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January 9, 2026

रूस की सड़कें बुहार रहे सॉफ्टवेयर इंजीनियर मुकेश मंडल- रूसी धरती पर प्रवासी भारतीयों का संघर्ष !

The CSR Journal Magazine

 

रूस के सेंट पीटर्सबर्ग शहर में 26 वर्षीय भारतीय मुकेश मंडल (Mukesh Mandal) इन दिनों असामान्य लेकिन चर्चा में आए हुए काम कर रहे हैं।  उन्होंने अपने सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पेशे को छोड़कर सड़क सफाईकर्मी के तौर पर नौकरी शुरू की है। मुकेश का यह कदम रूस में बढ़ती मजदूर कमी और बेहतर कमाई की तलाश का नतीजा है।

मुकेश मंडल का सफर: टेक नौकरी से सड़क सफाई तक

मुकेश का दावा है कि वह भारत में सॉफ्टवेयर डेवलपर रहे हैं और उन्होंने AI, चैटबॉट, GPT जैसी आधुनिक तकनीकों के साथ काम किया है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी टेक तकनीकों के साथ कार्य अनुभव हासिल किया है, हालांकि यह साफ नही है कि वे माइक्रोसॉफ्ट के सीधे कर्मचारी रहे हैं या उन प्रोजेक्ट्स पर काम करते थे जिनमें माइक्रोसॉफ्ट टेक्नोलॉजी इस्तेमाल होती थी। मुकेश ने रूसी मीडिया से बातचीत में बताया कि उन्होंने यह काम अस्थायी रूप से पैसा बचाने और अनुभव के लिए चुना है और उनकी योजना इस साल रूस में कुछ पैसे कमाकर फिर भारत लौटने की है।

रूस में मजदूरों की कमी और भारतीय कामगार

रूसी कंपनियों को पिछले कुछ समय से मजदूरों की गंभीर कमी का सामना करना पड़ रहा है। बेरोज़गारी दर कम और जनसंख्या में गिरावट के कारण कई छोटी-छोटी मजदूरी वाली नौकरियों के लिए स्थानीय लोग तैयार नहीं हो रहे हैं। ऐसे में रूस ने भारत समेत अन्य देशों से मजदूरों को आमंत्रित करना शुरू कर दिया है। मुकेश मंडल भी इसी श्रम संकट का हिस्सा हैं। “Kolomyazhskoye JSC” नामक एक रोड मेंटेनेंस कंपनी ने करीब 17 भारतीय श्रमिकों को रूस में नौकरी दी है, जिसमें मुकेश भी शामिल हैं। ये सभी श्रमिक सेंट पीटर्सबर्ग के सड़कों की सफाई कर रहे हैं।

वेतन और सुविधाएं

रूस में इस प्रकार के काम के लिए मजदूरों को जो वेतन मिल रहा है, वह कई भारतीय कॉर्पोरेट नौकरियों की तुलना में भी बेहतर है-
• महीने का वेतन: लगभग 1,00,000 रूबल से 1,10,000 रूबल (लगभग ₹1,00,000–₹1,10,000) प्रति माह।
• रुकने और खाने की सुविधा: कंपनी द्वारा फ्री आवास, खाना, डॉर्म से काम की जगह तक यात्रा और सुरक्षा उपकरण मुहैया कराया जाता है।

विविध पृष्ठभूमि वाले भारतीय मजदूर

इस समूह में सिर्फ टेक पेशेवर नहीं हैं। रिपोर्टों के अनुसार, इस दल में शामिल अन्य भारतीयों के पेशे भी काफी विविध हैं, जैसे कृषि से जुड़े लोग, ड्राइवर, आर्किटेक्ट, वेडिंग प्लानर और अन्य व्यवसायिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति !  ये सभी लोग बेहतर कमाई की तलाश में रूस आए हैं और सड़कों की सफाई जैसे काम करते हैं, जो वहां के स्थानीय लोगों के लिए अक्सर अप्रिय और कठिन माने जाते हैं। रूस-भारत के बीच लेबर मोबाइलिटी समझौते पर भी चर्चा चल रही है, जिससे भारतीय पेशेवरों को रूसी श्रम बाजार में आसान प्रवेश और अधिक अवसर मिल सकें।

प्रवासी भारतीय: दुनिया भर में फैला भारत का श्रम, प्रतिभा और पहचान

आज का भारत केवल अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं है। दुनिया के लगभग हर महाद्वीप में प्रवासी भारतीय (Indian Diaspora) अपनी मेहनत, कौशल और उद्यमशीलता के दम पर न सिर्फ रोज़गार पा रहे हैं, बल्कि कई देशों की अर्थव्यवस्था के अहम स्तंभ भी बन चुके हैं। रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में भारतीय युवाओं के सड़क सफाई जैसे काम करने की हालिया खबर ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि प्रवासी भारतीयों की यह तस्वीर कितनी व्यापक, विविध और जटिल है।

प्रवासी भारतीयों की संख्या और वैश्विक उपस्थिति

अनुमानों के अनुसार, दुनिया भर में करीब 3.5 करोड़ (35 मिलियन) से अधिक भारतीय मूल के लोग रहते हैं। यह समुदाय दो हिस्सों में बंटा माना जाता है-
NRI (Non-Resident Indian): भारतीय नागरिक जो अस्थायी या स्थायी रूप से विदेश में रह रहे हैं।
PIO (Person of Indian Origin): वे लोग जिनकी जड़ें भारत में हैं, लेकिन अब दूसरे देशों की नागरिकता ले चुके हैं।
सबसे अधिक प्रवासी भारतीय अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और मलेशिया में पाए जाते हैं। अब रूस, पूर्वी यूरोप और अफ्रीकी देशों में भी भारतीय कामगारों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है।

कौन-कौन से काम करते हैं प्रवासी भारतीय?

प्रवासी भारतीयों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी व्यावसायिक विविधता है।
उच्च कौशल वाले पेशे– IT प्रोफेशनल्स, डॉक्टर, नर्स और हेल्थ वर्कर्स, वैज्ञानिक, इंजीनियर, प्रोफेसर, फाइनेंस और मैनेजमेंट एक्सपर्ट्स!
मध्यम और श्रम आधारित काम– कंस्ट्रक्शन वर्कर, फैक्ट्री और मैन्युफैक्चरिंग कर्मचारी, ड्राइवर, क्लीनर, सिक्योरिटी गार्ड, होटल, रेस्टोरेंट और सर्विस सेक्टर!
रूस में भारतीयों का सड़क सफाई जैसे काम में उतरना इसी श्रम आधारित प्रवासन की एक नई कड़ी है, जहां स्थानीय मजदूरों की कमी के कारण विदेशी श्रमिकों को अवसर मिल रहे हैं।

रेमिटेंस: भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़

प्रवासी भारतीय सिर्फ विदेशों में काम नहीं करते, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करते हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस पाने वाला देश है। हर साल विदेशों में काम करने वाले भारतीय लाखों करोड़ रुपये भारत भेजते हैं। यह पैसा ग्रामीण अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान और छोटे व्यवसायों को सीधा सहारा देता है। खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय मजदूरों से लेकर अमेरिका के टेक प्रोफेशनल्स तक सभी का योगदान इस रेमिटेंस में शामिल है।

चुनौतियां और संघर्ष

हालांकि प्रवासी जीवन अवसरों से भरा होता है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं-
• भाषा और संस्कृति की समस्या,
• कानूनी स्थिति और वीज़ा नियमों की जटिलता,
• शारीरिक श्रम करने वालों के लिए कठिन कामकाजी हालात,
• कभी-कभी भेदभाव और सामाजिक अलगाव! रूस जैसे देशों में काम कर रहे भारतीय श्रमिकों के सामने मौसम, भाषा और सामाजिक दूरी बड़ी चुनौतियां हैं।

भारत सरकार की भूमिका

भारत सरकार प्रवासी भारतीयों को जोड़ने और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए कई कदम उठा रही है-
• प्रवासी भारतीय दिवस,
• ई-माइग्रेट पोर्टल,
• विदेशों में भारतीय दूतावासों के जरिए सहायता,
• खाड़ी देशों और अन्य राष्ट्रों से लेबर मोबिलिटी समझौते !
मुकेश मंडल की कहानी उस व्यापक प्रवासी श्रमिक संकट और अवसर दोनों की झलक देती है जो आज अंतरराष्ट्रीय मजदूर बाजार में देखने को मिल रहा है। तकनीकी पेशे से आने के बावजूद उन्होंने कठिन मैनुअल श्रम को चुना है, मुख्य रूप से बेहतर कमाई, अनुभव और भारत लौटने से पहले कुछ बचत करने के लक्ष्य के लिए ! यह रूसी श्रम बाज़ार में भारतीयों की बढ़ती भागीदारी का सिर्फ एक उदाहरण है।
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