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वर्ल्ड फूड सेफ्टी डे – खेती छोड़ते किसान, कैसे होगी खाद्य सुरक्षा

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एक रोटी की कीमत एक भूखा ही समझ सकता है, गरीबी, भूख और भुखमरी ये भारत देश के लिए अभिशाप है, भारत जैसा प्रगतिशील देश जो ट्रिलियन इकॉनमी के सपने देख रहा है, भारत जैसा देश तो विश्व के सबसे ताकतवर देश अमेरिका को आईना दिखाता है, यहां ऐसी परिस्तिथि में अगर कोई भूख से मर रहा है तो ये किसी कलंक से कम नहीं है। रविवार 7 जून को वर्ल्ड फूड सेफ्टी डे, इस ख़ास मौके पर बात करते है खाद्य सुरक्षा की, किसानों की जो हमारे अन्नदाता है।

क्यों मनाया जाता है वर्ल्ड फूड सेफ्टी डे

7 जून को वर्ल्ड फूड सेफ्टी डे (World Food Safety Day) मनाया जा रहा है। इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nation) द्वारा दिसंबर 2018 में खाद्य और कृषि संगठन के सहयोग से अपनाया गया था। इसके बाद पहली बार साल 2019 में वर्ल्ड फूड सेफ्टी डे मनाया गया था। इस हिसाब से दुनिया 7 जून 2020 को दूसरी बार ‘वर्ल्ड फूड सेफ्टी डे’ मनाएगी। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य सुरक्षित फूड स्टैण्डर्ड को बनाए रखने के लिए जागरूकता पैदा करना और फूड रिलेटेड बीमारियों के कारण होने वाली मौतों को कम करना है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार जीवन को बनाए रखने और अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने की दिशा में पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित और पौष्टिक भोजन जरूरी है।
डब्ल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में लगभग 10 में से 1 लोग दूषित भोजन खाने के बाद बीमार पड़ जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषित लोगों की संख्या 19.07 करोड़ है। यह आंकड़ा दुनिया में सर्वाधिक है। देश में 15 से 49 वर्ष की 51.4 फीसदी महिलाओं में खून की कमी है। पांच वर्ष से कम उम्र के 38.4 फीसदी बच्चे अपनी आयु के मुताबिक कम लंबाई के हैं। इक्कीस फीसदी का वजन अत्यधिक कम है। भोजन की कमी से हुई बीमारियों से देश में सालाना तीन हजार बच्चे दम तोड़ देते हैं। जो कि यह एक बड़ा खतरा है।

वर्ल्ड फूड सेफ्टी डे – क्या है इस बार की थीम

कोरोना महामारी के संक्रमण को देखते हुए इस बार वर्ल्ड फूड सेफ्टी डे 2020 वर्चुअली मनाया जाएगा। साल 2019 में ‘वर्ल्ड फूड सेफ्टी डे’ की थीम ‘खाद्य सुरक्षा, सभी का व्यवसाय’ थी। संयुक्त राष्ट्र ने इस बार की थीम भी “Food safety, everyone’everyone’s business” ही है। खाद्य सुरक्षा संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है और सरकारों, उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच एक साझा जिम्मेदारी है। हमारे द्वारा उपभोग किए जाने वाले भोजन को सुरक्षित रखने के लिए खेत से लेकर खाने की टेबल तक हर किसी की भूमिका होती है। विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस के माध्यम से, डब्ल्यूएचओ सार्वजनिक एजेंडे में खाद्य सुरक्षा की मुख्यधारा में आने के लिए अपने प्रयासों का अनुसरण करता है और विश्व स्तर पर खाद्य जनित बीमारियों के बोझ को कम करता है।

खेती छोड़ते किसान, कैसे होगी फ़ूड सेफ्टी और सिक्योरिटी

भारत में अब भी सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले कृषि क्षेत्र की हालत बिगड़ते-बिगड़ते वहां पहुंच गई है जहां से न सिर्फ निकट भविष्य में देश की खाद्य सुरक्षा के लिए संकट दिखता है बल्कि एक बड़ी सामाजिक उथल-पुथल की आशंका भी नजर आती है। एक आकड़ों के मुताबिक हर दिन देश में लगभग 2000 किसान खेती छोड़ देते हैं और बहुत सारे किसान ऐसे हैं जो खेती छोड़ देना चाहते हैं। देश के किसी ना किसी हिस्से में किसानों को आए दिन सड़कों पर आंदोलन करने के लिए उतरना पड़ रहा है। देश में पिछले कई साल से हर साल हजारों किसान निराश होकर आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो गए हैं। देश के ग्रामीण क्षेत्रों की लगभग 60 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है। पिछले कई साल से ग्रामीण क्षेत्रों में खेती की मौजूदा स्थिति को लेकर एक खतरनाक आक्रोश पनप रहा है।
किसानी में लगातार बढ़ती लागत और नुकसान के बाद मानो किसान टूट सा जाता है। उच्च गुणवत्तायुक्त बीज सही दामों में किसान को उपलब्ध हो पाना एक बड़ी चुनौती रहती है। महंगे बिकने वाले पेस्टीसाईड भी बड़ी मुश्किल के किसान खरीद पाता है। खेतों में काम के लिए मजदूरों का मिलना भी एक बड़ी समस्या बन गई है। एकल परिवार होने के चलते अब छोटे किसानों को भी मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है। मनरेगा के चलते मजदूरी की दर भी बढ़ गई है। इस कारण खेती में आने वाली लागत काफी बढ़ गई है। कई अन्य कारणों के अलावा, परिवारों में बंटवारे के चलते भी पीढ़ी दर पीढ़ी खेती की जोत का आकार घटता जा रहा है। देश के लगभग 85% किसान परिवारों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है। इससे भी प्रति एकड़ खेती की लागत बढ़ जाती है। एक बार किसान कर्ज के चंगुल में फंसता है तो फिर बाहर निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है। विशेषकर वे किसान जो साहूकारों से बहुत ही ऊंची ब्याज दर पर ब्याज लेते हैं। किसानों की आत्महत्या में ना चुकाया जाने वाला बैंकों व साहूकारों का कर्ज एक बहुत महत्वपूर्ण कारण बनता है।
बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि, बाढ़, सूखा, चक्रवात आदि से फसलों के नुकसान की स्थिति में किसानों को तत्काल व समुचित राहत पहुंचाने में हमारे देश का तंत्र व व्यवस्था प्रभावी साबित नहीं हो पाई है।पिछले कई सालों से खेती करने की लागत जिस तेजी से बढ़ती जा रही है। उस अनुपात में किसानों को मिलने वाले फसलों के दाम बहुत ही कम बढ़े हैं। सरकार की हरसंभव कोशिश रहती है कि फसलों के दाम कम से कम रहें, जिससे मंहगाई काबू में रहे। लेकिन सरकार उसी अनुपात में फसलों को उपजाने में आने वाली लागत को कम नहीं कर पाती। इससे किसान बीच में पिस जाता है और देश की जनता को सस्ते में खाना उपलब्ध कराने की सारी जिम्मेदारी एक किसान के कंधों पर डाल दी जाती है। इसका परिणाम हम सब किसान पर कभी ना ख़त्म होने वाले बढ़ते कर्जे के रूप में देखते हैं।

फ़ूड सेफ्टी के साथ साथ फूड सिक्योरिटी एक राष्ट्रीय उद्देश्य

पूरे इतिहास में खाद्य सुरक्षा हमेशा से एक चिन्ता का विषय रहा है। साल 1974 में विश्व खाद्य सम्मेलन में ‘खाद्य सुरक्षा’ की परिभाषा दी गयी जिसमें खाद्य आपूर्ति पर बल दिया गया। स्वतंत्रता के बाद से आज तक सभी के लिए खाद्य सुरक्षा एक राष्ट्रीय उद्देश्य बन चुकी है। जहां पहले खाद्य सुरक्षा से तात्पर्य पेट भर रोटी उपलब्ध होने से था वहीं आज खाद्य सुरक्षा से आशय भौतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियों की पहुंच के अलावा संतुलित आहार, साफ पीने का पानी, स्वच्छ वातावरण और प्राथमिक स्वास्थ्य रखरखाव तक जा पहुंचा है।  भारत में फिलहाल वैश्विक उत्पादन की दृष्टि से लगभग 12 प्रतिशत गेहूं, 21 प्रतिशत चावल, 25 प्रतिशत दलहन, 10 प्रतिशत फल, 22 प्रतिशत गन्ना और 16 प्रतिशत दूध उत्पादित हो रहा है। यह सब मात्र 2.3 प्रतिशत भूमि, 4.2 प्रतिशत पानी और 11 प्रतिशत से थोड़ा अधिक कृषि भूमि से प्राप्त किया जा रहा है। इस कृषि भूमि में मात्र 50 प्रतिशत में सिंचाई सुविधा है। इन संसाधनों से विश्व की 18 प्रतिशत जनसंख्या का भरण-पोषण हो रहा है। भारत आज जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, उनमें से खाद्य सुरक्षा की चुनौती सबसे प्रमुख चुनौतियों में से एक है।

बिना खाये सड़ जाता है आधा अनाज

दुनिया में पैदा किए जाने वाले खाद्य पदार्थ में से करीब आधा हर साल बिना खाए सड़ जाता है। इंडियन इन्सटिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल एवं 21 टन सब्जियां वितरण प्रणाली में खामियों के चलते खराब हो जाती हैं। साथ ही उत्सव, समारोह, शादी−ब्याह आदि में बड़ी मात्रा में पका हुआ खाना ज्यादा बनाकर बर्बाद कर दिया जाता है।

हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रुपए का नुकसान होता है।

एक तरफ देश में भुखमरी है वहीं हर साल सरकार की लापरवाही से लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रुपए का नुकसान होता है। भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद कुपोषण लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। भूख के कारण कमजोरी के शिकार बच्चों में बीमारियों से ग्रस्त होने का खतरा लगातार बना रहता है। आज भारत विश्व भुखमरी सूचकांक में बेहद शर्मनाक पायदान पर खड़ा है तो इसके पीछे भ्रष्टाचार, योजनाओं के क्रियान्वयन में खामियां और गरीबों के प्रति राज्यतंत्र की संवेदनहीनता जैसे कारण ही प्रमुख है। गरीबी, भूख और कुपोषण से लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती है, जब तक कि इसके अभियान की निरंतर निगरानी नहीं की जाएगी।