बिहार में शिक्षा और सुशासन के दावों के बीच, गया जिले के बकसू बिगहा गांव में 1998 से खुले आसमान और मंदिर परिसर में पढ़ने को मजबूर हैं कक्षा 1 से 5 तक के बच्चे!
बिहार में शिक्षा व्यवस्था को सुधारने और आधुनिक बनाने के सरकारी दावों के बीच गया जिले से एक चौंकाने वाली और बेहद संवेदनशील तस्वीर सामने आई है। गया–बोधगया मुख्य मार्ग के किनारे स्थित बकसू बिगहा गांव में एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय पिछले 28 वर्षों से बिना भवन, बिना कक्षाओं और बिना बुनियादी सुविधाओं के मंदिर परिसर में संचालित हो रहा है। यह विद्यालय बकसू बिगहा प्राथमिक विद्यालय, वर्ष 1998 से आज तक अपनी खुद की इमारत का इंतजार कर रहा है। यहां पढ़ने वाले बच्चे कक्षा 1 से 5 तक के हैं, जो हर दिन खुले आसमान के नीचे, जमीन पर बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
विद्यालय में वर्तमान में 94 नामांकित छात्र और 5 शिक्षक हैं, लेकिन हालात ऐसे हैं कि न तो कक्षाएं हैं, न बेंच-डेस्क, न ब्लैकबोर्ड और न ही शौचालय। बच्चे मंदिर के आंगन या पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ते हैं। तेज धूप, कड़ाके की ठंड और बरसात- हर मौसम में पढ़ाई किसी चुनौती से कम नहीं! पीने का पानी मंदिर परिसर में लगे एक हैंडपंप से लिया जाता है। शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है। यदि किसी बच्चे को शौच जाना हो, तो उसे घर भेज दिया जाता है। शिक्षकों के अनुसार, इससे पढ़ाई बाधित होती है और बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता बनी रहती है।
सड़क किनारे पढ़ाई, हर पल खतरे की आशंका
विद्यालय का संचालन जिस मंदिर परिसर में हो रहा है, वह गया–बोधगया व्यस्त सड़क के बिल्कुल पास है। सड़क से उड़ती धूल, लगातार गुजरते वाहन और भीड़-भाड़ बच्चों के लिए खतरा बनकर सामने आती है। शिक्षक बताते हैं कि जब बच्चे शौच के लिए घर जाते हैं, तो उन्हें हर पल यह डर सताता है कि कहीं कोई बच्चा सड़क पार करते समय हादसे का शिकार न हो जाए।
शिक्षकों की गुहार, प्रशासन की चुप्पी
विद्यालय के प्रधानाध्यापक मुकेश कुमार सिंह का कहना है कि यह स्थिति वर्षों से जस की तस बनी हुई है। उन्होंने बताया, “कक्षाएं चलाना बेहद मुश्किल हो जाता है। पहले भी यहां तैनात शिक्षकों ने वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित आवेदन दिए थे, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।” उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा, “जब बच्चों को जमीन पर बैठाकर पढ़ाना पड़ रहा है, तो स्मार्ट क्लास की बात कैसे की जा सकती है? फर्नीचर और स्वच्छता की कमी न केवल बच्चों के स्वास्थ्य पर असर डालती है, बल्कि उनकी गरिमा और आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचाती है।
हर मौसम में पढ़ाई, पूजा में भी बाधा
छात्रों ने बताया कि गर्मियों में तेज धूप में बाहर बैठकर पढ़ना पड़ता है, जबकि बारिश के समय मंदिर के भीतर शरण लेनी पड़ती है। एक छात्र ने कहा, “जब मंदिर में पूजा होती है, तो पढ़ाई और मिड-डे मील खाने में भी दिक्कत होती है। हम सब जमीन पर बैठकर पढ़ते हैं। सरकार से बस यही मांग है कि हमें एक स्कूल भवन दे दिया जाए।” अन्य बच्चों ने भी इसी तरह की परेशानियां साझा कीं। इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति अच्छी बनी हुई है। यह इस बात का संकेत है कि गांव के माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर कितने संकल्पित हैं, भले ही सुविधाएं लगभग न के बराबर हों।
28 साल से जारी सरकारी उदासीनता
गया के जिला शिक्षा पदाधिकारी कृष्ण मुरारी गुप्ता ने इस मामले पर कोई टिप्पणी करने या जानकारी देने से इनकार कर दिया है। हैरानी की बात यह है कि बीते 28 वर्षों में न जाने कितने अधिकारी और जनप्रतिनिधि रोजाना उसी गया–बोधगया सड़क से गुजरे, लेकिन यह विद्यालय अब तक उनकी नजरों से ओझल रहा।
इंतजार जारी है…
आज भी 94 बच्चे मंदिर के आंगन में बैठकर पढ़ रहे हैं- एक ऐसे स्कूल भवन का इंतजार करते हुए, जो उन्हें पिछले लगभग तीन दशकों से नहीं मिल पाया। यह सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करने वाला गंभीर सवाल है।
मंदिर में पढ़ाई और व्यवस्था की विफलता
गया जिले के बकसू बिगहा गांव का प्राथमिक विद्यालय किसी एक गांव की बदहाली की कहानी नहीं, बल्कि बिहार की सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर लगा एक गहरा और असहज प्रश्नचिह्न है। वर्ष 1998 से मंदिर परिसर में संचालित यह विद्यालय आज भी बिना भवन, बिना कक्षाओं, बिना बेंच-डेस्क और बिना शौचालय के चल रहा है। यह स्थिति तब और अधिक विडंबनापूर्ण हो जाती है, जब सरकारें ‘स्मार्ट क्लास’, डिजिटल शिक्षा और गुणवत्ता सुधार के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं। शिक्षा का अधिकार कानून बच्चों को सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक वातावरण में पढ़ाई का अधिकार देता है। ऐसे में खुले आंगन में, सड़क किनारे, धूल-धुएं और मौसम की मार झेलते हुए पढ़ने को मजबूर बच्चे न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी प्रभावित हो रहे हैं। शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव खासकर छोटी उम्र के बच्चों और बालिकाओं के लिए गंभीर समस्या है, जो स्कूल छोड़ने की आशंका भी बढ़ाता है।
28 वर्षों से अनदेखा कैसे रह गया ?
यह भी सवाल उठता है कि 28 वर्षों में दर्जनों अधिकारी, जनप्रतिनिधि और शिक्षा विभाग के निरीक्षण तंत्र इस विद्यालय की दुर्दशा को क्यों नहीं देख पाए, या देखकर भी अनदेखा करते रहे। जब शिक्षक बार-बार आवेदन देते रहे और फिर भी कोई सुनवाई नहीं हुई, तो यह प्रशासनिक उदासीनता नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इतनी विषम परिस्थितियों के बावजूद बच्चे और उनके अभिभावक शिक्षा से जुड़े हुए हैं। यह उनकी उम्मीद और विश्वास को दर्शाता है, लेकिन साथ ही यह जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन पर डालता है कि वे इस भरोसे को टूटने न दें।
शिक्षा- बच्चों का संवैधानिक अधिकार
अब समय है कि बकसू बिगहा प्राथमिक विद्यालय को सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि चेतावनी माना जाए। शिक्षा सुधार के दावे तब तक खोखले रहेंगे, जब तक देश के बच्चे मंदिरों और खुले मैदानों में बैठकर पढ़ने को मजबूर रहेंगे। एक पक्के स्कूल भवन, शौचालय, फर्नीचर और सुरक्षित वातावरण की व्यवस्था कोई विशेष मांग नहीं, बल्कि बच्चों का संवैधानिक अधिकार है। इस अधिकार को 28 साल तक टालना, भविष्य के साथ अन्याय है।
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