Home हिन्दी फ़ोरम गरीबी उन्‍मूलन दिवस – सोने की चिड़िया आज गरीबी में है!!

गरीबी उन्‍मूलन दिवस – सोने की चिड़िया आज गरीबी में है!!

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अंतरराष्‍ट्रीय गरीबी उन्‍मूलन दिवस 2020 - सोने की चिड़िया आज "गरीब" है !!
 
कोरोना महामारी के कारण अस्तव्यस्त हुई देश की अर्थ-व्यवस्था और जीवन निर्वाह के संकट से गरीबी बढ़ी है। गरीबी पहले भी अभिशाप थी लेकिन कोरोना की वजह से अब यह संकट और गहराया है। शुरवात में आलम ऐसा हो गया था कि ये आखें टकटकी लगाए बैठी थी कि कोई सज्जन आएगा और दो वक़्त के भोजन का जुगाड़ हो जायेगा। लोगों की माली हालत ऐसी हो गयी है जिसे सुधरने में शायद ही अरसे लग जाएं।अर्थ-व्यवस्था चौपट है, बेरोज़गारी है, ग़रीबी है और यही सच्चाई है। भले कोई बड़े बड़े सपने दिखाए, ट्रिलियन इकॉनमी की बात करें लेकिन यही सच्चाई है कि आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी हम गरीब है, हमारे देश की जनता गरीब है। गरीबी हमारे जड़ में है, गरीबी हमारे गांव में है, देहात में है, शहरी गरीबी भी अभिशाप है। इसी गरीबी को हटाने के लिए आज अंतरराष्‍ट्रीय गरीबी उन्‍मूलन दिवस 2020 (International Day for the Eradication of Poverty 2020) मनाया जा रहा है। यह दिन गरीबी में रह रहे लोगों के संघर्ष को जानने-समझने और उनकी कठिनाइयों को दूर करने के प्रयासों का मौका देता है।

भारत के लिए अभिशाप है गरीबी

कभी सोने की चिड़िया के नाम से पहचाने जाने वाले देश का भविष्य आज गरीबी के कारण भूखा और नंगा है। दो जून की रोटी के जुगाड़ में दरबदर की ठोकरें खा रहा है। हकीकत तो यह है कि गरीब पैदा होना अब पाप समझा जाने लगा। भारत लंबे समय से गरीबी का दंश झेल रहा है। ऐसा नहीं है कि गरीबी को हटाने के प्रयास नहीं हुए, गरीबी उन्मूलन के लिए अब तक कई योजनाएं बनीं, कई प्रयास हुए, गरीबी हटाओ चुनावी नारा बना और चुनाव में जीत हासिल की गई। लेकिन इन सब के बाद भी न तो गरीब की स्थिति में सुधार हुआ और न गरीबी का खात्मा हो पाया। सच्चाई यह है कि गरीबी मिटने के बजाय देश में दिनोंदिन गरीबों की संख्या में गिरावट होने लगी है। सत्ता हथियाने के लिए गरीब को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल किया गया तो सत्ता मिलने के बाद उसे हमेशा के लिए अपने हाल पर छोड़ दिया गया। इसलिए गरीब आज भी वहीं खड़ा है जहां आजादी से पहले था। आज भी सवेरे की पहली किरण के साथ ही गरीब के सामने रोटी, कपड़ा और मकान का संकट खड़ा हो जाता है।

सत्ता हथियाने के लिए गरीब सिर्फ वोटबैंक

गरीबी केवल पेट का भोजन ही नहीं छीनती है, बल्कि कई सपनों पर पानी भी फेर देती है। बल्कि यूं कहें कि सपने खत्म कर देती है। लेकिन इन सब बातों से अंजान हमारे नेता गरीबी को लेकर अभी भी संजीदा नहीं है। गरीब की याद सिर्फ चुनाव के दौरान ही आती है। नारा लगाया जाता है कि हमारी सरकार आने के बाद हम विकास की गंगा बहा देंगे लेकिन एक बूंद पानी तक नसीब नहीं होता। हम भारत को न्यू इंडिया तो बनाना चाहते हैं पर गरीबी को मिटाना नहीं चाहते। हमारे प्रयास हर बार अधूरे ही रह जाते हैं। क्योंकि हमने कभी सच्चे मन से इस समस्या को मिटाने को लेकर कोशिश की ही नहीं है। अगर गरीब और गरीबी दोनों हट गए तो नेता लोग वोटबैंक किसे समझेंगे। गरीब की जिंदगी तो महज एक चिंगम की तरह होकर सिमट गई है, जिसे नेता खरीदता है और चबाकर थूक देता है।

क्या कहते हैं देश में गरीबी के आंकड़े

देश में गरीबी कितनी है, इस बारे में सबसे चर्चित आंकड़ा अर्जुन सेनगुप्ता की अगुवाई वाली एक समिति का है। इस समिति ने कुछ साल पहले यह अनुमान लगाया था कि देश की 77 फीसदी आबादी रोजाना 20 रुपये से कम पर गुजर बसर करने को मजबूर है। सरकार के अनुसार गरीब की परिभाषा यह है कि शहरी क्षेत्र में प्रतिदिन 28.65 रुपये और ग्रामीण क्षेत्र में 22.24 रुपये कम से कम जिसकी आय है वे सब गरीबी रेखा में सम्मिलित हैं। आज जहां महंगाई आसमान छू रही है, क्या वहां 28 और 22 रुपये में एक दिन में तीन वक्त का पेटभर खाना खाया जा सकता है? क्या यह गरीबों का मजाक नहीं है? सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार 30 रुपये प्रतिदिन की आय कमाने वाला भी गरीब नहीं है। शायद हमारे जनप्रतिनिधियों को इस बात का ध्यान ही नहीं है कि गरीबी में गरीबों को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

भारत में आखिर कितने हैं गरीब

यह सोचकर भी हैरानी होती है कि हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां की 40 करोड़ आबादी आज भी जानवरों जैसी बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर है। उसके पास न तो आय के पर्याप्त साधन हैं और न ही सरकार से ऐसी कोई मदद मिल रही है कि वह अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सके। पिछले बीस सालों से उनके लिए जो प्रयास किए गए उससे ज़मीनी स्तर पर कितना बदलाव आया, इसका कोई मूल्यांकन तक न किया जाना सरकार की प्रतिबद्धता और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है?

आखिर क्या है गरीबी की मुख्य वजह

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत में संसाधनों की कोई कमी नहीं है साथ ही यहां अवसरों की भी कोई कमी नहीं है। अगर प्रतिभा और लगन के साथ आपकी किस्मत का साथ मिले तो आप आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन माना जाता है भारत में एक गरीब मजदूर अपने बच्चे को भी मजदूरी ही कराता है क्योंकि उसकी मानसिकता और समाज उसे इससे अधिक सोचने की इजाजत ही नहीं देती। लेकिन उन लाखों बेरोजगार युवाओं को गरीबी की तरफ धकलेने वाले कारण का क्या जिसकी वजह से पढ़ी-लिखी पीढ़ी भी दो वक्त की रोजी-रोटी कमाने के लिए कड़ा संघर्ष करती है? भारतीय शिक्षण संस्थानों में आपको डिग्री तो थमा दी जाती है लेकिन उस डिग्री के अलावा छात्रों को कोई अन्य कौशल नहीं सिखाया जाता जिसकी मदद से बच्चे आगे जाकर भविष्य में अपने पैरों पर खड़ा हो सकें। और सबसे बड़ा कारण है हमारी भ्रष्ट सरकारें इसके लिए दोषी नहीं हैं जो मनरेगा और अन्य योजनाओं में अरबों का घोटाला करती हैं।  सरकार ने अगर वक्त रहते अपने घोटालों पर काबू नहीं किया तो महंगाई बढ़ती रहेगी और महंगाई के बढ़ने से गरीब और भी गरीब होते जाएंगे।

गरीबों की हक़ चोरी करते है सबल

गरीबी की बीमारी जब तक भारत को लगी रहेगी, तब तक भारत का विकासशील से विकसित बनने का सपना पूरा नहीं हो सकता है। सच तो यह है कि गरीबों के लिए चलने वाली दर्जनों सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें मिल ही नहीं पाता। जिसका एक कारण अज्ञानता का दंश भी है। हालांकि, वर्तमान सरकार द्वारा डिजिटलीकरण इस दिशा में सार्थक कदम है। जनसंख्या भी इनमें से एक कारण है। गरीबी गरीब हटाने और आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए समय-समय पर योजनाएं बनाई गई। लेकिन योजनाओं का लाभ पाने के लिए सबल भी निर्बल बनते रहे। यही वजह है कि हालात सुधरते नहीं दिख रहे हैं। आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना लागू की गई। शहरी क्षेत्र में शुरू हुई योजना में आवास आवंटन को लेकर तमाम शिकायतें अधिकारियों के सामने आए दिन पहुंचती है। सैकड़ों आवेदन निरस्त किए। प्रधानमंत्री आयुष्मान कार्ड में अपात्र योजना में शामिल हो गए। पेंशन योजना हो या फिर अन्य योजनाएं उनका लाभ पाने के लिए सबल वर्ग के लोग भी खुद को निर्बल साबित करने से पीछे नहीं हट रहे हैं। हालात यह है कि देश में गरीबों के हक पर डाका डालने के लिए अंत्योदय योजना के कार्ड बनवा लिए। और ये करप्शन की वजह से है।

गरीबी से निपटने के लिए क्या किया जाय ?

किसी भी सरकार की यह नैतिक जिम्मेदार होती है कि नागरिकों को गरीबी के दलदल से निकाला जाए। उन्हें पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण आहार उपलब्ध कराया जाए। गरीबों को रोजगार उपलब्ध कराकर उनके बच्चों के लिए शिक्षा का उचित प्रबंध के साथ ही गरीबों के लिए जल, भूमि, स्वास्थ्य व ईंधन में विस्तार किया जाना चाहिए। गरीबों के लिए आर्थिक नीतियां बनाई जाएं और पूंजीवादियों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। किसी भी गरीबी उन्मूलन रणनीति का एक आवश्यक तत्व घरेलू आय में बड़ी गिरावट को रोकना है। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को सही सोच के साथ लागू किया जाना चाहिए। हालांकि, पूर्ण लाभ पाने के लिये गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण प्रदान करने में सक्षम सामाजिक बुनियादी ढांचे के निर्माण की आवश्यकता है। विद्युतीकरण, आवास, ट्रांसपोर्टेशन सुविधाओं के विकास पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
देश में कृषि उत्पादन पर्याप्त नहीं है। गांवों में आर्थिक गतिविधियों का अभाव है। इन क्षेत्रों की ओर ध्यान देने की जरूरत है। कृषि क्षेत्र में सुधार की जरूरत है ताकि मॉनसून पर निर्भरता कम हो। बैंकिंग, क्रेडिट क्षेत्र, सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क, उत्पादन और विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा तथा ग्रामीण विकास के क्षेत्र में सुधार की जरूरत। सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा पर अधिक निवेश किए जाने की जरूरत है ताकि मानव उत्पादकता में वृद्धि हो सके। गुणात्मक शिक्षा, कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करने के साथ ही रोजगार के अवसर, महिलाओं की भागीदारी, बुनियादी ढांचा तथा सार्वजनिक निवेश पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। हमें आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाने की आवश्यकता है। आर्थिक वृद्धि दर जितनी अधिक होगी गरीबी का स्तर उतना ही नीचे चला जाएगा।

सीएसआर पहल से दूर हो रही है देश में गरीबी

देश की सरकारों के साथ साथ देश की कॉर्पोरेट कंपनियां भी गरीबी को खत्म करने में जुटी हुई है, शायद यही कारण है कि बड़े पैमाने पर सीएसआर (CSR) के तहत औधोगिक घराने समाज में बदलाव लाकर गरीबों की मदद कर रहीं है। कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (Corporate Social Responsibility) से कई ऐसे कार्यक्रम चलायें जा रहें है जिससे गरीबी से लड़ने में देश को फायदा हो रहा है। सीएसआर हर एक पहलु से गरीबों की मदद कर रहा है। गरीबों का स्वस्थ्य हो या शिक्षा या फिर बेहतर खान पान हर एक दिशा में सीएसआर की मदद से गरीबी उन्मूलन पर काम किया जा रहा है।

गरीबी दूर करने की नीति आयोग की रणनीति

2017 में नीति आयोग ने गरीबी दूर करने हेतु एक विज़न डॉक्यूमेंट प्रस्तावित किया था। इसमें 2032 तक गरीबी दूर करने की योजना तय की गई थी। इस डॉक्यूमेंट में कहा गया था कि गरीबी दूर करने हेतु तीन चरणों में काम करना होगा-  गरीबों की गणना – देश में गरीबों की सही संख्या का पता लगाया जाए। गरीबी उन्मूलन संबंधी योजनाएँ लाई जाएँ।  लागू की जाने वाली योजनाओं की मॉनीटरिंग या निरीक्षण किया जाए। आज़ादी के 70 साल बाद भी गरीबों की वास्तविक संख्या का पता नहीं चल पाया है। देश में गरीबों की गणना के लिये नीति आयोग ने अरविंद पनगढ़िया के नेतृत्व में एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया था। 2016 में इस टास्क फ़ोर्स की रिपोर्ट आई जिसमें गरीबों की वास्तविक संख्या नहीं बताई गई। नीति आयोग ने गरीबी दूर करने के लिये दो क्षेत्रों पर ध्यान देने का सुझाव दिया-पहला योजनाएँ तथा दूसरा MSME। देश में वर्कफ़ोर्स के लगभग 8 करोड़ लोग MSME क्षेत्र में काम करते हैं तथा कुल वर्कफोर्स के 25 करोड़ लोग कृषि क्षेत्र में काम करते हैं। अर्थात् कुल वर्कफोर्स का 65 प्रतिशत इन दो क्षेत्रों में काम करता है। वर्कफोर्स का यह हिस्सा काफी गरीब है और गरीबी में जीवन यापन कर रहा है। यदि इन्हें संसाधन मुहैया कराए जाएँ, इनकी आय दोगुनी हो जाए तथा मांग आधारित विकास पर ध्यान दिया जाए तो शायद देश से गरीबी ख़त्म हो सकती है।