श्रीलंका का ऐतिहासिक फैसला: सांसदों की पेंशन खत्म! राजनीति अब ‘रिटायरमेंट प्लान’ नहीं, सिर्फ जनसेवा का माध्यम!
पड़ोसी देश श्रीलंका ने राजनीति और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को लेकर एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम उठाया है। वहां की संसद ने सांसदों को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन की व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने का कानून पारित कर दिया है। इस फैसले को 154 वोटों के भारी बहुमत से मंजूरी मिली। यह निर्णय श्रीलंका की मौजूदा सरकार के नेतृत्व में लिया गया, जिसका नेतृत्व राष्ट्रपतिअनुरा कुमारा दिसानायके कर रहे हैं। सरकार का साफ संदेश है- राजनीति अब निजी लाभ का साधन नहीं, बल्कि केवल जनसेवा का जरिया होगी।
संसद में गूंजे कड़े शब्द
संसद में इस बिल को पेश करते समय श्रीलंका के न्याय मंत्री हर्शना नानायक्कारा ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जिस तरह से कई सांसद सदन में व्यवहार करते हैं, बहस करते हैं और जनता के मुद्दों को गंभीरता से नहीं लेते, उसे देखकर यह महसूस नहीं होता कि वे आजीवन पेंशन जैसी सुविधा के हकदार हैं। उनके बयान ने पूरे देश में चर्चा छेड़ दी। कई सांसदों ने इस पर विरोध भी जताया, लेकिन बहुमत ने इसे जनता के हित में आवश्यक कदम बताया।
49 साल पुराना कानून खत्म
यह पेंशन व्यवस्था लगभग 49 साल पहले लागू की गई थी। इसके तहत सांसदों को एक निश्चित कार्यकाल पूरा करने के बाद आजीवन पेंशन मिलती थी। सरकार का कहना है कि देश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए अब ऐसी सुविधाओं को जारी रखना उचित नहीं है। श्रीलंका हाल के वर्षों में गंभीर आर्थिक संकट से गुजरा है। महंगाई, बेरोजगारी और विदेशी कर्ज ने देश की अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया था। ऐसे में सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि जनप्रतिनिधि भी आर्थिक अनुशासन का पालन करेंगे।
क्या था पुराना प्रावधान?
पहले की व्यवस्था के अनुसार, सांसदों को अपने कार्यकाल के बाद मासिक पेंशन मिलती थी। यह पेंशन सरकारी खजाने से दी जाती थी। आलोचकों का कहना था कि आम नागरिकों को जहां सामाजिक सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है, वहीं नेताओं को केवल कुछ साल सेवा करने के बाद आजीवन पेंशन मिलना असमानता को बढ़ाता है। नई व्यवस्था के बाद अब कोई भी सांसद रिटायरमेंट के बाद पेंशन का हकदार नहीं होगा।
सरकार का तर्क: सेवा, न कि सुविधा
राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके की सरकार का कहना है कि राजनीति को ‘करियर’ या ‘बिजनेस मॉडल’ की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक जिम्मेदारी है, जो जनता की सेवा के लिए निभाई जाती है। सरकार ने यह भी कहा कि जनप्रतिनिधियों को जनता के बीच रहकर, उन्हीं की तरह जीवन जीना चाहिए, ताकि वे आम समस्याओं को समझ सकें। यह फैसला जनता के बीच सकारात्मक प्रतिक्रिया पा रहा है। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग सरकार के इस कदम की सराहना कर रहे हैं।
आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि
श्रीलंका हाल ही में गंभीर आर्थिक संकट से उभरा है। विदेशी मुद्रा भंडार की कमी, महंगाई और आवश्यक वस्तुओं की कमी ने आम लोगों का जीवन मुश्किल कर दिया था। ऐसे समय में नेताओं की सुविधाओं को कम करना सरकार के लिए नैतिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से जरूरी माना गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम देश की वित्तीय स्थिति को सुधारने की दिशा में एक प्रतीकात्मक लेकिन महत्वपूर्ण प्रयास है।
जनता की प्रतिक्रिया
कोलंबो और अन्य शहरों में आम नागरिकों ने इस फैसले का स्वागत किया। कई लोगों का कहना है कि अगर आम कर्मचारी अपनी नौकरी के बाद पेंशन के लिए वर्षों तक सेवा करते हैं, तो नेताओं को विशेष अधिकार क्यों मिलें? कुछ लोगों ने यह भी कहा कि यह कदम राजनीति में आने वाले लोगों की मंशा को स्पष्ट करेगा। अब जो भी राजनीति में आएगा, वह केवल सेवा की भावना से आए। हालांकि, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पेंशन समाप्त करने से राजनीति में योग्य और पेशेवर लोगों की भागीदारी कम हो सकती है। उनका तर्क है कि सामाजिक सुरक्षा का एक न्यूनतम स्तर होना चाहिए।
अन्य देशों के लिए संदेश
श्रीलंका का यह कदम उन देशों के लिए एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जहां नेताओं को वेतन, भत्तों और पेंशन के रूप में बड़ी रकम मिलती है। कई देशों में सांसदों और विधायकों को यात्रा भत्ता, आवास सुविधा, सुरक्षा और अन्य विशेष अधिकार मिलते हैं। आलोचक अक्सर सवाल उठाते हैं कि क्या ये सुविधाएं जनता के कर के पैसे का सही उपयोग हैं? श्रीलंका ने यह दिखाने की कोशिश की है कि आर्थिक अनुशासन और नैतिक जवाबदेही राजनीति का हिस्सा होनी चाहिए।
भारत में क्या है व्यवस्था?
भारत में सांसदों और विधायकों को वेतन और भत्तों के साथ-साथ पेंशन भी मिलती है। एक कार्यकाल पूरा करने के बाद भी उन्हें पेंशन का अधिकार मिलता है, जो समय-समय पर बढ़ाई जाती रही है। कई बार संसद और विधानसभाओं में इस विषय पर बहस भी हुई है। कुछ नेताओं ने पेंशन खत्म करने या कम करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन अभी तक कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। श्रीलंका के फैसले के बाद भारत सहित अन्य देशों में भी यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ सकता है।
राजनीतिक संस्कृति में बदलाव का संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक बदलाव का संकेत है। राजनीति को अगर केवल शक्ति और सुविधाओं का माध्यम माना जाएगा, तो जनता का विश्वास कमजोर होगा। लेकिन यदि इसे सेवा और जिम्मेदारी के रूप में देखा जाएगा, तो लोकतंत्र मजबूत होगा।
क्या होंगे इसके दूरगामी असर?
1. राजनीतिक पारदर्शिता में वृद्धि – जनता को यह संदेश मिलेगा कि नेता भी त्याग और अनुशासन का पालन कर रहे हैं।
2. राजकोषीय बचत – लंबे समय में सरकारी खर्च में कमी आएगी।
3. जनता का विश्वास मजबूत – नेताओं के प्रति भरोसा बढ़ सकता है।
4. राजनीति की छवि सुधरेगी – इसे व्यवसाय नहीं, सेवा के रूप में देखा जाएगा।
हालांकि, यह भी संभव है कि भविष्य में इस निर्णय की समीक्षा की जाए, यदि इससे अप्रत्याशित समस्याएं उत्पन्न होती हैं। कुछ विपक्षी नेताओं ने इस फैसले को ‘लोकलुभावन’ कदम बताया है। उनका कहना है कि इससे आर्थिक संकट का बड़ा समाधान नहीं होगा। लेकिन सरकार का तर्क है कि यह प्रतीकात्मक कदम है, जो बड़े सुधारों की शुरुआत का संकेत देता है।
लोकतंत्र में जवाबदेही का नया अध्याय
श्रीलंका का यह फैसला लोकतंत्र में जवाबदेही के नए अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। यह संदेश स्पष्ट है कि राजनीति का उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि सामूहिक कल्याण होना चाहिए। अगर अन्य देश भी इस दिशा में कदम उठाते हैं, तो वैश्विक राजनीति में एक नई सोच विकसित हो सकती है।श्रीलंका द्वारा सांसदों की पेंशन समाप्त करना एक साहसिक और ऐतिहासिक निर्णय है। यह फैसला बताता है कि जब देश आर्थिक संकट से गुजर रहा हो, तो नेतृत्व को भी त्याग और अनुशासन दिखाना चाहिए।
लोकतंत्र में जनता के हित में बदलाव ज़रूरी
राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके की सरकार ने 49 साल पुराने कानून को खत्म कर यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीति अब ‘रिटायरमेंट प्लान’ नहीं है।अब सवाल यह उठता है कि क्या अन्य देश, खासकर भारत, भी इस दिशा में कदम उठाएंगे? क्या सांसदों और विधायकों की पेंशन और सुविधाओं की समीक्षा होनी चाहिए? यह बहस अब केवल श्रीलंका तक सीमित नहीं रही, बल्कि वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन चुकी है। लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, और यदि जनता की अपेक्षाएं बदल रही हैं, तो राजनीति को भी बदलना होगा।
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