Home हिन्दी फ़ोरम पलायन के दर्द का अंत करो सरकार – मजबूर मजदूर

पलायन के दर्द का अंत करो सरकार – मजबूर मजदूर

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पलायन के दर्द का अंत करो सरकार - मजदूर
पलायन के दर्द का अंत करो सरकार - मजदूर
 
सरकार आप माई बाप हो, सरकार आप मजदूरों के पालनहार हो, सरकार आप ही के बलबुते मजदूर भले मज़बूरी में ही सही जिंदा है, मर रहा है, खुद को कोस रहा है कि क्यों मैं ऐसे मुल्क में पैदा हुआ जहां के प्रधानमंत्री पता नहीं कैसे ट्रिलियन इकॉनमी का सपना देखते है। ट्रिलियन इकॉनमी ये शब्द बस जैसे तैसे याद तो कर लिया लेकिन इसका मतलब नहीं समझता हूँ साहब। मजदूर हूँ और मजबूर भी हूँ। कोरोना काल में गलतियां तो बड़े सूटबूट वालों ने की। परदेशों से आये तो बीमारी भी लाये लेकिन अब हालात ऐसे हो गए है कि अब हम मजदूरों को रोजी रोटी छोड़ फिर भुखमरी दुनियां में जाने को मजबूर कर दिया।

सरकार के अर्थव्यवस्था की रीढ़ है पलायन करते मजदूर

हम पलायन कर रहें है, बड़े बड़े शहरों के अर्थव्यवस्था की हम अबतक रीढ़ हुआ करते थे, हमसे शहर गुलजार हुआ करता था, हम देश के बड़े बड़े शहरों को चलाते थे, वहां कमाते थे, परिवार का पेट भरता था लेकिन कोरोना की महामारी ने सबकुछ बंद कर दिया, जो शहर हमारी मेहनत के दम पर दौड़ता था आज उसी शहर से हम मजदूर भाई चलने के लिए मजबूर हो गए है। देश के हमारे मुखिया जो अपने आप को सेवक कहते है, कहां है उनका सेवाभाव, कहां है उनकी नीतियां, क्यों हमें कुछ आस नज़र नहीं आ रही है। हम मजदूर रोज कमाते है और रोज खाते है। क्यों नहीं हमारे लिए कुछ व्यवस्था नहीं की जा रही है।

20 लाख करोड़ में से मजदुर को कितना मिलेगा

हम तो ठहरे मजदूर, हमें क्या पता सरकार की आर्थिक नीतियां क्या होंगी। अरे साहब ये सब भारी भरकम शब्द मैं जानता नहीं बल्कि कुछ सूटबूट वाले बोलते रहते है तो मैं भी सुनकर समझने की जुगत में रहता हूँ। सुना है 20 लाख करोड़ रुपये सरकार ने हमारे लिए खर्च करने का प्लान बनाया है। भगवान जाने 20 लाख करोड़ कितना होता है और मेरे इस गरीब की झोली में कितना आएगा।
इन सब से बेपरवाह मैं बिना कुछ सोचे समझे निकल पड़ा हूँ अपने पैतृक गांव, बेपरवाह इस बात का कि मेरे पैरों में कितने छाले पड़ेंगे। बेपरवाह उन बातों से कि चलते चलते मेरा ये सफर कहीं आखिरी सफर ना बन जाए। इस बात से भी मैं बेपरवाह हूँ कि चल तो दिया हूँ लेकिन पहुंचने के बाद क्या मुझे रोज़गार मिलेगा। क्या मेरे परिवार का भरण पोषण होगा। सरकार इस दुःख की घडी में एक ओर कहती है कि सरकार साथ में है, दूसरी ओर कहती है कि आत्मनिर्भर बनो, सरकार हम आपके ऊपर निर्भर नहीं है यही कारण है कि हम अपनी राह खुद ही नाप लिए। आपके भरोसे नहीं बैठे।
ऐ सरकार मेरी तू परीक्षा मत ले मैं बहुत दुःखी हूँ, स्तब्ध हूँ, अचंभित हूँ, मेरे जिन्दा रहते तो तुझे मेरी क़द्र नहीं है, मरने के बाद क्यों दिखावा करता है। मेरे मजदूर भाई महाराष्ट्र से एमपी जीते जी नहीं जा पाए तो रेलवे की चपेट में आ गए और फिर मरने के बाद तू अफ़सोस जाहिर करते हुए शवों को हेलीकाप्टर से ले गया। रास्ते में चलते चलते मेरे भाईयों की मौत हो जा रही है, कई सड़क दुर्घटनाएं हो रही है। सरकार तेरी यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही है कि जीते जी मजदूरों की कोई कीमत नहीं समझी गई और मरने के बाद भी उनके साथ बदसलूकी, हद है ये। औरैया हादसे में मारे गए मजदूरों के शवों के साथ अमानवीयता किया है तुमने। औरैया सड़क हादसे के शिकार मजदूरों के शवों को ट्रकों में भरकर झारखंड भेजने की चेष्टा की है तुमने।

चुनावी माहौल में मजदूर देंगें सरकार को जवाब

ऐ सरकार कितनी परीक्षाएं तू लेगा हम मजदूरों का, हम मजबूर है, बेसहारा है, लेकिन वक़्त हमारा भी आएगा, दुःख की घड़ी जरूर है, बीत जायेगा ही। ये वक़्त तेरा है जब हम हाथ जोड़कर तेरे सामने गिड़गिड़ा रहें है, रहम की भीख़ मांग रहें है कि हम पर तरस खा, हमें सही सलामत अपने गांव पहुंचा। लेकिन तू एक नहीं सुन रहा है। मुझे यकीन है कि वो वक़्त फिर मेरे सामने आएगा जब तू मेरे कुटिया के सामने हाथ जोड़े खड़ा होगा और वोट की भीख़ मांगेगा। तब मैं हर एक पल का, हर एक लम्हों का, पलायन के दर्द का हिसाब चुकता करूँगा।