संगम नगरी प्रयागराज में माघ मास के पावन अवसर पर आरंभ हुए माघ मेले ने पहले ही दिन आस्था का नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम पर 32 लाख से अधिक श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों ने पुण्य स्नान कर धर्मलाभ अर्जित किया। भोर से ही संगम तट “हर-हर गंगे” और “हर-हर महादेव” के उद्घोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं की इस ऐतिहासिक उपस्थिति ने न केवल धार्मिक आस्था की गहराई को दर्शाया, बल्कि उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों के चेहरों पर संतोष और सफलता की मुस्कान भी ला दी।
प्रयागराज माघ मेले की भव्यता ने तोड़े सभी रिकॉर्ड
प्रयागराज में विश्व प्रसिद्ध माघ मेला 2026 का शुभारंभ हो चुका है। 44 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक माघ मेले में पहले ही दिन यानी शनिवार 03 जनवरी 2026 को 31 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम में आस्था की डुबकी लगाई। संगम तट पर हर-हर गंगे और जय मां गंगा के उद्घोष के बीच आस्था, परंपरा और आधुनिक व्यवस्थाओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। व्हीलचेयर पर संगम स्नान करते बुजुर्ग, घाटों पर पेट्रोलिंग करती सुरक्षा गाड़ियां और चारों ओर श्रद्धालुओं का सैलाब, पहले स्नान पर्व ने माघ मेले की भव्यता का साफ संकेत दे दिया। महाकुंभ-2025 के भव्य और सफल आयोजन के बाद अब राज्य सरकार प्रयागराज को केवल एक धार्मिक नगर नहीं, बल्कि वैश्विक धार्मिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित करने की ठोस रणनीति पर काम कर रही है। माघ मेले की यह रिकॉर्ड शुरुआत उसी दिशा में एक मजबूत संकेत मानी जा रही है।
माघ मेला क्या है और क्यों खास है?
माघ मेला सनातन परंपरा का ऐसा धार्मिक आयोजन है, जो हर वर्ष माघ मास (जनवरी–फरवरी) में प्रयागराज के संगम तट पर आयोजित होता है। यह मेला कुंभ या महाकुंभ जितना विशाल भले न हो, लेकिन आध्यात्मिक महत्व में किसी भी बड़े आयोजन से कम नहीं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ मास में संगम में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है, पुण्य की प्राप्ति होती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। शास्त्रों में कहा गया है, “माघे स्नानं प्रयागे च कोटि यज्ञ फलम् लभेत।”अर्थात माघ मास में प्रयागराज में किया गया स्नान करोड़ों यज्ञों के समान फलदायी होता है। इसी धार्मिक विश्वास के चलते हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचते हैं।
माघ मेले का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
माघ मेले का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। प्रयागराज को प्राचीन काल में प्रयाग कहा जाता था और इसे तीर्थराज की उपाधि प्राप्त है। ऋग्वेद, महाभारत, रामायण और विभिन्न पुराणों में प्रयाग का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के बाद पहला यज्ञ यहीं किया था। गुप्त काल में प्रयाग धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। मुगल काल और बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान भी माघ मेले की परंपरा निरंतर चलती रही। ब्रिटिश दस्तावेजों में इसे “Magh Fair” के नाम से दर्ज किया गया है। इससे स्पष्ट है कि माघ मेला केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक निरंतरता का भी प्रतीक है।
कल्पवास: माघ मेले की आत्मा
माघ मेले की सबसे विशिष्ट और पवित्र परंपरा है कल्पवास। कल्पवासी माघ शुक्ल प्रतिपदा से लेकर माघ पूर्णिमा तक संगम तट पर अस्थायी तंबुओं में रहते हैं। इस अवधि में वे-
• दिन में तीन बार संगम स्नान,
• सात्विक भोजन,
• संयमित जीवन,
• जप, तप और ध्यान का पालन करते हैं। कल्पवास को आत्मिक शुद्धि और जीवन अनुशासन का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। देश के कोने-कोने से हजारों वृद्ध, महिलाएं और साधु-संत हर वर्ष कल्पवास के लिए प्रयागराज आते हैं।
माघ मेला और कुंभ/महाकुंभ का अंतर
अक्सर आमजन माघ मेला और कुंभ को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों में स्पष्ट अंतर है-
• माघ मेला: हर वर्ष,
• अर्धकुंभ: 6 वर्ष में,
• कुंभ मेला: 12 वर्ष में,
• महाकुंभ: 144 वर्ष में (केवल प्रयागराज)। हालांकि आकार में माघ मेला छोटा होता है, लेकिन इसकी धार्मिक निरंतरता और साधना परंपरा इसे विशिष्ट बनाती है।
पहले दिन 32 लाख श्रद्धालु: प्रशासनिक परीक्षा और सफलता
माघ मेले के पहले दिन ही 32 लाख से अधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने प्रशासनिक तैयारियों की कड़ी परीक्षा ली। प्रशासन ने पहले से-
• अस्थायी घाटों का निर्माण,
• पीपा पुलों की व्यवस्था,
• स्वच्छ पेयजल,
• चिकित्सा शिविर,
• अग्निशमन और आपदा प्रबंधन,
• सीसीटीवी और ड्रोन निगरानी जैसी व्यवस्थाएं की थीं। अधिकारियों के अनुसार, महाकुंभ-2025 के अनुभव का लाभ इस बार साफ दिखाई दिया और भीड़ प्रबंधन सुचारु रहा।
उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग की रणनीति
महाकुंभ-2025 के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रयागराज को लेकर दीर्घकालिक योजना बनाई है। उद्देश्य है- “संगम सिटी” को वैश्विक आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना। प्रमुख पहलें-
1. इंफ्रास्ट्रक्चर विकास
• एयरपोर्ट विस्तार,
• नई सड़कें और फ्लाईओवर,
• रेलवे स्टेशन का आधुनिकीकरण,
2. डिजिटल और वैश्विक प्रचार
• अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल फेयर,
• डॉक्यूमेंट्री और वर्चुअल टूर,
• सोशल मीडिया कैंपेन!
3. हेरिटेज और स्पिरिचुअल सर्किट
• अक्षयवट
• हनुमान मंदिर
• इलाहाबाद किला
• आनंद भवन
• भारद्वाज आश्रम
प्रयागराज: आस्था के साथ संस्कृति और स्वतंत्रता का केंद्र
प्रयागराज केवल धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, हिंदी साहित्य और आधुनिक राजनीति का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यह वही धरती है जहां चंद्रशेखर आज़ाद, पं. जवाहरलाल नेहरू, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन जैसे महान व्यक्तित्वों ने इतिहास रचा।
स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा
माघ मेला स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए जीवनरेखा है। इससे-
• होटल और धर्मशालाएं,
• नाविक और परिवहन,
• फूल, पूजा सामग्री, हस्तशिल्प,
• छोटे दुकानदार को व्यापक रोजगार मिलता है।अनुमान है कि माघ मेला हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये का आर्थिक प्रवाह उत्पन्न करता है।
विदेशी श्रद्धालुओं और पर्यटकों की बढ़ती संख्या
पिछले कुछ वर्षों में माघ मेले में विदेशी श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ी है। योग, ध्यान और भारतीय दर्शन के प्रति वैश्विक आकर्षण ने प्रयागराज को इंटरनेशनल स्पिरिचुअल डेस्टिनेशन बना दिया है।
स्वच्छता, सुरक्षा और पर्यावरण पर फोकस
सरकार ने माघ मेले को-
• प्लास्टिक मुक्त,
• स्वच्छ गंगा अभियान से जुड़ा,
• महिला और पर्यटक सुरक्षा केंद्रित बनाने पर विशेष जोर दिया है। यह पहल मेले की वैश्विक छवि को मजबूत कर रही है।
माघ मेला आज केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का जीवंत प्रतीक, आध्यात्मिक चेतना का केंद्र और पर्यटन और अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बन चुका है। पहले दिन 32 लाख श्रद्धालुओं की ऐतिहासिक उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि संगम नगरी प्रयागराज आने वाले वर्षों में विश्व पटल पर आध्यात्मिक पर्यटन की राजधानी के रूप में स्थापित होने की पूरी क्षमता रखती है। उत्तर प्रदेश सरकार और पर्यटन विभाग की सतत कोशिशें माघ मेले को एक नए युग की ओर ले जा रही हैं जहां आस्था, इतिहास और विकास एक साथ प्रवाहित हो रहे हैं।
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