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महिला दिवस पर कुछ बातें हमारी ग्रामीण महिलाओं की  

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महिलाओं को एक बार फिर याद किया जा रहा है। फिर से महिला सशक्तिकरण की बातें हो रही हैं। महिला को सक्षम बनाने के लिए कसमें खाई जा रही हैं। दुनिया की आधी आबादी यानी महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा किया जा रहा है। ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि हम 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (International Women’s Day) मना रहें है। लेकिन अफ़सोस, समाज में जब हम महिला दिवस मना रहे होंगे तब उसी दौरान किसी न किसी की आबरू लूटी जा रही होगी। किसी बेटी बहन की अस्मत से खिलवाड़ हो रहा होगा। हम औरतों को दुर्गा, काली और मां का दर्जा देतें तो जरूर है, लेकिन उसी महिला के साथ दुर्व्यवहार भी करते है।
भारतीय संस्कृति में नारी की महत्ता से कौन परिचित नहीं है। भारतीय संस्कृति में भगवान शिव का नाम अर्द्धनारीश्वर बताया गया है। समग्र विकास में महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी की आवश्यकता पर ये तथ्य बल देते हैं। एक-दूसरे के पूरक होते हुए नर एवं नारी की समाज में महत्त्वपूर्ण भागीदारी है। इसी संकल्पना पर विचार करते हुए ग्रामीण विकास में भी महिला जनप्रतिनिधियों की भागीदारी की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। भारत को गांवों का देश माना जाता है। ये हम भूल जाते हैं कि हमारी आधी आबादी गांवों में रहती है और जब भी नारी की बात उठती है, शहरीकरण के इस अंधी दौड़ में हम शहरी महिलाओं की तो बात करते है लेकिन देहात में रहने वाली महिलाओं को नज़रअंदाज़ कर देतें हैं।

देहात में रहने वाली महिलाएं भी है सक्षम (#InternationalWomensDay)

हमारे देहात की महिलाएं भी हर मामले में उतनी ही कारगर और सक्षम है जितनी शहरी महिलाएं हैं। देश के जीडीपी में इन महिलाओं का उतना ही रोल है जितना एक शहरी महिला का होता है। संविधान ने अधिकार दिया, तो महिलाओं ने भी चौखट से बाहर कदम रखा। आज ये महिलाएं अपनी और अपने परिवार की जिंदगी संवार रही हैं। साथ ही गांव-देहात में विकास के सपनों में रंग भी भर रही हैं। पंचायती राज में 50 प्रतिशत सीटों पर आरक्षण मिलने के बाद महिलाएं जनप्रतिनिधि के रूप में विकास को समझ और परख रहीं हैं। विकास का खाका बना रही हैं। समाज के वंचित लोगों की आवाज बन रहीं हैं। उनके अधिकारों के लिए व्यवस्था में जगह बना रही हैं।

गांवों के विकास में महिलाओं का योगदान अहम

भारत के विकास के लिए जरुरी है कि गांवों का भी विकास हो। ग्रामीण विकास में ग्रामीणों में शिक्षा, संस्कृति, कला-कौशल, चिकित्सा, सामुदायिक विकास, कृषि, सामाजिक सुधार, पशुपालन, उद्योग-धंधे, रोजगार का विस्तार, पेयजल, विद्युत की सुविधा संचार व्यवस्था का विस्तार आदि चीजें आती हैं। और ये महिलाएं इन सभी में अपना योगदान देकर ये साबित कर रही है कि कोई जरुरी नहीं कि सिर्फ शहरी महिलाएं ही सक्षम है। महिलाओं के जनप्रतिनिधि बनने से उनकी झिझक और घबराहट दूर होगी तथा उनमें आत्मनिर्भरता का विकास होगा, साथ ही आत्मबल में वृद्धि होगी। महिलाओं के जनप्रतिनिधि बनने से राजनीतिक एवं सामाजिक वातावरण सरल होगा एवं टकराव तथा अहम तुष्टि की भावना विकसित नहीं होगी। इससे विकास कार्यों में बाधा नहीं आएगी एवं ग्रामीण विकास तेजी से हो सकेगा। यह भी सत्य है कि अभी भी महिलाएँ सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दृष्टि से पिछड़ी हुई है। इसलिए उनकी प्रगति को लेकर उन्हें आगे लाकर उन पर जिम्मेदारी डालना जरुरी है।

महिलाओं की जनशक्ति के बिना विकास नहीं है संभव

महिलाओं की जनशक्ति की भागीदारी के बिना किसी भी प्रकार के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिये ग्रामीण विकास के लिये महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण मानी गई है। भागीदारी से महिलाओं के मनोबल में वृद्धि, महिला शिक्षा, महिला स्वास्थ्य, महिला प्रतिष्ठा आदि में भी वृद्धि होगी। महिलाओं को जनप्रतिनिधि के रूप में चुने जाने से महिलाओं में व्याप्त पर्दा प्रथा, झिझक एवं घबराहट दूर होती है तथा सही निर्णय करने की क्षमता का विकास होता है। इतना ही नहीं बल्कि स्व-सहायता समूहों ने महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया और उनके जीवन में वित्तीय स्थिरता पैदा की जिससे वो उन्नति के राह पर अग्रसर हुईं है। MNREGA यानी मनरेगा हो या अन्य दूसरी योजनाएं महिलाएं अब एक ऐसे स्तर पर पहुंचने में सक्षम हुई हैं, जहां पंचायत और स्थानीय प्रशासन के दूसरे केंद्रों में उनकी बात को सुना जाता है और उन्हें महत्व दिया जाता है।
तकनीकी उन्नति और ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटलीकरण से महिला सशक्तिकरण में योगदान दिया जा सकता है। साथ ही बहुत मुमकिन है कि इससे लिंग ध्रुवीकरण और विभाजन को कम किया जा सकता है। अगर देश की हर महिला जागरुक हो जाये। आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाए और डिजिटल रूप से मुखर हो जाए तो ऐसे में वो देश के राजनीतिक फलक पर एक लोकतांत्रिक आवाज़ बन कर उभरेगी और हर क्षेत्र में बराबरी कायम करने की दिशा में आगे बढ़ेगी। चाहे वो ग्रामीण महिला ही क्यों न हो।