरोप के लिए यह घटना एक चेतावनी है कि उसे अपनी सामूहिक सुरक्षा पर फिर से विचार करना होगा। सिर्फ अमेरिकी भरोसे पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। ग्रीनलैंड विवाद ने यूरोप को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वह रणनीतिक रूप से आत्मनिर्भर है?

अमेरिका के लिए सवाल

अमेरिका के सामने भी सवाल खड़े हैं-
• क्या वह अब सहयोगी नहीं, सिर्फ हित देखेगा?
• क्या धमकी उसकी नई कूटनीति बन चुकी है? अगर अमेरिका अपने ही सहयोगियों का भरोसा खोता है, तो वह अकेला पड़ सकता है और यही रूस और चीन चाहते हैं।

ग्रीनलैंड से आगे की लड़ाई

ग्रीनलैंड विवाद सिर्फ एक द्वीप की कहानी नहीं है। यह शक्ति बनाम नियम, दबाव बनाम सहयोग और अमेरिका बनाम यूरोप की कहानी है। अगर इस विवाद को समझदारी से नहीं संभाला गया, तो आर्कटिक क्षेत्र भविष्य का नया तनाव केंद्र बन सकता है। दुनिया के लिए यह वक्त है यह तय करने का कि क्या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था नियमों से चलेगी, या ताकत से?
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