रावण दहन नहीं, मिट्टी में मिलाने की रस्म: कोटा की अनोखी परंपरा

The CSR Journal Magazine
देशभर में विजयादशमी पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन राजस्थान के कोटा में एक अलग ही परंपरा देखने को मिलती है। यहां जेठी समाज के पहलवान मिट्टी के रावण को जलाने के बजाय उसे पैरों से रौंदकर समाप्त करते हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह कुश्ती की संस्कृति और अहंकार के अंत का संदेश भी देती है।

संस्कृति और परंपरा का संगम

कोटा का यह दशहरा अपने अनूठे स्वरूप के कारण खास माना जाता है। यहां की परंपरा में मिट्टी के रावण को रौंदना एक प्रतीकात्मक क्रिया है, जो बुराई, अन्याय और अहंकार को कुचलने का संदेश देती है। यह दर्शाता है कि विजयादशमी का महत्व केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे बुराइयों पर विजय पाने की भावना भी छिपी है।

जेठी समाज की ऐतिहासिक विरासत

कोटा में जेठी समाज की परंपरा का संबंध हाड़ौती के पुराने राजपरिवारों और कुश्ती की संस्कृति से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि हाड़ौती के राजपूत शासकों को कुश्ती का बहुत शौक था। इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए गुजरात के मेहसाणा से जेठी समाज के पहलवानों को कोटा लाया गया था। उनके लिए विशेष अखाड़े बनाए गए, जो आज भी समाज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं।

नवरात्रि से शुरू होती है रस्म

जेठी समाज की यह परंपरा नवरात्रि के दौरान शुरू होती है। अखाड़े में मिट्टी से रावण की आकृति बनाई जाती है और उसके ऊपर ज्वारे उगाए जाते हैं। नौ दिनों तक इन ज्वारों की देखभाल की जाती है। विजयादशमी के दिन, समाज के पहलवान एकत्रित होते हैं और मिट्टी के रावण को पैरों से रौंदकर इस परंपरा का पालन करते हैं।

कुश्ती का प्रदर्शन और भाईचारा

रावण को रौंदने के बाद, अखाड़े में पहलवान अपनी कुश्ती कला और ताकत का प्रदर्शन करते हैं। यह न केवल धार्मिक परंपरा को जीवित रखता है, बल्कि आपसी भाईचारे को भी बढ़ावा देता है। समाज के लोग एक-दूसरे को ज्वारे भेंट कर दशहरे की शुभकामनाएं देते हैं। इस तरह, कोटा का दशहरा अपने सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है।

परंपरा का महत्व

कोटा का यह अनोखा दशहरा समय के साथ धीरे-धीरे विलुप्त होती परंपराओं को सहेजने का एक प्रयास है। यह नई पीढ़ी को अपने इतिहास, अनुशासन और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ता है। मिट्टी के रावण को रौंदने की रस्म न केवल एक धार्मिक क्रिया है, बल्कि यह समाज की एकता और अखाड़े की संस्कृति का प्रतीक भी है।

संस्कार और पहचान

इस परंपरा के माध्यम से जेठी समाज ने अपनी पहचान को बनाए रखा है। यह न केवल एक धार्मिक उत्सव है, बल्कि यह समाज के लिए एक ऐसा अवसर है, जहां वे अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हैं। कोटा का दशहरा इस बात का प्रमाण है कि कैसे पुरानी परंपराएं आज भी जीवित हैं और नई पीढ़ी को अपने संस्कारों से जोड़ती हैं।

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