Sharad Purnima Banke Bihari Darshan: भक्तों का सालभर का इंतजार, जानें ठाकुरजी के इस दुर्लभ स्वरूप का रहस्य

The CSR Journal Magazine
25 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाएगा, जब देशभर में भक्तों की भारी भीड़ वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में जुटेगी। हर साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस पर्व को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। भागवत पुराण के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना के किनारे गोपियों के साथ महारास रचाया था, इसलिए इसे रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

बांके बिहारी का विशेष स्वरूप

शरद पूर्णिमा के अवसर पर बांके बिहारी एक खास स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। भक्त सालभर इस अद्भुत रूप का इंतजार करते हैं। इस दिन ठाकुरजी महारास की मुद्रा में दर्शन देते हैं, जिसमें वे मोर-मुकुट और बांसुरी धारण करते हैं। भक्तों के लिए यह दृश्य बेहद आकर्षक होता है। ठाकुरजी इस दिन सफेद जड़ाऊ पोशाक पहनकर चांदी के सिंहासन पर विराजमान होते हैं।

चांदनी रात का जादू

शरद पूर्णिमा की रात जब चंद्रमा की धवल चांदनी ठाकुरजी के ऊपर पड़ती है, तब उनका स्वरूप और भी अलौकिक हो जाता है। भक्तों के जयकारे मंदिर परिसर में गूंजने लगते हैं। इस खास मौके पर भक्तों को खीर और चंद्रकला का भोग अर्पित किया जाता है, जो इस पर्व की विशेषता है।

सप्त निधि के दर्शन

बांके बिहारी के अलावा, वृंदावन में सप्त निधि के अन्य मंदिरों में भी ठाकुरजी भक्तों को सफेद रंग की पोशाक में दर्शन देंगे। इनमें श्री राधा मदन मोहनजी, श्री गोविंद देवजी, और श्री राधा गोपीनाथजी जैसे प्रसिद्ध मंदिर शामिल हैं। इन मंदिरों में भी शरद पूर्णिमा के अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

खीर का महत्व

खीर बनाने और देवी-देवताओं को अर्पित करने की प्रथा शरद पूर्णिमा पर बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में इस प्रथा का उल्लेख है। खीर को समृद्धि और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। इसे अर्पित करने से परिवार में सुख-समृद्धि का संचार होता है। इस दिन माता लक्ष्मी का प्राकट्य उत्सव भी मनाया जाता है, और खीर माता लक्ष्मी की प्रिय भोग होती है।

खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होता है, और उसकी किरणों में अमृत की वर्षा होती है। इस रात खुले आसमान के नीचे खीर रखने से उसमें दिव्य और अमृत तुल्य गुण समाहित हो जाते हैं। यह परंपरा भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है, क्योंकि इसे समृद्धि और सुख का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक आस्था का प्रतीक

शरद पूर्णिमा का पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह भक्तों की आस्था और विश्वास का प्रतीक है। इस दिन बांके बिहारी के दर्शन के लिए भक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। ठाकुरजी के इस विशेष स्वरूप को देखने के लिए भक्त सालभर इंतजार करते हैं, और जब यह अवसर आता है, तो भक्तों की खुशी का ठिकाना नहीं रहता।

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