Home हिन्दी फ़ोरम अपनों को अपनों से ही नहीं, बल्कि सीएसआर से समाज को भी...

अपनों को अपनों से ही नहीं, बल्कि सीएसआर से समाज को भी जोड़ती है कोंकण रेलवे 

25
0
SHARE
 
भारतीय रेल, अपनों को अपनों से जोड़ने का सबसे बेहतर जरिया, सीएसआर के कामों को लेकर भारतीय रेल भी अग्रणी है, खासकर अगर हम कोंकण रेलवे की बात करें तो इन दिनों कोंकण रेलवे सीएसआर कामों को लेकर बड़ी तत्परता दिखा रहा है। सीएसआर की जहां बात आती है वहां बड़े बड़े कॉर्पोरेट कंपनियों के नाम सबसे पहले जहन में आते है, लेकिन सीएसआर को लेकर सरकारी कंपनियां भी पीछे नहीं है। समाज के उत्थान में बड़े पैमाने पर पीएसयू भी सामने आ रहे है, चाहे वो आयल कंपनियां हो या रेलवे, बड़े पैमाने पर सीएसआर को लेकर काम हो रहा है।

कोंकण रेलवे शिक्षा, पर्यावरण और ग्रीन एनर्जी पर करती है काम

रेलवे की बात करें तो रेलवे में कॉर्पोरेट कंपनियां सीएसआर का काम करती है, चाहे तो यात्रियों की सुविधाओं की बात हो या फिर कोई अन्य काम सीएसआर का फंड इस्तेमाल कर भारतीय रेलवे स्‍टेशनों पर वाई-फाई सुविधा, स्टेशनों पर शौचालय, स्टील बैंच, स्वच्छता अभियान जैसे उपक्रम चलाती है। लेकिन बात करें कोंकण रेलवे की तो चूँकि ये एक भारत सरकार का उपक्रम है इसलिए कोंकण रेलवे खुद सीएसआर फंड निकालकर महाराष्ट्र के कोंकण बेल्ट में काम कर रही है। कोंकण रेलवे शिक्षा, पर्यावरण और ग्रीन एनर्जी पर काम करती है। The CSR Journal से बात करते हुए कोंकण रेलवे के पब्लिक रिलेशन के डिप्टी जनरल मैनेजर गिरीश करंदीकर ने बताया कि “कोंकण रेलवे को 101 करोड़ का फायदा हुआ है, कोंकण रेलवे पीएसयू होने के नाते सीएसआर कानून के तहत उनकी सामाजिक जिम्मेदारी है जिसे कोंकण रेलवे बखूबी निभा रही है”।

सीएसआर से समाज को भी जोड़ती है कोंकण रेलवे

लाखों करोड़ों यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने के साथ साथ कोंकण रेलवे महाराष्ट्र के समुंदरी किनारे बसे इलाकों में बड़े पैमाने पर सीएसआर का काम कर रही है, महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के आदिवासी इलाकों के पढ़ने वाले 460 बच्चों को सोलर हीटर द्वारा गर्म पानी मुहैया कराती है, सर्द भरे इस सीजन में बच्चों के पर्सनल हाइजीन को देखते हुए आदिवासी स्कूलों में कोंकण रेलवे ने सोलर हीटर लगाया है। कोंकण रेलवे द्वारा सीएसआर के तहत कंप्यूटर लिट्रेसी अभियान भी चलाया जाता है जहां एक वैन में सुसज्जित कंप्यूटर लैब है, ये वैन ग्रामीण और दुर्गम इलाकों में जाकर अबतक 21 हज़ार बच्चों को कंप्यूटर सिखाया है। इतना ही नहीं कोंकण रेलवे टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के साथ मिलकर गरीब और जरूरतमंद कैंसर मरीजों के लिए भी काम करता है।

आईये जानते है कोंकण रेलवे का इतिहास

कोंकण रेलवे भारतीय रेलवे के इतिहास में मील का पत्थर है जो कि महाराष्ट्र के रोहा से शुरू होकर कर्नाटक के थोकुर तक जाती है, कोंकण रेलवे देश की ऐसी रेलवे लाइन है जो पश्चिमी घाट में अरब सागर के समानांतर चलती है, अपने पूरे सफर के दौरान यह कई नदियों, पहाड़ों और अरब सागर को पार करते हुए गुजरती है, ये दुर्गम इलाके ही वो कारण थे जिन्होंने इस रेलवे लाइन के निर्माण को लगभग नामुमकिन सा बना दिया था, इस रेल रूट पर लगभग 2 हजार पुल और 92 सुरंगे बनाई गई हैं।