ईरान में जारी राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन अब दो हफ्तों से अधिक समय से चल रहे हैं. इन प्रदर्शनों को लेकर पश्चिमी देशों ने जहां ईरानी सरकार की आलोचना की है, वहीं रूस, चीन और इसराइल की मीडिया में इन्हें अलग-अलग राजनीतिक, रणनीतिक और वैचारिक चश्मे से देखा जा रहा है. इन देशों की मीडिया कवरेज वैश्विक शक्ति संतुलन और हितों को भी उजागर करती है.
इसराइली मीडिया उत्सुकता के साथ सतर्कता
ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों को इसराइली मीडिया में दिलचस्पी और सतर्कता के मिश्रण के साथ देखा जा रहा है. बीबीसी मॉनिटरिंग के अनुसार, दक्षिणपंथी अख़बार इसराइल हायोम और चैनल 12 न्यूज़ ने ईरान को “उबाल के बिंदु” पर बताया है.
चैनल 12 ने प्रदर्शनों की तीव्रता को ईरान के आख़िरी शाह के बेटे रज़ा पहलवी की अपील से जोड़ा. चैनल के सैन्य संवाददाता निर ड्वोरी ने दावा किया कि इसराइली सेना ने ईरान में “असाधारण गतिविधि” देखी है, जिसे आईआरजीसी के सैन्य अभ्यास से जोड़ा गया.
हालांकि, इसराइल में कई सैन्य और सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि किसी भी तरह की जल्दबाज़ी ‘ग़लत आकलन’ को जन्म दे सकती है. पूर्व सैन्य ख़ुफ़िया प्रमुख तामीर हायमन ने कहा कि इस समय ईरान पर बाहरी ख़तरा दिखाना हालात को और बिगाड़ सकता है, इसलिए घटनाओं को अंदर से विकसित होने देना बेहतर होगा.

चीन की मीडिया सीमित कवरेज और रणनीतिक दूरी
चीन की सरकारी मीडिया ने ईरान के विरोध प्रदर्शनों को लगभग नज़रअंदाज़ किया है. प्रमुख चीनी टीवी समाचार कार्यक्रमों में इन प्रदर्शनों की कोई खास चर्चा नहीं हुई. यहां तक कि विदेश मंत्रालय की एकमात्र आधिकारिक टिप्पणी भी बाद में वेबसाइट से हटा दी गई.
5 जनवरी को चीनी विदेश मंत्रालय ने केवल इतना कहा कि वह ईरान में “राष्ट्रीय स्थिरता” की कामना करता है. यह रुख़ चीन की उस नीति को दर्शाता है, जिसमें वह मित्र देशों के आंतरिक मामलों में खुलकर टिप्पणी से बचता है.
हालांकि, सोशल मीडिया और ब्लॉग्स में कुछ चीनी लेखकों ने अमेरिका पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया और कहा कि ईरान का भविष्य चाहे जो हो, आम ईरानी नागरिकों के लिए हालात आसान नहीं होंगे. कुछ ब्लॉग्स में साफ़ लिखा गया कि चीन को किसी भी स्थिति में ईरान की मदद के लिए आगे नहीं आना चाहिए.

रूसी मीडिया नियंत्रण और अमेरिकी विरोधी नैरेटिव
रूस की सरकारी मीडिया ने भी ईरान के विरोध प्रदर्शनों को सीमित महत्व दिया है. आरटी और तास जैसी एजेंसियों ने इन्हें महंगाई, मुद्रा अवमूल्यन और आर्थिक असंतोष से जोड़ा, लेकिन अक्सर सरकार के शब्दों में इन्हें दंगा कहा गया.
मुख्यधारा से इतर, रूसी सोशल मीडिया और टेलीग्राम चैनलों पर अमेरिकी विरोधी नैरेटिव हावी है. कई रूसी विश्लेषकों ने दावा किया कि ईरान में अस्थिरता अमेरिका द्वारा तेल संसाधनों पर नियंत्रण पाने की रणनीति का हिस्सा है.
लोकप्रिय सैन्य चैनल रेबार ने कहा कि ईरानी सुरक्षा बलों का स्थिति पर “समग्र नियंत्रण” है और पश्चिमी मीडिया पर जानबूझकर अशांति बढ़ाने का आरोप लगाया. इस तरह रूसी मीडिया का रुख़ ईरानी सरकार के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दिखाई देता है.

वैश्विक प्रतिक्रिया और ईरान का जवाब
जहां रूस और चीन संयमित या मौन हैं, वहीं यूरोपीय देशों ने ईरान में हिंसा की खुलकर निंदा की है. फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी ने संयुक्त बयान जारी कर प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ हिंसा को अस्वीकार्य बताया.
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने प्रदर्शनों को अमेरिका समर्थित बताया और प्रदर्शनकारियों को “उपद्रवी” कहा. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भी तीखा हमला करते हुए उनकी तुलना तानाशाहों से की.
इस बीच, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इंटरनेट बंदी और मौतों की स्वतंत्र जांच की मांग की है. कुल मिलाकर, ईरान के विरोध प्रदर्शन केवल घरेलू असंतोष का मामला नहीं रह गए हैं, बल्कि वैश्विक राजनीति और मीडिया नैरेटिव का अहम हिस्सा बन चुके हैं.


