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November 29, 2025

फ़िलिस्तीन लड़ रहा न्याय, पहचान और आज़ादी की लड़ाई- पीड़ा, प्रतिरोध और विश्व एकजुटता की दास्तान

The CSR Journal Magazine

 

International Day Of Solidarity With Palestinian People– फ़िलिस्तीन- एक ऐसी भूमि, जिसे धरती का सबसे पुराना सांस्कृतिक चौराहा कहा जाता है, आज विश्व के सबसे लंबे और दर्दनाक संघर्षों का केंद्र बन चुकी है। यह केवल राजनीतिक विवाद, सीमाओं या शासन का मुद्दा नहीं है, यह मनुष्यता, घरों, सपनों और अधिकारों की लड़ाई है। हर बीतता दिन हजारों परिवारों को और अधिक टूटते हुए देखता है, और पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ा नैतिक प्रश्न खड़ा करता है- क्या हम एक पूरे समुदाय की पीड़ा को अनदेखा कर सकते हैं?

फ़िलिस्तीन- खून के आंसू रो रही धरती !

फ़िलिस्तीन के प्रति एकजुटता दिवस- अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला वह क्षण है जब दुनिया इस संघर्ष को याद करती है, उसकी जड़ों को समझती है और फ़िलिस्तीनी लोगों के लिए न्याय की मांग करती है। लेकिन फ़िलिस्तीन का दुख केवल एक दिन का विषय नहीं, यह सात दशकों से अधिक समय से जारी एक त्रासदी है, जिसकी हर परत में इतिहास और मानवाधिकारों की अनगिनत चीखें छिपी हैं।

फ़िलिस्तीन की समस्या की शुरुआत- वह मोड़ जिसने इतिहास बदल दिया

फ़िलिस्तीन का संघर्ष अचानक नहीं शुरू हुआ। इसकी जड़ें सैकड़ों वर्षों के इतिहास, उपनिवेशवाद की राजनीति और मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक रणनीतियों में गहराई तक धंसी हैं।

उस्मानी साम्राज्य और प्रथम विश्व युद्ध

19वीं सदी के अंत तक फ़िलिस्तीन उस्मानी (ऑटोमन) शासन के अंतर्गत शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व वाली भूमि थी। मुस्लिम, ईसाई और यहूदी समुदाय यहां पीढ़ियों से रहते आए थे। लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया।

बैलफोर घोषणा- 1917 : संघर्ष का जन्म

ब्रिटेन की बैलफोर घोषणा ने फ़िलिस्तीन में “यहूदी राष्ट्रीय गृह” का वादा किया, लेकिन इसके साथ ही अरब फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों को अस्पष्ट छोड़ दिया गया।यह वही बिंदु था जहां अरब-यहूदी तनाव की बीज बोए गए।

बड़े पैमाने पर विस्थापन : 1948 की ‘नकबा’

1948 में इज़राइल राष्ट्र की स्थापना के समय लगभग 7.5 लाख फ़िलिस्तीनियों को अपने घरों से उखाड़ दिया गया। इस त्रासदी को “नकबा”, यानी “महाविनाश” कहा जाता है। सैकड़ों गांव नष्ट कर दिए गए, और लाखों लोग शरणार्थी बन गए।

1967 का युद्ध और कब्ज़ा

1967 के छह-दिवसीय युद्ध के बाद इज़राइल ने वेस्ट बैंक, गाज़ा पट्टी, पूर्वी यरूशलम पर कब्ज़ा कर लिया। यही आज की समस्या का सबसे बड़ा कारण है- क्षेत्रों पर लगातार सैन्य कब्ज़ा, बस्तियों का विस्तार और फ़िलिस्तीनियों की आवाजाही पर प्रतिबंध!

फ़िलिस्तीनी समस्या की मूल वजहें- जमीन और बस्तियों पर कब्ज़ा

इज़राइली बस्तियां वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम में लगातार बढ़ रही हैं। ये बस्तियां अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार अवैध मानी जाती हैं, फिर भी विस्तार जारी है। हर नई बस्ती फ़िलिस्तीनी जीवन-क्षेत्र को और संकुचित कर देती है।
स्वतंत्र राष्ट्र ना बन पाना– संयुक्त राष्ट्र, अरब देशों और कई देशों की कोशिशों के बावजूद फ़िलिस्तीन आज भी एक पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र नहीं बन सका है। उनके पास अपनी सीमाओं, संसाधनों और सुरक्षा पर संप्रभु नियंत्रण नहीं है।

गाज़ा की नाकाबंदी

2007 से गाज़ा, जहां 20 लाख से अधिक लोग रहते हैं, लगातार नाकेबंदी में है। यह दुनिया की सबसे बड़ी “ओपन-एयर जेल” कहलाई जाती है। यहां बिजली सीमित, पानी सीमित, दवाइयां सीमित, यहां तक कि आवागमन पर भी कठोर नियंत्रण है। लोगों के पास सामान्य जीवन की बुनियादी सुविधाएं तक नहीं।

लगातार ज़ारी हिंसा और युद्ध

हर कुछ साल में गाज़ा पर बड़े सैन्य अभियान– इससे हजारों मौतें, लाखों घरों का विनाश होता है। स्कूल, अस्पताल, मस्जिदें, चर्च सब मलबे में बदल जाते हैं। पीढ़ियों से बच्चे मलबों के बीच बड़े हो रहे हैं।
शरणार्थी संकट– आज लगभग 60 लाख फ़िलिस्तीनी शरणार्थी दुनिया भर में बिखरे हुए हैं। उनका “वापसी का अधिकार” अब तक पूरा नहीं हुआ।

वर्तमान स्थिति : एक मानवीय संकट, जहां आंसू भी सूख चुके हैं

गाज़ा आज धरती पर नरक की तस्वीर बन चुका है। हालिया संघर्षों ने गाज़ा को लगभग रहने योग्य नहीं छोड़ा। हजारों नागरिक मारे गए, लाखों बच्चे अनाथ हो गए। सैकड़ों परिवार पूरी तरह मिट गए। अस्पताल ढह चुके, इमरजेंसी वार्डों में दवाइयां खत्म हो चुकी हैं। पत्रकारों और डॉक्टरों की मौतों की तो गणना ही नहीं है। यह इतिहास की सबसे भयावह मानवीय परिस्थितियों में से एक है।

वेस्ट बैंक: डर और गिरफ्तारी का जीवन, बच्चों पर सबसे अधिक असर

वेस्ट बैंक में छापे, गिरफ्तारियां, चेकपोस्ट, बस्तियों का विस्तार, रोज़ाना की झड़पें एक सामान्य बात बन चुकी हैं। फ़िलिस्तीन की अर्थव्यवस्था लगातार गिर रही है। बेरोज़गारी, गरीबी और घुटन भरी जीवनशैली ने पूरी पीढ़ी को अंधकार में धकेल दिया है। UNICEF के अनुसार, फ़िलिस्तीन दुनिया का वह क्षेत्र है जहां बच्चे सबसे अधिक मानसिक व शारीरिक आघात झेल रहे हैं। हर बच्चा अपने बचपन से पहले युद्ध देखता है।

दुनिया भर में उठी फ़िलिस्तीन के समर्थन में आवाज

संयुक्त राष्ट्र ने दशकों में संघर्ष विराम, कब्ज़ा समापन, बस्तियां रोकने और फ़िलिस्तीन को राष्ट्र मान्यता देने जैसे अनेक प्रस्ताव पारित किए हैं। यद्यपि कई प्रस्ताव लागू नहीं हो सके, फिर भी यह वैश्विक समर्थन का बड़ा संकेत हैं।

अंतरराष्ट्रीय सहायता

गाज़ा और वेस्ट बैंक में खाद्य सहायता, मेडिकल सहायता, पुनर्निर्माण सहयोग का कार्य जारी है। कई देश, संस्थाएं और स्वयंसेवी संगठन लगातार मदद भेज रहे हैं। कई एशियाई, अफ्रीकी और लातिन अमेरिकी देशों ने फ़िलिस्तीन को आधिकारिक राष्ट्र के रूप में मान्यता दी है। यूरोप के कुछ देशों ने हाल के वर्षों में फ़िलिस्तीन की मान्यता पर निर्णायक कदम उठाए हैं।

जनता द्वारा वैश्विक आंदोलन

दुनिया भर में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। न्यूयॉर्क, लंदन, पेरिस, केप टाउन, सिडनी, दिल्ली, इस्तांबुल हर जगह हजारों लोगों ने फ़िलिस्तीन के लिए जन-आंदोलन किए हैं। ये आंदोलन इतिहास के सबसे बड़े शांति प्रदर्शनों में से एक बन चुके हैं।

सोशल मीडिया पर अभियान

#FreePalestine

#StandWithPalestine
#CeasefireNow
जैसे हैशटैग वैश्विक आंदोलन बन चुके हैं। लाखों वीडियो, पोस्ट और रिपोर्टों ने इस मुद्दे को दुनिया के सामने मजबूती से रखा है। दुनिया भर के लेखक, फ़िल्मकार, पत्रकार, छात्र, प्रोफेसर, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने फ़िलिस्तीन के समर्थन में आवाज उठाई है।

फ़िलिस्तीनियों का जीवन : खंडहरों में भी उम्मीद

हालांकि फ़िलिस्तीन पर मलबा छाया हुआ है, लेकिन वहां के लोग अब भी आशा की लौ जलाए हुए हैं।बमबारी में स्कूल नष्ट होने के बावजूद अधिकतर माता-पिता शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार मानते हैं। बच्चे मलबों के बीच बैठकर पढ़ते हुए देखे जाते हैं।कला, कविता और संस्कृति को ज़िंदा रखने की कोशिश में  फ़िलिस्तीनी कढ़ाई (embroidery), लोकगीत, कविता, सब कुछ संघर्ष और उम्मीद को आवाज देते हैं।

महिलाएं और युवा: संघर्ष की रीढ़

फ़िलिस्तीनी महिलाएं अस्पतालों में, राहत कैंपों में, घरों की पुनर्बहाली और बच्चों की सुरक्षा में, हर जगह मुख्य भूमिका निभाती हैं। युवाओं की आवाज दुनिया भर के लोगों तक पहुंच चुकी है। वे सोशल मीडिया के माध्यम से अपने जीवन की सच्चाई साझा कर रहे हैं।

समाधान का रास्ता : दुनिया की नैतिक जिम्मेदारी

फ़िलिस्तीन का संघर्ष केवल स्थानीय नहीं, यह वैश्विक न्याय का प्रश्न है। दुनिया के सामने आज यह बिंदु स्पष्ट है कि स्थायी शांति के लिए जरूरी है –
कब्ज़े का अंत- फ़िलिस्तीनियों को अपनी जमीन पर अधिकार लौटाना होगा।
दो राष्ट्र समाधान या न्यायसंगत राजनीतिक व्यवस्था– फ़िलिस्तीन को एक संप्रभु, पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देना।
गाज़ा की नाकेबंदी का अंत– लोगों को सामान्य जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान– बस्तियों का विस्तार तुरंत रुकना चाहिए।
मानवीय सहायता की स्वतंत्र पहुंच– अस्पताल, पानी, दवाइयां, यह सब युद्ध का हथियार नहीं होना चाहिए।
शरणार्थियों की वापसी का अधिकार– दशकों से विस्थापित फ़िलिस्तीनियों के लिए स्थायी समाधान आवश्यक है।

फ़िलिस्तीन केवल एक संघर्ष नहीं, बल्कि एक मानव गाथा

फ़िलिस्तीन की कहानी केवल राजनीति, सीमाओं और संघर्ष की नहीं! यह खोए घरों, टूटी मांओं, अनाथ बच्चों और मलबों के बीच जन्म लेते सपनों की कहानी है। यह दुनिया से एक ही विनती करती है- ‘खामोश मत रहिए, हमारे लिए बोलिए!’
दुनिया भर में उठती एकजुटता की आवाजें यह साबित करती हैं कि मानवता अभी मरी नहीं है। लाखों लोग, चाहे वे किसी भी देश, धर्म या भाषा के हों, फ़िलिस्तीन की पीड़ा को समझ रहे हैं और न्याय की मांग कर रहे हैं और यही उम्मीद की सबसे बड़ी किरण है। फ़िलिस्तीन आज भी खड़ा है, क्योंकि उसके लोगों ने कभी हार नहीं मानी! और अब दुनिया भी उनके साथ खड़ी है।
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