अप्रैल में वार्षिक परीक्षाओं पर विवाद: शिक्षकों की आपत्ति, सरकार का संतुलित शैक्षणिक कैलेंडर पर जोर
महाराष्ट्र में वार्षिक परीक्षाओं के समय को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। शिक्षकों के एक संगठन ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर अप्रैल में सालाना परीक्षाएं आयोजित न करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि भीषण गर्मी के कारण छात्रों और शिक्षकों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, इसलिए परीक्षाएं मार्च महीने में ही कराई जानी चाहिए। पिछले वर्ष 2025 में स्कूलों की वर्षांत परीक्षाएं मार्च के बजाय अप्रैल में आयोजित की गई थीं। उस दौरान तेज गर्मी के कारण कई छात्र बीमार पड़े थे और परीक्षा में उपस्थिति भी प्रभावित हुई थी। इसी अनुभव को देखते हुए शिक्षकों ने इस बार पहले से ही सरकार को अवगत कराया है, ताकि समय रहते परीक्षा कार्यक्रम तय किया जा सके।
गर्मियों में परीक्षाएं आयोजित ना करने की अपील
महाराष्ट्र प्रोग्रेसिव टीचर्स एसोसिएशन (एमपीटीए) के अध्यक्ष तनाजी कांबले ने कहा, “हमने अभी से पत्र लिखा है ताकि परीक्षा का टाइमटेबल पहले से तय हो सके। पिछले साल अप्रैल की गर्मी के कारण कई छात्रों की तबीयत खराब हुई थी। अभिभावकों और शिक्षकों दोनों के लिए यह समय असुविधाजनक साबित हुआ। हम चाहते हैं कि पहले की तरह परीक्षाएं मार्च के मध्य या अधिकतम मार्च के अंत तक पूरी कर ली जाएं।” शिक्षा विभाग द्वारा जारी साप्ताहिक शैक्षणिक कार्यक्रम के अनुसार, पीरियॉडिक असेसमेंट टेस्ट (पीएटी) भी अप्रैल में प्रस्तावित है। पिछले साल भी इस फैसले का विरोध हुआ था, क्योंकि अप्रैल में गर्मी के साथ-साथ कॉपियां जांचने और परिणाम तैयार करने के लिए समय की कमी हो जाती है।
शिक्षकों की मुख्य मांगें इस प्रकार हैं
• अप्रैल में किसी भी प्रकार की वार्षिक परीक्षा आयोजित न की जाए, परीक्षाएं मार्च में ही कराई जाएं।
• अप्रैल का महीना उन छात्रों के मार्गदर्शन के लिए उपयोग किया जाए जो परीक्षा में असफल होते हैं, ताकि वे पुनर्परीक्षा की तैयारी कर सकें।
• स्कूल प्राचार्यों को वार्षिक शैक्षणिक कार्यक्रम तय करने में अधिक स्वतंत्रता दी जाए।
दादर के एक स्कूल के प्राचार्य ने बताया कि पिछले वर्ष परीक्षाएं 25 अप्रैल तक चली थीं। “हर कक्षा में 50 से 60 छात्र हैं। शिक्षकों को परिणाम घोषित करने के लिए बहुत कम समय मिला था। अब परिणाम ऑनलाइन अपलोड करने होते हैं, जिससे प्रक्रिया और भी तेज करनी पड़ती है। परिणाम ठीक से तैयार करने के लिए कम से कम 15 दिन का समय जरूरी है। अगर सरकार चाहती है कि छात्र अधिक समय तक स्कूल आएं, तो परीक्षा के बाद अतिरिक्त कक्षाएं या ‘नो-बैग डे’ रखे जा सकते हैं,” उन्होंने कहा।
मामले पर सरकार का नजरिया
महाराष्ट्र सरकार और शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार, परीक्षा कार्यक्रम में बदलाव शैक्षणिक सत्र को संतुलित और व्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से किया गया था। अधिकारियों का मानना है कि अप्रैल तक परीक्षाएं कराने से शिक्षण कार्य के लिए अधिक समय मिलता है, जिससे पाठ्यक्रम पूरा करने में जल्दबाजी नहीं करनी पड़ती। सरकार का यह भी तर्क है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत निरंतर मूल्यांकन और समयबद्ध शैक्षणिक कैलेंडर पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में वार्षिक परीक्षाओं और पीरियॉडिक असेसमेंट टेस्ट (PAT) को एक तय ढांचे में रखना आवश्यक है, ताकि पूरे राज्य में एक समान शैक्षणिक व्यवस्था लागू की जा सके। शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों का कहना है कि परीक्षा तिथियां तय करते समय मौसम, छुट्टियों और बोर्ड परीक्षाओं का भी ध्यान रखा जाता है। उनका मानना है कि यदि मार्च में परीक्षाएं जल्दी समाप्त कर दी जाएं तो कई स्कूलों में पाठ्यक्रम अधूरा रह सकता है।
सरकार ने भी माना चुनौती
हालांकि, सरकार यह भी स्वीकार करती है कि अप्रैल की गर्मी एक चुनौती है। ऐसे में विभाग वैकल्पिक उपायों पर विचार कर सकता है, जैसे-
• परीक्षा का समय सुबह जल्दी निर्धारित करना,
• स्कूलों में पीने के पानी और पंखों/कूलर की बेहतर व्यवस्था,
• जरूरत पड़ने पर स्थानीय स्तर पर समय में लचीलापन देना।
सरकार की ओर से अभी अंतिम परीक्षा कार्यक्रम की घोषणा नहीं की गई है। शिक्षा विभाग का कहना है कि सभी पक्षों की राय को ध्यान में रखकर ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
फिलहाल शिक्षक संगठन सरकार से सकारात्मक निर्णय की उम्मीद कर रहे हैं। अब सबकी नजर शिक्षा विभाग द्वारा जारी होने वाले परीक्षा कार्यक्रम पर टिकी है।
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