वंदे मातरम अनिवार्य नहीं-कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ‘वंदे मातरम’ गाने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। अदालत ने गृह मंत्रालय के सर्कुलर के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस दिशा-निर्देश का पालन करना अनिवार्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय के एक सर्कुलर को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि सर्कुलर केवल एक ‘परामर्श’ (Advisory) है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गीत न गाने पर कोई कानूनी सजा या दंड का प्रावधान नहीं है, इसलिए इसे अनिवार्य नहीं माना जा सकता।
अदालत की टिप्पणियाँ
CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि याचिका समय से पहले दायर की गई है। इसमें किसी विशेष भेदभाव की आशंका जताई गई थी, लेकिन ये बातें अस्पष्ट पाई गई। इसके अनुसार, ‘वंदे मातरम’ न गाने पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। कोर्ट ने ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ (राष्ट्रगान) के समान कानूनी दर्जा देने वाली याचिकाओं को भी खारिज कर दिया है। कोर्ट के अनुसार, विधायिका (संसद) को कानून में बदलाव के लिए आदेश देना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में उल्लेख किया है कि अनुच्छेद 51A केवल राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान की बात करता है, ‘राष्ट्रीय गीत’ का इसमें स्पष्ट जिक्र नहीं है।
गृह मंत्रालय की एडवाइजरी
बेंच ने यह भी बताया कि गृह मंत्रालय की एडवाइजरी केवल एक प्रोटोकॉल है। इस संदर्भ में, कोर्ट ने कहा कि जब तक कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है, तब तक इस पर विचार नहीं किया जाएगा। यह दिशा-निर्देश केवल एक अनुशासनात्मक प्रक्रिया के रूप में हैं।
मामले का महत्व
इस मामले ने भारतीय समाज में वंदेमातरम की अनिवार्यता पर चर्चा को फिर से जन्म दिया है। कई लोग इसे राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक मानते हैं, जबकि कुछ इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन मानते हैं। ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय महत्वपूर्ण है। 1986 के ‘बिजोय इमैनुएल बनाम केरल राज्य’ मामले का हवाला देते हुए अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि किसी को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत गाने के लिए मजबूर करना उसकी मौलिक स्वतंत्रता का उल्लंघन हो सकता है, बशर्ते वह उसका अपमान न करे और सम्मान में खड़ा हो।
भारत के विभिन्न राज्यों में ‘वंदे मातरम’ गाने को लेकर अलग-अलग नियम और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरे देश के लिए अनिवार्य नहीं किया है, लेकिन राज्य सरकारों और हाई कोर्ट्स ने अपने स्तर पर इसे लागू करने के प्रयास किए हैं-
उत्तर प्रदेश: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नवंबर 2025 में घोषणा की कि राज्य के सभी शैक्षणिक संस्थानों (स्कूलों और कॉलेजों) में ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य (Mandatory) किया जाएगा। इस निर्देश का उद्देश्य छात्रों में राष्ट्रभक्ति और अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान की भावना जगाना है।
महाराष्ट्र: अक्टूबर 2025 में महाराष्ट्र सरकार ने गीत की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में सभी स्कूलों को 31 अक्टूबर से 7 नवंबर तक पूरा गीत (सभी 6 अंतरे) गाने का निर्देश दिया था। इससे पहले 2017 में भी महाराष्ट्र विधानसभा में नगर निगम के स्कूलों में इसे अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव लाया गया था।
तमिलनाडु: 2017 में मद्रास हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश में कहा था कि ‘वंदे मातरम’ सभी स्कूलों और कॉलेजों में हफ्ते में कम से कम एक बार और सरकारी कार्यालयों या निजी कंपनियों में महीने में एक बार गाया जाना चाहिए। हालांकि, बाद में स्पष्ट किया गया कि यदि किसी को इसे गाने में वास्तविक समस्या है, तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता।
मध्य प्रदेश और हरियाणा: मध्य प्रदेश में सरकारी कार्यालयों में महीने की पहली तारीख को वंदे मातरम गाने की पुरानी परंपरा रही है। हरियाणा सरकार ने भी 2017 में इसे सुबह की प्रार्थना का हिस्सा बनाने का निर्देश दिया है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने ‘वंदे मातरम’ के लिएनए प्रोटोकॉल जारी किए हैं। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार, आधिकारिक आयोजनों और स्कूलों में अब गीत के सभी 6 अंतरे (Stanzas) गाना अनिवार्य होगा, जिसकी अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड है। इसके साथ ही, गीत बजने या गाए जाने के दौरान सम्मान में खड़े होना (Stand to attention) आवश्यक कर दिया गया है

