भारत एक विशाल, विविधताओं से भरा हुआ देश है, जहाँ भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक भिन्नताएँ हर कुछ किलोमीटर पर बदल जाती हैं। ऐसे देश को एक सूत्र में बाँधने का श्रेय यदि किसी एक व्यवस्था को दिया जाए, तो वह भारतीय रेल है। भारतीय रेल केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि देश की जीवनरेखा, आर्थिक रीढ़, सामाजिक सेतु और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। रेल ने भारत को गाँव से शहर, किसान से बाज़ार, छात्र से विश्वविद्यालय और सैनिक से सीमा तक जोड़ने का कार्य किया है। यह लेख भारतीय रेल के महत्व, पहली ट्रेन, धीरे-धीरे हुए विकास, आधुनिक ट्रेनों, मेट्रो, मोनोरेल, बुलेट ट्रेन परियोजना और आज की ट्रेन यात्रा में उपलब्ध सुविधाओं का विस्तार से वर्णन करता है।
पहली ट्रेन से बुलेट ट्रेन तक, भारत की जीवनरेखा भारतीय रेलवे!
भारतीय रेल केवल एक परिवहन व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय जीवन का अभिन्न अंग है। इतने बड़े और विविधताओं से भरे देश में लोगों को आपस में जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम रेल रही है। भारत के गांव, कस्बे, शहर और महानगर रेल लाइनों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े हैं। रेल ने आम आदमी को सस्ती और सुरक्षित यात्रा का साधन दिया। किसान अपनी फसल मंडियों तक पहुंचाते हैं, छात्र पढ़ाई के लिए दूर-दराज़ जाते हैं, मज़दूर रोज़गार की तलाश में शहरों तक पहुंचते हैं और व्यापारी अपने माल को देश के कोने-कोने तक भेजते हैं। इसी कारण भारतीय रेल को देश की जीवनरेखा कहा जाता है। आज भारतीय रेल विश्व के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक है और हर दिन करोड़ों यात्रियों को सेवा प्रदान करती है।
भारत में रेल की आवश्यकता क्यों पड़ी
उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भारत में यातायात के साधन बहुत सीमित थे। बैलगाड़ी, नाव और पैदल यात्रा ही मुख्य साधन थे, जिनमें समय अधिक लगता था और जोखिम भी था। ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासन, व्यापार और सैन्य गतिविधियों के लिए तेज़ परिवहन की आवश्यकता महसूस हुई। इसी आवश्यकता ने भारत में रेल की नींव रखी। हालांकि शुरुआत औपनिवेशिक हितों के लिए हुई, लेकिन आगे चलकर रेल भारत के विकास का सबसे बड़ा आधार बनी।
भारत की पहली ट्रेन (16 अप्रैल 1853)
भारत में पहली रेलगाड़ी 16 अप्रैल 1853 को चलाई गई। यह दिन भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
• मार्ग: बोरीबंदर (वर्तमान छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, मुंबई) से ठाणे,
• दूरी: 34 किलोमीटर,
• इंजन: साहिब, सिंधु और सुल्तान,
• डिब्बे: 14,
• यात्री: लगभग 400! यह यात्रा दोपहर 3:30 बजे शुरू हुई और लगभग 1 घंटे 15 मिनट में पूरी हुई। इस ट्रेन की सीटी ने भारत में आधुनिक परिवहन युग की शुरुआत की।
ब्रिटिश काल में रेलवे का विस्तार (1853–1947)
1853 के बाद अंग्रेज़ों ने तेज़ी से रेल नेटवर्क का विस्तार किया। 1854 में कोलकाता से हुगली और 1856 में मद्रास से आर्कॉट तक रेल लाइन बिछाई गई। उद्देश्य-
• कच्चे माल को बंदरगाहों तक पहुंचाना,
• ब्रिटिश उद्योगों को लाभ,
• सेना और प्रशासन की सुविधा! सन 1900 तक भारत में लगभग 40,000 किलोमीटर रेल लाइन बिछ चुकी थी। भले ही उद्देश्य औपनिवेशिक थे, लेकिन इससे भारत में परिवहन की मजबूत नींव पड़ी।
स्वतंत्रता के समय भारतीय रेल की स्थिति (1947)
1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन रेल व्यवस्था को विभाजन का गहरा आघात लगा। कई रेल मार्ग पाकिस्तान में चले गए, कर्मचारी बंट गए और संसाधनों की कमी हो गई। उस समय भारतीय रेल के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी-
• टूटी हुई लाइनों की मरम्मत,
• शरणार्थियों का पुनर्वास,
• सीमित संसाधनों में संचालन !
रेलवे का राष्ट्रीयकरण (1951)
1951 में भारतीय रेल का राष्ट्रीयकरण किया गया। सभी निजी और क्षेत्रीय रेल कंपनियों को मिलाकर एकीकृत भारतीय रेल बनाई गई। इसके बाद रेलवे को ज़ोन में बांटा गया, ताकि प्रशासन बेहतर हो सके। यही वह समय था जब रेलवे को जनसेवा और राष्ट्रनिर्माण का साधन बनाया गया।
भाप इंजन का युग (1853–1960)
प्रारंभिक वर्षों में रेलगाड़ियां भाप इंजन से चलती थीं। ये इंजन कोयले और पानी से चलते थे। धीमी रफ़्तार, अधिक धुंआ और ज़्यादा रखरखाव इनकी विशेषता थी। हालांकि ये इंजन आज के मुकाबले अविकसित थे, लेकिन उन्होंने भारत में रेल परिवहन की नींव रखी।
डीज़ल और इलेक्ट्रिक इंजनों की शुरुआत (1960 के बाद)
1960 के दशक से भारतीय रेल ने डीज़ल इंजन अपनाने शुरू किए। इसके बाद धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक इंजनों का उपयोग बढ़ा। अधिक गति, कम ईंधन खर्च और कम प्रदूषण के कारण ये भाप इंजन से बेहतर थे। आज भारत में अधिकांश रेल मार्ग विद्युतीकृत हो चुके हैं।
ब्रॉड गेज और ट्रैक सुधार
शुरुआत में भारत में अलग-अलग गेज थे, मीटर गेज, नैरो गेज और ब्रॉड गेज। 1990 के बाद “यूनिगेज नीति” के तहत अधिकांश लाइनों को ब्रॉड गेज में बदला गया। इससे-
• गति बढ़ी,
• सुरक्षा बेहतर हुई,
• भारी माल ढुलाई संभव हुई !
राजधानी और शताब्दी ट्रेनों की शुरुआत
1969 में पहली राजधानी एक्सप्रेस शुरू हुई, जिसने महानगरों को तेज़ और आरामदायक यात्रा से जोड़ा।
1988 में शताब्दी एक्सप्रेस शुरू हुई, जो दिन में तेज़ यात्रा के लिए जानी जाती है।
वंदे भारत एक्सप्रेस
वंदे भारत एक्सप्रेस भारत की पहली स्वदेशी सेमी-हाई स्पीड ट्रेन है, जिसकी शुरुआत 15 फ़रवरी 2019 को नई दिल्ली–वाराणसी मार्ग पर हुई। इसे चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फ़ैक्ट्री में पूरी तरह भारत में डिज़ाइन और निर्मित किया गया है। यह एक इंजन-रहित ट्रेन है, जिसमें हर कोच में मोटर लगी होती है, जिससे यह तेज़ी से रफ्तार पकड़ती है और कम समय में रुक जाती है। इसकी अधिकतम गति लगभग 160 किलोमीटर प्रति घंटाहै। वंदे भारत में स्वचालित दरवाज़े, आरामदायक सीटें, मोबाइल चार्जिंग पॉइंट, डिजिटल सूचना प्रणाली, सीसीटीवी कैमरे और बेहतर ब्रेकिंग सिस्टम जैसी आधुनिक सुविधाएं दी गई हैं। यह ट्रेन तेज़, सुरक्षित और आरामदायक यात्रा का नया अनुभव देती है और “मेक इन इंडिया” व “आत्मनिर्भर भारत” की पहचान बन चुकी है।
मेट्रो रेल
मेट्रो रेल शहरी परिवहन की आधुनिक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य बड़े शहरों में बढ़ती भीड़, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण को कम करना है। भारत में पहली मेट्रो सेवा 24 अक्टूबर 1984 को कोलकाता में शुरू हुई, जबकि 25 दिसंबर 2002 को शुरू हुई दिल्ली मेट्रो ने देश में मेट्रो नेटवर्क को नई पहचान दी। मेट्रो रेल पूरी तरह बिजली से चलती है और समय की पाबंद मानी जाती है। इसमें वातानुकूलित कोच, स्वचालित टिकट प्रणाली, स्मार्ट कार्ड, एस्केलेटर, लिफ्ट और सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम होते हैं। आज दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, जयपुर, लखनऊ जैसे कई शहरों में मेट्रो रेल लोगों के दैनिक जीवन का अहम हिस्सा बन चुकी है और लाखों लोग रोज़ाना इसका उपयोग करते हैं।
बुलेट ट्रेन
बुलेट ट्रेन हाई-स्पीड रेल का सबसे आधुनिक रूप है, जिसकी गति 300 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे अधिक होती है। भारत में पहली बुलेट ट्रेन परियोजना मुंबई–अहमदाबाद के बीच शुरू की गई है, जिसकी घोषणा 2017 में की गई थी। इस परियोजना में जापान की प्रसिद्ध शिंकानसेन तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। बुलेट ट्रेन से मुंबई से अहमदाबाद की दूरी लगभग 2 से 3 घंटे में तय की जा सकेगी, जबकि अभी इसमें 6–7 घंटे लगते हैं। यह परियोजना भारत में आधुनिक तकनीक, बेहतर सुरक्षा मानकों और तेज़ यात्रा की दिशा में बड़ा कदम है। बुलेट ट्रेन से न केवल समय की बचत होगी, बल्कि रोज़गार के नए अवसर भी पैदा होंगे और भारत विश्व के हाई-स्पीड रेल वाले देशों की सूची में शामिल हो सकेगा।
भारत में चलने वाली अनोखी ट्रेनें
भारत के अलग अलग राज्यों में चलने वाली अनोखी ट्रेनें केवल यात्रा का साधन नहीं हैं, बल्कि वे देश के इतिहास, तकनीक, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता की जीवंत झलक प्रस्तुत करती हैं। कहीं पहाड़ों की टॉय ट्रेन है, तो कहीं हज़ारों किलोमीटर लंबी यात्रा—हर ट्रेन अपने आप में भारत की एक अलग कहानी कहती है।
दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (पश्चिम बंगाल)
दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे भारत की सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक पर्वतीय ट्रेनों में से एक है, जिसे आमतौर पर टॉय ट्रेन कहा जाता है। इसकी शुरुआत 2 जुलाई 1881 को हुई थी। यह ट्रेन न्यू जलपाईगुड़ी के पास स्थित सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग तक चलती है और लगभग 88 किलोमीटर की दूरी तय करती है। यह नैरो गेज रेलवे है, जो बेहद संकरी पटरियों पर चलती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बिना सुरंगों के पहाड़ों पर चढ़ती है और “जिग-ज़ैग” तथा “लूप” तकनीक का उपयोग करती है। यह ट्रेन चाय बागानों, बाज़ारों और पहाड़ी गांवों के बीच से होकर गुजरती है। 1999 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित किया गया, जिससे इसका पर्यटन महत्व और बढ़ गया।
कालका–शिमला टॉय ट्रेन (हिमाचल प्रदेश)
कालका–शिमला टॉय ट्रेन हिमाचल प्रदेश की शान मानी जाती है। इसकी शुरुआत 1903 में हुई थी और इसका निर्माण अंग्रेज़ों ने शिमला को अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी से जोड़ने के लिए किया था। यह ट्रेन लगभग 96 किलोमीटर लंबी यात्रा में 103 सुरंगों, 800 से अधिक पुलों और सैकड़ों मोड़ों से होकर गुजरती है। यह ट्रेन पहाड़ों, देवदार के जंगलों, घाटियों और छोटे-छोटे गांवों के बीच चलती है। इसकी गति भले ही धीमी हो, लेकिन यात्रियों को प्राकृतिक सौंदर्य का अनोखा अनुभव मिलता है। इसे भी यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है और यह आज भी पर्यटकों की पहली पसंद बनी हुई है।
नीलगिरि माउंटेन रेलवे (तमिलनाडु)
नीलगिरि माउंटेन रेलवे तमिलनाडु में मेट्टुपालयम से ऊटी (उदगमंडलम) तक चलती है। इसकी शुरुआत 1908में हुई थी। यह ट्रेन अपनी खास रैक और पिनियन प्रणाली के लिए जानी जाती है, जिसकी मदद से यह खड़ी चढ़ाई पर आसानी से चल पाती है। यह ट्रेन समुद्र तल से लगभग 326 मीटर की ऊंचाई से बढ़कर 2,200 मीटर से अधिक ऊंचाई तक जाती है। रास्ते में यह घने जंगलों, झरनों, सुरंगों और पहाड़ी खेतों से होकर गुजरती है। यह भी यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल है और दक्षिण भारत की सबसे अनोखी ट्रेन मानी जाती है।
विवेक एक्सप्रेस (असम से तमिलनाडु)
विवेक एक्सप्रेस भारत की सबसे लंबी दूरी तय करने वाली ट्रेन है। यह असम के डिब्रूगढ़ से तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक चलती है। यह लगभग 4,200 किलोमीटर की दूरी तय करती है और इसकी यात्रा में करीब 75–80 घंटे लगते हैं। यह ट्रेन उत्तर–पूर्व भारत को दक्षिण भारत से जोड़ती है और रास्ते में लगभग 8–9 राज्यों से होकर गुजरती है। यह ट्रेन देश की भौगोलिक, सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को एक ही यात्रा में दिखा देती है। लंबी दूरी और सामान्य किराए के कारण यह आम यात्रियों के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती है।
डेक्कन क्वीन एक्सप्रेस (महाराष्ट्र)
डेक्कन क्वीन एक्सप्रेस महाराष्ट्र की एक ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित ट्रेन है, जिसकी शुरुआत 1 जून 1930को हुई थी। यह मुंबई और पुणे के बीच चलती है। इसे भारत की पहली सुपरफास्ट और पहली महिला-नाम वाली ट्रेन भी कहा जाता है। यह ट्रेन अपने समयपालन, साफ-सफाई और आरामदायक यात्रा के लिए जानी जाती है। पश्चिमी घाट के सुंदर पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए यह ट्रेन यात्रियों को प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद देती है। रोज़ाना हजारों नौकरीपेशा लोग और छात्र इस ट्रेन से यात्रा करते हैं।
पैलेस ऑन व्हील्स (राजस्थान)
पैलेस ऑन व्हील्स भारत की सबसे प्रसिद्ध लक्ज़री ट्रेनों में से एक है। इसकी शुरुआत 1982 में की गई थी। यह ट्रेन राजस्थान की शाही विरासत को दर्शाने के लिए बनाई गई है। इसके डिब्बे राजाओं-महाराजाओं के महलों की तरह सजाए गए हैं। इसमें आलीशान कमरे, स्वादिष्ट राजस्थानी और अंतरराष्ट्रीय भोजन, बार, लाउंज और गाइड की सुविधाएं होती हैं। यह ट्रेन जयपुर, जोधपुर, उदयपुर और आगरा जैसे ऐतिहासिक स्थलों की सैर कराती है। विदेशी पर्यटकों में यह ट्रेन विशेष रूप से लोकप्रिय है।
कोंकण रेलवे (महाराष्ट्र–गोवा–कर्नाटक–केरल)
कोंकण रेलवे भारत की सबसे कठिन और साहसिक रेल परियोजनाओं में से एक मानी जाती है। इसका निर्माण 1990 के दशक में हुआ। यह रेलवे लाइन समुद्र, नदियों, पहाड़ों, सुरंगों और पुलों से होकर गुजरती है। मानसून के समय इस मार्ग पर चलने वाली ट्रेनें बेहद सुंदर दृश्य प्रस्तुत करती हैं। इस रेलवे ने गोवा और कोंकण क्षेत्र को देश के अन्य हिस्सों से मज़बूती से जोड़ा और पर्यटन व व्यापार को बढ़ावा दिया।
भारतीय रेल- पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम कदम
भारतीय रेल पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। रेल परिवहन सड़क और हवाई परिवहन की तुलना में कम ईंधन की खपत करता है और कम प्रदूषण फैलाता है। एक ट्रेन सैकड़ों यात्रियों और हजारों टन माल को एक साथ ले जा सकती है, जिससे बड़ी संख्या में बसों और ट्रकों की आवश्यकता कम हो जाती है। इससे कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसों का उत्सर्जन घटता है, जो जलवायु परिवर्तन को रोकने में सहायक है। भारतीय रेल ने बीते वर्षों में विद्युतीकरण पर विशेष ध्यान दिया है। डीज़ल इंजनों के स्थान पर बिजली से चलने वाली ट्रेनों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे ईंधन की बचत होती है और वायु प्रदूषण कम होता है। साथ ही रेलवे स्टेशनों और कार्यालयों में सौर ऊर्जा का उपयोग बढ़ाया जा रहा है, जिससे स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा को प्रोत्साहन मिल रहा है।
इकोफ्रेंडली और सस्टेनेबल भारतीय रेलवे
रेलवे द्वारा हरित स्टेशन और स्वच्छ रेलवे जैसे अभियानों के तहत जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, कचरा प्रबंधन और प्लास्टिक के उपयोग में कमी पर ज़ोर दिया जा रहा है। कई स्टेशनों पर एलईडी लाइटें लगाई गई हैं, जो कम बिजली खर्च करती हैं। इसके अलावा, रेलवे बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण कर रहा है, जिससे हरियाली बढ़ रही है और पर्यावरण संतुलन बना रहता है। इस प्रकार भारतीय रेल न केवल सस्ती और सुरक्षित यात्रा का साधन है, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल परिवहन प्रणाली के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ऊर्जा की बचत, प्रदूषण में कमी और हरित पहल के माध्यम से भारतीय रेल पर्यावरण संरक्षण में अपना अहम योगदान दे रही है।
भारतीय रेलवे की डिजिटल यात्रा
आधुनिक तकनीक के कारण आज ट्रेन टिकट बुक करना बेहद आसान हो गया है। पहले यात्रियों को रेलवे स्टेशन के टिकट काउंटर पर लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता था और कई बार टिकट न मिलने की समस्या भी रहती थी, लेकिन अब इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं ने इस प्रक्रिया को सरल बना दिया है। भारतीय रेलवे की आधिकारिक वेबसाइट और मोबाइल ऐप के माध्यम से लोग घर बैठे ही टिकट बुक कर सकते हैं। यात्री अपनी यात्रा की तारीख, ट्रेन का नाम, सीट की उपलब्धता और किराया आसानी से देख सकते हैं, जिससे सही निर्णय लेना सरल हो गया है।
आज IRCTC (इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज़्म कॉरपोरेशन) के माध्यम से ई-टिकट और मोबाइल टिकट की सुविधा उपलब्ध है। यात्री अपने मोबाइल फोन, लैपटॉप या कंप्यूटर से टिकट बुक कर सकते हैं और भुगतान के लिए डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, यूपीआई, नेट बैंकिंग और वॉलेट जैसी कई सुविधाएं मौजूद हैं। टिकट बुक होने के बाद उसकी जानकारी मोबाइल पर संदेश और ई-मेल के ज़रिए तुरंत मिल जाती है, जिससे कागज़ी टिकट रखने की जरूरत भी नहीं रह गई है।
स्टूडेंट, सीनियर सिटीज़न और दिव्यांगजन को विशेष छूट
आधुनिक समय में तत्काल टिकट, प्रीमियम तत्काल, सीनियर सिटीजन टिकट, छात्र और दिव्यांग यात्रियों के लिए विशेष छूट जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा अब यात्री सीट की स्थिति, ट्रेन की समय-सारणी, लेट होने की जानकारी और प्लेटफॉर्म नंबर तक पहले से जान सकते हैं। टिकट रद्द करना और पैसा वापस पाना भी पहले की तुलना में बहुत सरल हो गया है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि डिजिटल व्यवस्था, ऑनलाइन भुगतान और मोबाइल तकनीक ने ट्रेन टिकट बुकिंग को तेज़, सुरक्षित और आम लोगों की पहुंच में बना दिया है। आज कुछ ही क्लिक में टिकट बुक करना संभव है, जो आधुनिक समय में रेलवे की एक बड़ी उपलब्धि है।
भारतीय रेल : समय, तकनीक और विकास का ऐतिहासिक सफर
भारतीय रेल आम जनजीवन का अभिन्न हिस्सा है और देश के करोड़ों लोगों की दैनिक आवश्यकताओं से सीधे जुड़ी हुई है। भारत जैसे विशाल देश में जहां बड़ी आबादी सीमित संसाधनों पर निर्भर है, वहां भारतीय रेल सस्ती, सुरक्षित और भरोसेमंद यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण साधन बनी हुई है। रोज़ाना लाखों लोग काम पर जाने, पढ़ाई करने, इलाज कराने, रिश्तेदारों से मिलने और रोज़गार की तलाश में ट्रेन से यात्रा करते हैं। किसान अपनी फसल मंडियों तक पहुंचाते हैं, मज़दूर शहरों तक आते-जाते हैं और व्यापारी अपने सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था गतिशील रहती है।
शिक्षा और रोजगार में- भारतीय रेल
रेल ने शिक्षा और रोज़गार के अवसरों को भी आम लोगों की पहुंच में लाया है। ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र बड़े शहरों के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक आसानी से पहुंच पाते हैं। सरकारी और निजी नौकरियों में जाने वाले कर्मचारी नियमित रूप से रेल का उपयोग करते हैं। इसके अलावा धार्मिक यात्राएं, सामाजिक कार्यक्रम और पारिवारिक मेल-मिलाप भी रेल के माध्यम से सरल हुए हैं। ट्रेन यात्राएं भारत की विविध संस्कृति, भाषा और जीवनशैली को करीब से देखने का अवसर देती हैं, जिससे सामाजिक एकता और आपसी समझ बढ़ती है।
भारतीय मेलमिलाप संस्कृति की रीढ़- भारतीय रेलवे
इस प्रकार भारतीय रेल केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि आम आदमी के जीवन की ज़रूरतों को पूरा करने वाली एक मजबूत व्यवस्था है। यह लोगों को जोड़ती है, अवसर प्रदान करती है और देश के सामाजिक व आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इसलिए भारतीय रेल को सही अर्थों में भारत की जीवनरेखाकहा जाता है। भारतीय रेल समय के साथ बदलती रही है। 1853 की पहली ट्रेन से लेकर आज की वंदे भारत और आने वाली बुलेट ट्रेन तक, यह सफर भारत के विकास की कहानी है।भारतीय रेल न केवल अतीत की विरासत है, बल्कि भविष्य की रफ्तार भी है।
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