अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक बयानों के बाद डेनमार्क ने 1952 के शीत-युद्धकालीन आदेश का हवाला देते हुए सैन्य प्रतिरोध का संकेत दिया ! सवाल यह है कि क्या यह चेतावनी केवल प्रतीकात्मक है या NATO की एकता के लिए गंभीर खतरा ?
डेनमार्क का नया अल्टिमेटम- ‘पहले गोली, फिर सवाल’ !
डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि उसके सैनिकों के पास 1952 के मिलिटरी नियम के तहत किसी भी घुसपैठ या आक्रमण की स्थिति में तुरंत हमला करने का आदेश है, बिना वरिष्ठ अधिकारियों या राजनीतिक नेतृत्व से अनुमति लिए। इसे आम भाषा में “पहले गोली चलाओ, बाद में सवाल पूछो” कहा गया है। यह नियम शीत युद्ध (Cold War) के समय लागू किया गया था जब डेनमार्क पर 1940 में नाज़ी जर्मनी ने अचानक हमला किया था और संवाद टूट गया था। यही कारण है कि जब किसी भी बाहरी शक्ति द्वारा हमला ठहरा जाए, तो सैनिकों को स्वतंत्र रूप से जवाब देने का अधिकार दिया गया। डेनमार्क के प्रधानमंत्री मेटे फ्रीडरिकसेन ने साफ कहा है कि अगर अमेरिका या किसी भी देश ने ग्रीनलैंड पर बलपूर्वक कब्ज़ा करने की कोशिश की, तो वह नाटो (NATO) का अंत होगा क्योंकि एक सदस्य दूसरे सदस्य पर हमला करेगा, जो नाटो की मूल रक्षा नीति के खिलाफ है।
क्या डेनमार्क की सेना अमेरिकी “हमले” का मुकाबला कर सकती है?
डेनमार्क की सशस्त्र सेनाएं संख्या और क्षमता दोनों में छोटे पैमाने पर हैं, और मुख्य रूप से राष्ट्रीय रक्षा, संयुक्त NATO मिशनों, और छोटे पैमाने के संचा लन के लिये संरचित हैं। इसका पूरा बल लगभग 83,000 सैनिकों का है, जिसमें सेना, नौसेना और वायुसेना शामिल हैं, लगभग 31 लड़ाकू विमान, 34 हेलीकॉप्टर और नौ फ़्रिगेट युद्धपोत शामिल हैं। डेनमार्क ग्रीनलैंड की रक्षा NATO और संयुक्त रक्षा सहायता के तहतकरता है, क्योंकि ग्रीनलैंड का अपना कोई स्वतंत्र सैन्य बल नहीं है।
ग्रीनलैंड में डेनमार्क की मौजूदगी
डेनमार्क की Joint Arctic Command (JAC) ग्रीनलैंड के सर्वोच्च सैनिक संगठन के रूप में काम करती है, जिसका मुख्य लक्ष्य क्षेत्र की निगरानी, सैन्य वर्चस्व दिखाना और शांतिपूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करना है। JAC के पास सीमित संसाधन हैं जैसे कि दो सैन्य नौकाएं, हेलीकॉप्टर, कुछ समुद्री निगरानी विमान, और आइस क्षेत्र के लिये विशेष पटरोल यूनिटें। रस्सियों पर चलने वाले विशेष कुत्तों के साथ Sirius Dog Sled Patrol जैसे विशेष यूनिट भी हैं, जो कठिन आर्कटिक इलाके में गश्त करते हैं।
अमेरिका की सैन्य क्षमता
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताक़त है, जिसमें लगभग एक मिलियन से अधिक सक्रिय सैनिक, भारी बख़्तरबंद वाहन, आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइल रक्षा प्रणाली और विश्व में कहीं भी तैनात होने की क्षमता है। ग्रीनलैंड में पहले से ही अमेरिकी Pituffik Space Base (Thule Air Base) मौजूद है, जो अमेरिकी रक्षा और अंतरिक्ष निगरानी का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र है। सरल शब्दों में, डेनमार्क की सैन्य शक्ति अमेरिका से कोई मुकाबला नहीं कर सकती, यह एक सामरिक और संख्या में बेहद असमान स्थिति है। अगर अमेरिका जैसा महाशक्ति बल सीधे ग्रीनलैंड पर हमला करता तो डेनमार्क के स्थानीय सैनिक पूर्वी जवाब जरूर देंगे (जैसा उनके नियम हैं), लेकिन लंबे युद्ध में अमेरिका जैसे विशाल सैन्य बल को रोक पाना संभव नहीं है। यही कारण है कि यह चेतावनी ज़्यादातर राजनीतिक और प्रतीकात्मक रूप से दी जा रही है ताकि अमेरिका को किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई से रोका जाए।
अमेरिका क्यों चाहता है ग्रीनलैंड?
ग्रीनलैंड का भौगोलिक और सामरिक महत्व है, अटलांटिक और आर्कटिक के बीच, जहां से रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी शक्तियों की गति देखी जा सकती है। इसमें खनिज संसाधन, दुर्लभ पृथ्वी धातुएं और कच्चे संसाधनों की संभावना बहुत अधिक हैं जो आधुनिक तकनीक में आवश्यक हैं। लेकिन अमेरिका के पास पहले से ही 1951 के समझौते के तहत डेनमार्क की अनुमति से वहां सैन्य अधिकार मौजूद हैं, अतः पूरी तरह मिलिट्री कब्ज़ा करने की जरूरत नहीं है। यह समझौता भी विवाद का विषय है।
सारी प्रक्रियाओं का निचोड़- अमेरिका-डेनमार्क हमला महज़ राजनीतिक चेतावनी
डेनमार्क ने कहा है कि उसके सैनिक 1952 के नियम के तहत तुरंत गोली चलाने का अधिकार रखते हैं अगर कोई भी देश (यहां तक कि अमेरिका भी) ग्रीनलैंड पर हमला करता है। यह चेतावनी राजनीतिक संदेश है ताकि अमेरिका को युद्धसंकट से रोका जा सके और नाटो के ढांचे को बचाया जा सके। डेनमार्क की सेना संख्या और क्षमता में अमेरिका का मुकाबला करने लायक नहीं है, परंतु यह अपनी संप्रभुता को प्रतीकात्मक रूप से बचाने के लिए तैयार है। ग्रीनलैंड खुद की सेना नहीं रखता! यह डेनमार्क की सैन्य जिम्मेदारी है और NATO कॉलेकटिव रक्षा अनुच्छेद 5 के भाग के तहत संरक्षित है। अमेरिका के पास पहले से ही वहां एक बड़ा सैन्य आधार है, लेकिन प्रत्यक्ष कब्ज़े की योजना डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों द्वारा खारिज की जा रही हैं।
ग्रीनलैंड विवाद सिर्फ ज़मीन का नहीं, व्यवस्था का सवाल
डेनमार्क और अमेरिका के बीच ग्रीनलैंड को लेकर उपजा तनाव केवल एक द्वीप या संसाधनों का विवाद नहीं है। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था की नींव पर सीधी चोट है। जब NATO का सबसे शक्तिशाली सदस्य, NATO के ही एक छोटे सदस्य के क्षेत्र पर दबाव बनाता है, तो यह सवाल खड़ा होता है कि क्या नियम केवल कमज़ोर देशों के लिए हैं? डेनमार्क की “पहले गोली, बाद में सवाल” वाली चेतावनी असल में सैन्य आत्मविश्वास का नहीं, बल्कि कूटनीतिक हताशा का संकेत है। कोपेनहेगन जानता है कि वह अमेरिका से युद्ध नहीं जीत सकता, लेकिन यह संदेश देना ज़रूरी था कि संप्रभुता सौदे का विषय नहीं है।
NATO की सबसे बड़ी परीक्षा: अनुच्छेद 5 बनाम राजनीतिक हकीकत
NATO का अनुच्छेद 5 कहता है- ‘एक सदस्य पर हमला, सभी पर हमला !’ लेकिन सवाल यह है कि अगर हमला NATO के भीतर से ही हो, तो क्या होगा?
• क्या फ्रांस, जर्मनी या ब्रिटेन अमेरिका के खिलाफ खड़े होंगे?
• या फिर यह मान लिया जाएगा कि “स्ट्रैटेजिक ज़रूरत” नियमों से ऊपर है?
अगर इस मामले में NATO चुप रहता है, तो यह संगठन की नैतिक मृत्यु (Moral Death) होगी। दुनिया को संदेश जाएगा कि NATO एक सुरक्षा गठबंधन नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन का क्लब है, जहाँ ताकतवर जो चाहे कर सकता है।
ट्रंप की नीति: सौदेबाज़ी या साम्राज्यवादी सोच?
डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति पारंपरिक कूटनीति से अलग रही है। ग्रीनलैंड को लेकर बयान, “हम इसे लेंगे, चाहे वे चाहें या नहीं!” यह भाषा 21वीं सदी की नहीं, बल्कि 19वीं सदी के साम्राज्यवाद की याद दिलाती है। यह वही सोच है जिसने इराक को अस्थिर किया, जिसने अफ़ग़ानिस्तान में दशकों का युद्ध जन्म दिया, और जिसने वैश्विक भरोसे को कमजोर किया। ग्रीनलैंड में पहले से मौजूद अमेरिकी बेस होने के बावजूद जब कब्ज़े की बात होती है, तो स्पष्ट है कि मामला सुरक्षा का नहीं, बल्कि पूर्ण नियंत्रण का है।
छोटे देशों के लिए खतरनाक संदेश
अगर अमेरिका जैसा देश डेनमार्क पर दबाव डाल सकता है, तो संदेश साफ़ है- ताइवान के लिए चीन, यूक्रेन के लिए रूस और दक्षिण चीन सागर में छोटे देश- सभी यह निष्कर्ष निकालेंगे कि अंतरराष्ट्रीय कानून तभी तक मान्य है, जब तक ताकतवर देश चाहें। यह सोच वैश्विक अराजकता को जन्म देगी।
डेनमार्क की सैन्य चेतावनी: प्रतीक, प्रतिरोध और प्रतिष्ठा
डेनमार्क जानता है कि उसके पास न तो पर्याप्त सैनिक हैं, न हथियार और न ही लॉजिस्टिक क्षमता, फिर भी चेतावनी दी गई, क्योंकि बिना प्रतिरोध झुक जाना, भविष्य के लिए और बड़ा खतरा बनता। यह वही सिद्धांत है जो इतिहास सिखाता है- “कमज़ोर का मौन, ताकतवर को और आक्रामक बनाता है।”
यूरोप के लिए चेतावनी की घंटी
यह विवाद यूरोप को मजबूर करता है कि वह खुद से सवाल पूछे-
• क्या वह अब भी अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रह सकता है?
• क्या “Strategic Autonomy” सिर्फ़ भाषणों तक सीमित रहेगी?
ग्रीनलैंड संकट यूरोप को बता रहा है कि सुरक्षा का ठेका किसी और को देना, अंततः राजनीतिक असुरक्षा बन जाता है।
ग्रीनलैंड विवाद- सैन्य शक्ति, संप्रभुता, वैश्विक व्यवस्था का इम्तिहान
ग्रीनलैंड पर उठा यह विवाद भविष्य की एक झलक है एक ऐसी दुनिया की, जहां गठबंधन कमजोर पड़ रहे हैं, नियम ताकत के नीचे दब रहे हैं और छोटे देश अपनी सुरक्षा के लिए पुराने कानूनों तक निकालने को मजबूर हैं। अगर NATO इस संकट में निष्पक्ष और सिद्धांत आधारित भूमिका नहीं निभाता, तो यह संगठन धीरे-धीरे कागज़ी ढांचे में बदल जाएगा। डेनमार्क गोली से नहीं, सवाल से लड़ रहा है, और सवाल बहुत बड़ा है- “क्या दुनिया अब भी नियमों से चलेगी, या सिर्फ़ ताकत से?”
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